केन्या की महिलाएं अदालतों में खुद लड़ रहीं अपना केस | दुनिया | DW | 31.07.2018
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दुनिया

केन्या की महिलाएं अदालतों में खुद लड़ रहीं अपना केस

अदालत में जज के सामने खड़ा होना किसी को भी नर्वस कर सकता है, उसकी तो बात ही छोड़िए जिसे कानून का कुछ भी पता न हो और जो अदालत में ताकतवर विरोधी के खिलाफ खुद की पैरवी कर रहा हो. केन्या में 44 वर्षीया इवोन के साथ यही हुआ.

इवोन के बिजनेसमैन पति ने उसे दूसरी औरत के लिए छोड़ दिया था. सालों तक वह तलाक देने से मना करता रहा. आखिरकार इवोन को तलाक के लिए अदालत की शरण लेनी पड़ी और अपनी पैरवी खुद करनी पड़ी. इवोन बताती है, "मैं अपनी जिंदगी में कभी अदालत नहीं गई थी और मुझे अदालत के कायदे कानून का भी पता नहीं था. मुझे ये भी पता नहीं था कि जज को मी लॉर्ड कहते हैं या योर ऑनर." इवोन कहती है कि इतने सारे लोगों के सामने जज से बात करना बहुत ही डराने वाला अनुभव था. लेकिन हर पेशी की साथ उसका आत्मविश्वास बढ़ता गया.

छह महीने के अंदर केन्या की राजधानी नैरोबी के फैमिली कोर्ट ने इवोन की तलाक की अर्जी मान ली और पिछले नवंबर में उसे शादी के बंधन से आजाद कर दिया ताकि वह जीवन में आगे बढ़ सके और अपने फैसले खुद ले सके. केन्या में बहुत सी महिलाएं तलाक, बच्चों की कस्टडी या जीवनयापन भत्ता के मामलों में अदालतों में खुद अपनी पैरवी कर रही हैं क्योंकि उनके पास वकीलों को देने के लिए या तो पैसा नहीं है या फिर वे धोखेबाज वकीलों के चंगुल में नहीं फंसना चाहतीं. और अच्छी बात ये है कि वे अपने मुकदमे जीत भी रही हैं.

उनकी मदद के लिए महिला वकीलों का संगठन सामने आया है. फेडरेशन ऑफ वुमन लॉवयर्स ऑफ केन्या फीडा उन्हें कानूनी सूचनाएं और अदालत में अपना प्रतिनिधित्व करने की सलाह उपलब्ध कराता है. पिछले 8 सालों में केन्या में 700 से ज्यादा महिलाओं अदालत में मुकदमा किया और अपना केस खुद लड़ा है. फीडा के अनुसार 80 प्रतिशत मामलों में महिलाओं की जीत हुई है. फीडा की प्रतिनिधि जेरेमी मुटिका कहती हैं, "हम अपने क्लाइंट की बोलने और खुद को अभिव्यक्त करने की क्षमता परखते हैं. यदि उनकी क्षमता जरूरत के लायक नहीं होती तो हम प्रो बोनो वकील उपलब्ध कराते हैं. "

न्यायकीराहमेबाधाएं

केन्या की अर्थव्यवस्था में पिछले एक दशक में सालाना औसत पांच प्रतिशत की वृद्धि हुई है. लेकिन इसका फायदा बराबर तरीके से नहीं बंटा है. खासकर महिलाएं और लड़कियां अभी भी भेदभाव का सामना कर रही हैं. केन्या में 20 प्रतिशत लड़कियों की शादी 18 साल की उम्र से पहले कर दी जाती है. संयुक्त राष्ट्र महिला संस्था यूएन वुमन के अनुसार करीब 40 फीसदी महिलाओं को उनके पार्टनर या पति पीटते हैं या उनका यौन उत्पीड़न करते हैं.

राष्ट्रीय सांख्यिकी ब्यूरो के अनुसार देश के 30 प्रतिशत परिवारों की मुखिया महिलाएं हैं लेकिन ये परिवार पुरुष मुखिया वाले परिवारों की तुलना में गरीब हैं. इसी तरह देश के खेतिहर मजदूरों में महिलाओं का हिस्सा 80 प्रतिशत है लेकिन जमीन का मालिकाना हक सिर्फ 1 प्रतिशत महिलाओं के पास है. जमीन और संपत्ति पर अधिकार मुख्य तौर पर उत्तराधिकार या शादी की संपत्ति के तौर पर मिलता है लेकिन अक्सर पार्टनर या परिवार के सदस्य उन्हें ये नहीं देते. इस तरह न सिर्फ महिलाओं बल्कि उनके बच्चों के भविष्य पर भी इसका गहरा असर होता है.

महिला अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि कम ही महिलाएं इस तरह के अन्यायों का मुकाबला कर पाती हैं. बहुत सी महिलाओं को अपने अधिकार के बारे में कोई जानकारी नहीं है. साथ ही उन्हें ये भी पता नहीं है कि जरूरत पड़ने पर उन्हें कानूनी सहायता कहां मिलेगी. और जिन्हें इसके बारे में जानकारी है उनके पास वकील करने के लिए पर्याप्त धन नहीं है. अनुदारवादी सामाजिक परंपराएं भी मूल रूप से ईसाई देश में बहुत सी महिलाओं को बोलने से रोकती हैं. बाल सुरक्षा कार्यकर्ता अंगेला न्यामू कहती हैं, "महिलाओं को यह पता नहीं होता कि कानूनी मुश्किल के समय वे क्या करें. यदि कोई उन्हें ट्रेनिंग देने वाला या गाइड करने वाला हो तो उनमें न्याय मांगने की प्रक्रिया में विश्वास पैदा होगा."

खुदकाप्रतिनिधित्व

महिला वकीलों के संगठन फीडा का खुद अपना प्रतिनिधित्व वाला ट्रेनिंग प्रोग्राम तलाक, कस्टडी या निर्वाह भत्ता जैसे आसान दीवानी मुकदमों पर लक्षित है. वकीलों का कहना है कि ये मामले थोड़े समर्थन और ट्रेनिंग के बाद मुवक्किलों द्वारा खुद निबटाए जा सकते हैं. लीगल सहायता संस्था महिलाओं को कानून, अदालतों और कानूनी भाषा के बारे में जानकारी देती है. उन्हें कुछ व्यावहारिक टिप भी दिए जाते हैं कि अदालत में कब पहुंचें, कहां बैठें और कैसे कपड़े पहनकर जाएं, जजों के सवालों का जवाब कैसे दें और अर्जियां कहां दाखिल करें.

फीडा के वकील महिलाओं की अर्जी तैयार करने में मदद करते हैं और हर पेशी के बाद उनसे मिलकर अगली पेशी के लिए उन्हें सलाह देते हैं. कुछ मामले आसान होते हैं और कुछ महीनों में ही उनका फैसला हो जाता है, जबकि ऐसे मामलों में जिनमें प्रतिवादी मानने को तैयार नहीं होता है, उनमें फैसले में वक्त लगता है.

केट दो साल से अपने दो बच्चों के लिए निर्वाह भत्ते के लिए लड़ रही है. उसके पति ने अदालत के आदेश के बावजूद पैसे नहीं दिए थे. अदालत में खुद पैरवी करते हुए केट ने बार बार जज से कार्रवाई करने को कहा. इस महीने के शुरू में उसके पति के खिलाफ गिरफ्तारी का वारंट जारी हुआ है.

फ्रेंच पढ़ाने वाली 34 वर्षीया केट बताती है, "मुझे याद है कि पहली बार जब मैं अदालत गई तो कांप रही थी, लेकिन जब आप जज को अपनी बात सुनते हुए देखते हैं और देखते हैं कि आपके कहे पर कार्रवाई हो रही है तो ये प्रोत्साहन देने वाला होता है." लेकिन केट ये भी मानती है कि इसके लिए ताकत और प्रतिबद्धता की जरूरत होती है. "आखिरकार ये मेरे अधिकारों की बात है, मेरे बच्चों के अधिकारों की बात है और यही मुझे लड़ते रहने की प्रेरणा देता है."

एमजे/एके (रॉयटर्स थॉमसन)

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