कुष्ठ रोग, क्या भारत में बेकाबू हो रहे हैं हालात | NRS-Import | DW | 05.02.2021

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कुष्ठ रोग, क्या भारत में बेकाबू हो रहे हैं हालात

कोविड महामारी से जूझ रही दुनिया में फिलहाल किसी दूसरी बीमारी की बात शायद ही हो रही है. कुष्ठ रोग को तो बीते वक्त की बात मान लिया गया है. दुनिया के कई देश आज भी कुष्ठ रोग से जूझ रहे हैं और भारत उनमें पहले स्थान पर है.

भारत ने 2005 में देश को कुष्ठ रोग उन्मूलन में सफल घोषित कर दिया था. विश्व स्वास्थ्य संगठन की परिभाषा के मुताबिक कोई देश कुष्ठ रोग मुक्त तब होता है जब वहां प्रति दस हजार व्यक्तियों में मिलने वाले केस का औसत एक से कम हो. डेढ़ दशक पहले भारत ने एमटीडी यानी मल्टीड्रग थेरेपी का इस्तेमाल करते हुए ये लक्ष्य हासिल करने का ऐलान किया. हालांकि फिलहाल स्थिति ये है कि पंद्रह साल बाद भी दुनिया भर के कुल कुष्ठ रोगियों में से तकरीबन 60 फीसदी भारत में हैं. इतना ही नहीं भारत में इस रोग की वजह से विकलांग होने वालों की संख्या भी लगभग चालीस लाख है. जानकारों का कहना है कि संख्या असल में इससे ज्यादा भी हो सकती है.

आंकड़ों की रस्साकशी एक तरफ है लेकिन शायद ये स्थिति की गंभीरता ही है कि भारत ने लंबे अरसे से ठंडे बस्ते में पड़ी कुष्ठ रोग की स्वदेशी वैक्सीन का 2017 में ट्रायल शुरू किया. इस बीमारी से जुड़े कई पहलू हैं जिन पर प्रश्न चिन्ह लगाया जा सकता है, जैसे कुष्ठ रोग पर काबू कर लेने की घोषणा के बाद भारत ने इस रोग के इलाज को सामान्य स्वास्थ्य सेवाओं के साथ जोड़ दिया, उसका क्या असर हुआ? बिहार और राजस्थान जैसे राज्यों में जहां सबसे ज्यादा रोगी हैं, वहां उनकी स्थिति पिछले पंद्रह साल में कितनी बदली? साथ ही बीमारी से जुड़ी छुआछूत और सामाजिक भेदभाव की परिस्थितियां क्या बदली हैं?

नंबरों से आगे की हकीकत

साल 2000 में वैश्विक स्तर पर कुष्ठ रोग उन्मूलन का लक्ष्य हासिल कर लिए जाने के बाद भारत जैसे ऊंची दर वाले देशों पर इस दिशा में कारगर कदम उठाने का दबाव था. साल 1983 से चल रहे राष्ट्रीय कुष्ठरोग निवारण कार्यक्रम (एनएलईपी) के तहत रोग से निपटने की रणनीति को चाक-चौबंद किया गया. विश्व स्वास्थ्य संगठन के अलावा अंतरराष्ट्रीय और स्थानीय गैर-सरकारी संगठनों का सहयोग लेते हुए कुष्ठ रोग की प्रचलन दर, जो साल 1983 में प्रति दस हजार पर 57.8 थी, उसे दिसबंर 2005 में 0.95 तक लाने में भारत सफल रहा. यही नहीं एनएलईपी की 2016-17 की रिपोर्ट के मुताबिक साल 2006 में प्रचलन दर 0.72 थी, जो साल 2017 के अंत तक 0.66 बनी हुई है. ये पढ़कर ऐसा लग सकता है कि केस कम हो रहे हैं लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि ये आंकड़े वास्तविक संक्रमण की सही तस्वीर नहीं बताते और इनकी स्थिरता इस ओर इशारा करते हैं कि पिछले पंद्रह सालों से संक्रमण को रोकने की दिशा में कोई प्रभावी कामयाबी नहीं मिली है.

Indien Corona-Pandemie | Lepra

कोरोना काल में कुष्ट रोगियों की समस्याएं बढ़ गई हैं

साल 2016 में चलाए गए एक विशेष अभियान की वजह से पैंतीस हजार नए केस पता लगाए गए लेकिन बात सिर्फ पता लगने वाले मामलों की नहीं है. एक गैर-सरकारी संस्था- दि लेप्रसी मिशन इंडिया के सामुदायिक अस्पताल के साथ काम करने वाले लेप्रॉलजिस्ट डॉ. उत्पल सेनगुप्ता का कहना है, "कुष्ठरोग उन्मूलन के लिए तय सीमा रेखा को तो भारत ने छू लिया लेकिन इसका मतलब ये कतई नहीं है कि वाकई में रोग पर काबू पा लिया गया बल्कि साल 2016 में ही करीब एक लाख पैंतीस हजार से ज्यादा केस दर्ज किए गए. सरकार ने लक्ष्य पूरा करने की जल्दबाजी में रोग की ठीक तरह से निगरानी रखने की कोई दीर्घकालिक योजना नहीं बनाई. दुखद ये है कि 2005 से 2015 के बीच रोग की प्रचलन दर और नए रोगियों की दर्ज हो रही संख्या में ठहराव आ गया. इसका मतलब ये है कि लोगों में संक्रमण तो था लेकिन उसका ठीक तरह से पता नहीं लगाया जा सका."

जिस साल भारत ने उन्मूलन के निर्धारित लक्ष्य को छुआ, तभी से कुष्ठ रोग के लिए विशेष कैंपेन जैसे प्रयोजनों को बंद कर, बीमारी के इलाज को सामान्य स्वास्थ्य सेवाओं के साथ जोड़ दिया गया. इसका सीधा मतलब ये हुआ कि लोग बीमारी का शक होने पर खुद डॉक्टर के पास जाने और बीमारी के लक्षण की जांच करवाने के लिए जिम्मेदार हैं. जाहिर है कि आर्थिक और सामाजिक तौर पर पिछड़े और गरीबी में जीवन बिता रहे लोगों तक मदद का हाथ पीछे खींचने का नतीजा, संक्रमण को रोक पाने में नाकामी के तौर पर हमारे सामने है. इसका बड़ा उदाहरण है बच्चों में कुष्ठरोग के आंकड़ों की स्थिरता जो कुल रोगियों का लगभग आठ फीसदी है और संक्रमण रोकने में नाकामी को साफ तौर पर दिखाता है. डॉ. सेनगुप्ता कहते हैं, "मेरी राय में जिस तरह से रोग की निगरानी को जल्दी से बंद कर दिया गया वो सबसे बड़ी चूक थी. जरूरत इस बात की थी कि निश्चित क्षेत्रों में बहुत कड़ाई से रोगियों और उनके संपर्क में आए लोगों पर लंबे वक्त के लिए नजर रखी जाती. इससे संक्रमण का पता चलते ही तुरंत इलाज किया जा सकता था लेकिन वो सतर्कता नहीं बरती गई”.

रोग से निपटने में चुनौतियां

कुष्ठ रोग से निपटने में बहुआयामी चुनौतियां हैं. मसलन इस बीमारी के लक्षण शरीर में दिखने में लंबा वक्त लगता है जो छह बरस या उससे ज्यादा का भी हो सकता है. 2005 में उन्मूलन लक्ष्य हासिल करने के बाद बीमारी की निगरानी के लिए केंद्रीय स्तर पर चलाए जाने वाले विशेष कार्यक्रम और सूचना कैंपेन को खत्म कर दिया गया जबकि कुछ राज्यों की स्थिति लगातार खराब बनी हुई है. आधिकारिक तौर पर ये बात दर्ज है कि छत्तीसगढ़ राज्य में कभी उन्मूलन के स्तर को हासिल नहीं किया जा सका बल्कि चंडीगढ़, ओडिशा, बिहार, गोआ और लक्षद्वीप में दस हजार पर एक केस से ज्यादा की प्रचलन दर दर्ज की गई है. ये वो राज्य और केंद्र शासित प्रदेश हैं जहां 2015-16 में उन्मूलन लक्ष्य हासिल किए गए थे यानी एक कदम आगे तो दो कदम पीछे.

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स्वास्थ्य देखभाल के तहत कुुष्ठ रोगियों की जांच

कुष्ठ रोग के नए मामलों में अगर आठ फीसदी बच्चे हैं तो कई राज्यों में ये आंकड़ा बेहद चिंताजनक तरीके से दस फीसदी से ऊपर है. बच्चों में संक्रमण के सबसे ज्यादा मामले बिहार से हैं जिसकी हिस्सेदारी लगभग चौदह प्रतिशत की है. स्वास्थ्य क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर काम करने वाले संगठन जनस्वास्थ्य अभियान के बिहार संयोजक डॉक्टर शकील भी मानते हैं कि रोग और रोगियों पर नजर रखने में कमी संक्रमण का सबसे बड़ा कारण है. साथ ही वो कहते हैं, "इस बीमारी का गरीबी, रहन-सहन और सफाई से गहरा रिश्ता है लेकिन जिस राज्य में जनस्वास्थ्य सुविधाओं का अकाल हो वहां हालात सुधरने की उम्मीद भी कैसे जा सकती है. बिहार की स्वास्थ्य सेवाओं का बुनियादी ढांचा ही खस्ताहाल है. यहां पचास प्रतिशत मेडिकल अफसरों की कमी है, पचासी फीसदी पुरुष स्वास्थ्यकर्मी नहीं हैं, एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र जो तीस हजार की आबादी पर होना चाहिए वो बिहार में एक लाख पचहत्तर हजार पर है. जब बजट में स्वास्थ्य पर पैसे खर्च ही नहीं होंगे, संसाधन नहीं होंगे तो कुछ बदलेगा भी कैसे."

राष्ट्रीय स्तर पर सामान्य स्वास्थ्य सुविधाओं की बदहाली ने कुष्ठ रोग की वर्तमान स्थिति में भूमिका निभाई है लेकिन विशेषज्ञ ये भी मानते हैं कि दूर दराज के इलाकों में जानकारियां और सूचनाएं भी लोगों तक ठीक ढंग से नहीं पहुंची. इसका नतीजा ये हुआ है कि लोग सही समय पर मदद नहीं ले पाते या फिर इलाज पूरा नहीं करते. एक शोध इस बात का भी जिक्र करता है कि लोग इस रोग के मौजूदा इलाज के बजाए वैकल्पिक इलाज ढूंढने की कोशिश भी करते हैं जिससे रोग का पता लगाने में देरी हो सकती है. बात सिर्फ रोग पर खत्म भी नहीं होती. सामाजिक जीवन में अब भी कुष्ठ रोग को लेकर संदेह और भेदभाव आम है. ये भी एक कारण है कि लोग बीमारी के शुरूआती लक्षणों को छिपाते हैं और संक्रमण फैलने का कारण बन सकते हैं. रोग की वजह से हुई विकलांगता अपने आप में एक बहुत बड़ी चुनौती है जिसका एक सिरा भी इस लेख में पकड़ा नहीं जा सकता.

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रिहैब सेंटरों में रोगियों की नियमित देखभाल

दवा-प्रतिरोध और रोग की वापसी

कुष्ठ रोग से जुड़े सम्मेलनों और चर्चाओं में ये बात लगातार उठती रही है कि क्या वजह है कि पिछले पंद्रह सालों में भारत में इस रोग के मामले लगातार एक जैसे क्यों बने रहे? साल 2017 में एक कॉन्फ्रेंस के दौरान, द लेप्रेसी मिशन की डॉ. मैरी वर्गीज ने इसका एक कारण लोगों में ठीक हो जाने के बाद रोग की वापसी बताया. हालांकि ऐसे रोगियों की संख्या कितनी बड़ी है इसका कोई देशव्यापी आंकड़ा मौजूद नहीं है. डब्ल्यूएचओ के वैश्विक कुष्ठरोग कार्यक्रम में स्वास्थ्य अधिकारी, लौरा जिलीनी का कहना था कि एक निगरानी कार्यक्रम के दौरान, दोबारा संक्रमण और दवा-प्रतिरोध पैदा होने की पुष्टि हुई है. इसमें करीब अठारह सौ रोगियों में रोग के इलाज के लिए दी जाने वाली दवाओं के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता का पता चला. डॉ. सेनगुप्ता भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि दवा-प्रतिरोध क्षमता पैदा होना, इस बीमारी का एक ऐसा पहलू है जिसकी तुलना भारत में टीबी की स्थिति से की जा सकती है.

रोग की दोबारा वापसी का संबंध दवाइयों का सही तरीके से ना लिया जाना है, वहीं दवा-प्रतिरोध की बड़ी वजह इलाज को अधूरा छोड़ना है. भारत जैसे देशों में, गरीबी और जानकारी के अभाव में रहने वाले लोगों में दवा का पूरा कोर्स ठीक से ना लेना या इलाज को बीच में ही छोड़ देना कोई बड़ी बात नहीं है. इस कारण ये इस गंभीर बीमारी से जंग का एक और आयाम है.

कुष्ठ रोग से जुड़े इतने पहलू हैं कि उन सब पर एक साथ बात करना भी मुमकिन नहीं लगता. लेकिन ये समझना मुश्किल नहीं है कि जिस बीमारी से युद्ध स्तर पर निपटने की जरूरत थी, उसे आंकड़ों की भेंट चढ़ाकर कदम पीछे हटा लिए गए. फिलहाल विश्व स्वास्थ्य संगठन कुष्ठ रोग पर 2021-2030 की अपनी रणनीति को अंतिम रूप देने में लगा है, जिसके बाद निगाहें एक बार फिर सबसे ज्यादा रोगियों वाले देश, भारत पर होंगी. डर ये है कि अगर नए सिरे से भारत ने एक देशव्यापी योजना और सक्रियता से उसके क्रियान्वयन का इंतजाम ना किया तो बीमारी कहीं महामारी में तब्दील ना हो जाए.

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