किसान खुदकुशी रोकने में मनोवैज्ञानिक बने मददगार | दुनिया | DW | 18.03.2019
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दुनिया

किसान खुदकुशी रोकने में मनोवैज्ञानिक बने मददगार

कॉरपोरेट अस्पताल की अपनी नौकरी से असंतुष्ट एक मनोवैज्ञानिक एक ऐसी टीम में शामिल हो गईं, जो तेलंगाना में किसानों की खुदकुशी रोकने के लिए काम करती है.

पेश से मनोवैज्ञानिक श्रुति नाइक यह जानना चाहती थीं कि आखिर भारत के ग्रामीण क्षेत्र में खासकर किसानों के बीच व्याप्त संकट का कारण क्या है. उन्होंने इसे जानने और इसका समाधान तलाशने के काम को चुनौती के रूप में स्वीकार किया. श्रुति कहती हैं, "मैंने महसूस किया कि समस्या कितनी गंभीर है और बाहर की दुनिया में किस प्रकार भ्रांति फैलाई जाती है."

किसानों की हेल्पलाइन

किसान मित्र हेल्पलाइन के अपने दफ्तर में आईएएनएस से बातचीत में उन्होंने कहा, "किसान परिस्थितियों, आर्थिक असमानता और खेती से संबंधित समस्याओं के शिकार हैं. उनके पास कर्ज चुकाने का कोई जरिया नहीं है. उनको निजी साहूकार और बैंक परेशान करते हैं. वे हमेशा इस बात को लेकर चिंतित रहते हैं कि वे कर्ज कैसे चुकाएंगे और परिवार का भरण-पोषण कैसे करेंगे."

वर्ष 2017 में राज्य के विकराबाद जिले की तत्कालीन जिला कलेक्टर दिव्या देवराजन ने सुझाव दिया कि एनजीओ को इस मसले पर काम करना चाहिए. हालांकि उन्होंने माना कि इसके लिए महज हेल्पलाइन से काम नहीं चलेगा.

श्रुति ने बताया, "कभी-कभी संकटग्रस्त किसान हमारे पास नहीं आ सकते, क्योंकि मदद मांगने को कलंक समझा जाता है. उसके बाद हमने क्षेत्रीय दल बनाने का फैसला लिया जो किसानों से बात कर सके."

वह सात सदस्यों की टीम की अगुवाई करती हैं, जिसमें सभी महिला सदस्य हैं. काउंसल कॉल्स लेती हैं और किसानों से उनकी समस्याओं का ब्योरा नोट करती हैं. इसके बाद उसे संबंधित क्षेत्र स्तरीय संयोजक को भेज देती हैं जो समस्या के समाधान में जुट जाते हैं.

श्रुति ने बताया, "हमें अब तक जमीन, फसल, भुगतान, कर्ज और बैंक से संबंधित मसलों को लेकर 8,000 कॉल्स मिले हैं. हमने 4,000 मामलों का समाधान करने की कोशिश की है. मसला यह है कि संकट आने से पहले समस्या का समाधान हो."

आत्महत्या कर चुके किसानों के परिवारों के लिए

संगठन खुदकुशी करने वाले किसानों के परिवारों की मदद व उनके पुनर्वास के लिए भी सरकार के साथ मिलकर काम करता है. 2018 में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर आदिलाबाद में 120 विधवाओं और उनके परिवारों की एक बैठक बुलाई और सरकार की मदद से उनके लिए वैकल्पिक आजीविका की व्यवस्था की.

तेलंगाना में असली समस्या काश्तकारों की है. सर्वेक्षण के अनुसार, तेलंगाना में खुदकुशी करने वाले किसानों में 75 फीसदी काश्तकार हैं, जो किराये की जमीन पर खेती करते हैं.

इन्हें रायतू बंधु योजना के तहत शामिल नहीं किया गया है, जिसके तहत सरकार किसानों को प्रति एकड़ सालाना 8,000 रुपये बतौर निवेश सहायता प्रदान करती है.

किसान मित्र ने किराये की जमीन पर खेती करने वाले 5,000 किसानों की मदद की है. उन्होंने कुछ बैंकरों से समझौता कर संयुक्त दायी समूहों का गठन किया है. प्रत्येक समूह में चार-पांच सदस्य होते हैं. प्रत्येक समूह को एक लाख रुपये का ऋण मुहैया कराया जाता है.

-- मोहम्मद शफीक (आईएएनएस)

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