कितना व्यावहारिक है ′एक राष्ट्र, एक चुनाव′ | भारत | DW | 19.06.2019
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भारत

कितना व्यावहारिक है 'एक राष्ट्र, एक चुनाव'

नरेंद्र मोदी सरकार के हाल के लोकसभा चुनावों में भारी बहुमत के साथ जीत कर सत्ता में लौटने के बाद भारत में एक बार फिर “एक राष्ट्र, एक चुनाव” के मुद्दे पर बहस तेज हो गई है.

प्रधानमंत्री मोदी ने इस मुद्दे पर बुधवार को दिल्ली में तमाम राष्ट्रीय दलों के अध्यक्षों की बैठक बुलाई है. लेकिन बैठक से पहले ही इस पर असहमति के स्वर तेज होने लगे हैं. पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव समेत कई नेताओं ने इसकी व्यावहारिकता पर सवाल उठाते हुए बैठक में हिस्सा लेने से मना कर दिया है. एमके स्टालिन, चंद्रबाबू नायडू और शरद पवार भी बैठक में शामिल नहीं होंगे. कांग्रेस अब तक उहापोह की स्थिति में है.

संविधान विशेषज्ञों ने भी इस मुद्दे पर राष्ट्रीय बहस के बाद ही किसी नतीजे पर पहुंचने की बात कही है. इस मुद्दे के समर्थक और विरोधी अपने-अपने पक्ष में दलीलें गिनाने में जुट गए हैं. यूपीए के कुछ घटक दल बैठक में शामिल होने के लिए संसद में प्रतिनिधि होने की शर्त से नाराज भी हैं. लेफ्ट ने बैठक में हिस्सा लेकर इस विचार का विरोध करने का फैसला किया है. उसकी दलील है कि इससे विधायिका की जवाबदेही का अतिक्रमण होने के साथ राज्यपालों की भूमिका बढ़ जाएगी और केंद्रीय हस्तक्षेप की संभावना बढ़ेगी.

क्या है मुद्दा

एक राष्ट्र, एक चुनाव की नीति के तहत देश में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराए जाने का प्रस्ताव है. इसके तहत पूरे देश में पांच साल में एक बार ही चुनाव होगा. सरकार की दलील है कि इससे न सिर्फ समय की बचत होगी, बल्कि देश को भारी आर्थिक बोझ से भी राहत मिलेगी. वर्ष 2003 में भी बीजेपी नेता लालकृष्ण आडवाणी ने कहा था कि सरकार लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराए जाने के मुद्दे पर गंभीरता से विचार कर रही है. उस समय भी केंद्र में बीजेपी ही सत्ता में थी.

वैसे, देश में एक राष्ट्र, एक चुनाव का मुद्दा कोई नया नहीं है. आजादी के बाद देश में वर्ष 1952 से 1970 के बीच पहले चार चुनाव दरअसल, एक राष्ट्र, एक चुनाव की अवधारणा पर ही कराए गए थे. लेकिन उसके बाद लोकसभा मियाद से पहले भंग हो जाने की वजह से यह सिलसिला टूट गया था.

सरकार की दलील है कि ऐसी स्थिति में जहां भारी आर्थिक बोझ से बचा जा सकेगा वहीं राज्यों को बार-बार चुनावी आचार संहिता का भी सामना नहीं करना होगा. नतीजतन विकास कार्यों में कम से कम रुकावट आएगी. इसके अलावा काले धन पर अंकुश लगेगा और आम लोगों को भी बार-बार चुनावों के दौरान होने वाली परेशानी से नहीं जूझना होगा. बीजेपी की दलील है कि चुनाव अभियान सीमित होने की वजह से जातीय और सांप्रदायिक सद्भाव भी बरकरार रहेगा.

लेकिन दूसरी ओर, विपक्ष की दलील है कि इससे कम संसाधनों के साथ मैदान में उतरने वाली क्षेत्रीय पार्टियों पर वजूद का संकट पैदा हो जाएगा. साथ ही क्षेत्रीय मुद्दों पर राष्ट्रीय मुद्दे हावी रहेंगे. नतीजतन वोटरों का भ्रम बढ़ेगा. इसके अलावा चुनावी नतीजों में काफी देरी होगी.

विरोध

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी समेत कई नेताओं ने प्रधानमंत्री की ओर से बुलाई बैठक में शामिल होने से मना कर दिया है. ममता ने केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री प्रहलाद जोशी को भेजे अपने पत्र में कहा है, "केंद्र सरकार को इस मुद्दे पर जल्दबाजी दिखाने की बजाय पहले एक श्वेतपत्र तैयार करना चाहिए. साथ ही विशेषज्ञों से सलाह-मशविरा जरूरी है.” ममता ने अपने पत्र में कहा है कि इतने कम समय में एक राष्ट्र, एक चुनाव जैसे संवेदनशील और गंभीर विषय पर कोई फैसला करना इसके साथ समुचित न्याय नहीं होगा. इस बारे में संवैधानिक विशेषज्ञों, चुनाव विशेषज्ञों और तमाम दलों के सदस्यों के साथ विचार-विमर्श जरूरी है. तृणमूल कांग्रेस अध्यक्ष ने अनुरोध किया है कि इस मुद्दे पर श्वेतपत्र तैयार कर पर्याप्त समय देकर तमाम दलों के विचार जानना जरूरी है. सिर्फ ऐसा करने से ही इस अहम मुद्दे पर ठोस सुझाव मिलेंगे. डीएमके नेता एमके स्टालिन ने पहले से व्यस्त कार्यक्रम होने की दलील देकर बैठक में जाने से इंकार किया है.

सीपीएम नेता एस रामचंद्रन पिल्लै ने इस अवधारणा को अव्यावहारिक करार देते हुए कहा है कि इसके जरिए लोगों के जनादेश को तोड़-मरोड़ा जा सकता है. सीपीआई के डी राजा कहते हैं, "बीजेपी एक राष्ट्र-एक संस्कृति-एक राष्ट्र-एक भाषा लागू करना चाहती है. ताजा प्रस्ताव भी उसी सिलसिले की अगली कड़ी है.”

पूर्व निर्वाचन आयुक्त टीएस कृष्णमूर्ति कह चुके हैं कि यह विचार आकर्षक है, लेकिन विधायिकाओं का कार्यकाल निर्धारित करने के लिए संविधान में संशोधन किए बिना इसे अमल में नहीं लाया जा सकता. वह कहते हैं, जब तक सदन का कार्यकाल तय नहीं होगा, इसे लागू करना संभव नहीं है. इसके लिए संविधान में संशोधन करना होगा. पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने बीते साल अगस्त में इस विचार को लागू करने के लिए संविधान संशोधन की जरूरत पर जोर दिया था. लेकिन क्या निकट भविष्य में इसे लागू किया जा सकता है? इस सवाल पर उनका जवाब था, "इसका कोई चांस नहीं है.”

चुनाव आयोग की ओर से इस विचार को खारिज किए जाने के बाद बीजेपी अध्यक्ष अमत शाह ने विधि आयोग को एक साथ चुनाव कराने के समर्थन में पत्र लिखा था. उन्होंने लगातार चुनावों से सरकारी कामकाज में होने वाली बाधाओं और चुनावों पर भारी-भरकम खर्च के बोझ की दलील दी थी. उसके बाद विधि आयोग ने इस विचार के समर्थन में एक ड्राफ्ट रिपोर्ट तैयार की थी. लेकिन जम्मू-कश्मीर को इसके दायरे से बाहर रखा गया था.आयोग ने अपनी उस रिपोर्ट में कहा था कि लोकसभा व विधानसभा के चुनाव एक साथ कराने से देश लगातार 'चुनावी मोड' में रहने से बच सकता है. इससे खर्चों में कटौती के साथ ही प्रशासन पर भी दबाव घटेगा और सरकारी नीतियों को बेहतर तरीके से लागू किया जाए सकेगा. आयोग ने इसके लिए जरूरी संविधान संशोधन भी सुझाए थे.

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि भारत जैसे विशाल और सैकड़ों राजनीतिक दलों वाले देश में एक राष्ट्र,एक चुनाव की नीति को लागू करना व्यावहारिक नहीं है. राजनीतिक विज्ञान के प्रोफेसर मिथुन कुमार दास कहते हैं, "सुनने में यह विचार भले आकर्षक लगे, जमीनी स्तर पर इसे लागू करने की राह में कई व्यावहारिक और कानूनी दिक्कतें हैं. छोटे देशों में तो ऐसा संभव है, लेकिन यहां फिलहाल ऐसा होना संभव नहीं लगता.”

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