कितना टिकाऊ है मालदीव का लोकतंत्र | दुनिया | DW | 09.03.2016
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दुनिया

कितना टिकाऊ है मालदीव का लोकतंत्र

सफेद रेत वाले समुद्री तट वाले देश मालदीव की ट्रॉपिकल सुंदरता और लक्जरी रिजॉर्टों के पीछे एक संघर्षरत अपेक्षाकृत युवा लोकतंत्र है. आठ साल पहले लोकतंत्र की राह पर चला यह देश राजनीतिक सत्ता संघर्ष झेल रहा है.

मालदीव के ज्यादातर विपक्षी नेता या तो जेल में हैं या तो देश-निकाला झेल रहे हैं. सार्वजनिक विरोध प्रदर्शनों पर कड़ी सख्ती हो रही है और अदालतें भी पूरी विधिवत प्रक्रिया में कोताही करती दिख रही है. सवाल ये है कि क्या मालदीव फिर से अपने आठ साल पहले वाले निरंकुश अवतार में आ रहा है, जहां मतभेदों के लिए भी कोई स्थान नहीं.

हिन्द महासागर में स्थित मालदीव अपने लक्जरी रिजॉर्ट्स के लिए दुनिया भर में मशहूर है. इसकी अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार भी पर्यटन ही है. करीब दो साल पहले राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन ने देश के नए नवेले अनुभवहीन लोकतंत्र पर शिकंजा कसना शुरु किया. और उन्हें चुनौती देने वाला भी कोई ना था.

विपक्ष बिखरा हुआ है और हर तरह की आजादी पर पहरा है. 2008 में हुए लोकतांत्रिक चुनाव प्रक्रिया में जीत कर आए मोहम्मद नशीद एक लोकपंत्र समर्थक कार्यकर्ता रहे हैं. उन्हें 13 साल की जेल की सजा सुनाई गई और उनके दो रक्षा मंत्रियों को भी लंबी जेल की सजा सुनाई गई. इसके खिलाफ लोग सड़कों पर उतरे तो विरोध प्रदर्शनों पर भी रोक लगा दी गई. जिन सीमित जगहों पर इसकी अनुमति दी गई वहां ज्यादा लोग नहीं जुटे.

हालत ये है कि राष्ट्रपति यामीन के उपराष्ट्रपतियों को संसद में बाकी सांसदों ने नकार दिया. पहले ने देश छोड़ दिया और दूसरे को राष्ट्रपति की हत्या की कोशिश के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया. एमनेस्टी इंटरनेशनल के मालदीव मामलों के शोधकर्ता अब्बास फैज का कहना है, "अगर सत्तारूढ़ दल विपक्ष को काम ही ना करने दे तो ऐसे लोकतंत्र में दोष है...और मालदीव की यही सच्चाई है."

अमेरिका ने भी राजनीति से प्रेरित मुकदमे न करने और देश को "लोकतंत्र और मानव अधिकारों के प्रति समर्पित बनाने" का आह्वान किया है. 2008 में हुए पहले लोकतांत्रिक चुनावों से पहले करीब 30 सालों तक देश में मामून अब्दुल गयूम का राज चलता था. लोकतांत्रिक चुनावों में प्रधानमंत्री चुने गए मोहम्मद नशीद से बहुत कम समय में ही कई तरह के विवाद जुड़ गए. सुप्रीम कोर्ट पर ताला लगाने और विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार करवाने जैसे आरोपों में उन पर अपनी सत्ता का दुरुपयोग करने का लांछन लगा.

अचानक विवादास्पद परिस्थितियों में पद छोड़ने के बाद नशीद ने 2013 में फिर यामीन के खिलाफ चुनाव लड़ा. लेकिन उसके नतीजों को विवादास्पद माना जाता है. यूरोपीय संघ मालदीव के साथ मिलकर उसके लोकतंत्र को सुधारने का काम कर रहा है लेकिन हाल की घटनाओं से इस पर भी संकट के बादल घिरे दिखते हैं. मालदीव और श्रीलंका में ईयू मिशन के उप प्रमुख पॉल गॉडफ्रे बताते हैं, "2013 के चुनावों के बाद से ही हमने इस अभियान को पीछे की ओर जाते देखा है...इसे देखकर तो हमें विश्वास नहीं होता कि यहां 2018 में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव हो पाएंगे."

आरपी/एमजे (एपी,पीटीआई)

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