कार्बन खेतीः जलवायु परिवर्तन का समाधान या सिर्फ ढकोसला? | दुनिया | DW | 07.05.2022

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दुनिया

कार्बन खेतीः जलवायु परिवर्तन का समाधान या सिर्फ ढकोसला?

यूरोप में कृषि उत्पादन से हर साल लाखों टन सीओटू पैदा होती है. क्या अपनी जमीनों पर कार्बन को रोके रखने और उसके क्रेडिट बेचने के लिए किसानों को प्रोत्साहित करने से उत्सर्जनों को कम करने में मदद मिल पाएगी?

 इस तरह के पौधे कार्बन को जमीन में रोके रखने में कारगर हैं

इस तरह के पौधे कार्बन को जमीन में रोके रखने में कारगर हैं

बेल्जियम में खेती करने और डेयरी चलाने वाले क्रिस हाइरबाउट कहते हैं, "अब समाज किसानों से और ज्यादा की उम्मीद करता है. ना सिर्फ हम भोजन पैदा करते हैं बल्कि हम जलवायु परिवर्तन को कम करने में भी मदद करते हैं."

एंटवर्प बंदरगाह से 30 किलोमीटर दूर टेम्से नगर में हाइरबाउट का अपने खेत और डेयरी हैं. फार्म के बाहर डेयरी उत्पादों का उनका छोटा सा स्टोर है जहां आइसक्रीम भी रखी है, उनकी अपनी गायों के दूध से तैयार.

दो साल पहले, पर्यावरण पर खेती से होने वाले नुकसान के प्रति चिंता जताते हुए हाइरबाउट ने कार्बन फार्मिग के पायलट प्रोजेक्ट पर हस्ताक्षर किए थे. प्रोजेक्ट को यूरोपीय संघ से फंडिंग मिलती है और इसका लक्ष्य जलवायु परिवर्तन से निपटते हुए मिट्टी की सेहत को सुधारने का है.   

ये प्रोजेक्ट, 2021 की गर्मियों में पूरा हो गया. इसकी बदौलत बेल्जियम, नीदरलैंड्स, जर्मनी और नॉर्वे के किसान अपनी जमीनों पर जमा हुए कार्बन के बदले कार्बन क्रेडिट बेचने में समर्थ हुए. यूरोपीय संघ ने किसानों को वैज्ञानिक परामर्श और प्रशासनिक सहयोग दिया जिसकी मदद से किसान स्थानीय कंपनियों को अपने पहले क्रेडिट जारी कर पाए.

दिसंबर 2021 में यूरोपीय संघ ने अपना कार्बन खेती अभियान पेश किया. उसका इरादा इस परियोजना को पूरे यूरोप में उतारने का था. यूरोपीय संघ की इस पहल से किसान खेती के तरीकों में बदलाव को प्रेरित हुए हैं, जैसे कि कार्बन से भरपूर उर्वरकों का इस्तेमाल, मिट्टी को खराब करने वाली जुताई में कटौती, और वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड को सोखने वाले पेड़ और फसलें उगाना.

क्रिस हाइरबाउट के लिए डेयरी बेहद अहम है

क्रिस हाइरबाउट के लिए डेयरी बेहद अहम है

खेती के तरीकों में बदलाव

मिट्टी सबसे अहम कार्बन भंडार होती है लेकिन औद्योगिक खेती, सीओटू को सोखने के बजाय अक्सर उसे छोड़ती है- उदाहरण के लिए खेत में बार बार हल चलाने से मिट्टी की गुणवत्ता कम होती जाती है.

इस पहल पर हस्ताक्षर करने के बाद से हाइरबाउट ने संकरी पत्तियो वाले प्लान्टेन (केले) की रोपाई की है- यह एक सदाबहार किस्म की खरपतवार है जिसमें कार्बन को सोखने की जबर्दस्त क्षमता होती है. वो ऐसी फसलें भी उगाते हैं जो पूरे साल बदल बदल कर लगाई जा सकती हैं. कुल मिलाकर उनके पास करीब 14 हेक्टेयर जमीन है जिस पर उन्होंने घास, दूब, अल्फाल्फा (या रिजका), चिकरी (या कासनी) और रिबवर्ट प्लान्टेन जैसे पौधे लगाए हैं जो पूरे साल सीओटू को सोखते रहते हैं. 

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वो बताते हैं, "क्योंकि हम साल में चार बार घास काटते हैं, और जुताई की मशीनें नहीं चलाते हैं, तो पौधों की जड़ें मिट्टी में जो सारा कार्बन ले आती हैं वो वहीं रहती है." 

हाइरबाउट ने एक खेत को एग्रोफॉरेस्ट्री यानी कृषि-वानिकी के लिए रख छोड़ा है जिसमें फसल और घासफूस के आसपास पेड़-पौधे उगाए जाते हैं. ये पेड़ कार्बन को सोखते हैं और उनकी छाया में गायें गर्मियों में घास चरती हैं. यह भी एक तरीका है जो सीओटू सोखने में किसानों का मददगार हो सकता है.

मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार

यूरोपीय संघ को उम्मीद है कि किसानों को वित्तीय मदद मिलेगी तो वे खेती की अपनी जमीनों में कार्बन उत्सर्जन वाले तरीके छोड़कर उसे वहीं पर रोके रखने वाले तरीकों की ओर मुड़ेंगे. कार्बन खेती की पहल यूरोपीय हरित समझौते का हिस्सा है. ये समझौता 2050 तक जलवायु निरपेक्ष होने के यूरोपीय संघ के रोडमैप की तरह है. यूरोपीय पर्यावरण एजेंसी के डाटा के मुताबिक अंदाजन साढ़े 38 करोड़ टन सीओटू यूरोपीय खेती से उत्सर्जित होती है. यूरोप के कुल उत्सर्जनों का यह 10 प्रतिशत से ज्यादा है.

बार बार हल चलाने से भी मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित होती है

बार बार हल चलाने से भी मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित होती है

पर्यावरण से जुड़े गैर सरकारी संगठनों के एक नेटवर्क, यूरोपीय पर्यावरण ब्यूरो से जुड़ी सीलिया नाइसेन्स कहती हैं, "मिट्टी की कार्बन सामग्री उसकी गुणवत्ता की एक अच्छी प्रतिनिधि है." हाल के दशकों में यूरोप में प्रचलित गहन कृषि कार्यों से मिट्टी को नुकसान पहुंचा है. 2020 में यूरोपीय आयोग का एक अध्ययन बताता है कि यूरोपीय संघ में 60-70 फीसदी मिट्टी खराब हो चुकी है. इसकी एक बड़ी वजह है सघन खेती, कीटनाशकों का इस्तेमाल और अत्यधिक सिंचाई.

जुताई विहीन खेती का जो तरीका हाइरबाउट ने अपनाया है वो मिट्टी की सेहत को सुधारने का एक उपाय है. कार्बन को संरक्षित करने में मिट्टी की मददगार दूसरी तकनीकों में शामिल हैं- क्रॉप रोटेशन यानी फसल-चक्र, मिट्टी में नाइट्रोजन बनाए रखने के लिए परती भूमि पर कवर क्रॉप यानी मिट्टी को ढक कर रखने वाली फसल लगाना और रासायनिक उर्वरकों के बदले कम्पोस्ट का इस्तेमाल करना. ये तरीके मिट्टी में दूसरे जरूरी पोषक तत्वों की हिफाजत भी करते हैं जिनकी जरूरत पौधों को होती है, फिर उन्हें कृषि रसायनों की जरूरत कम हो जाती है.

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कार्बन योजना की आलोचनाएं

कार्बन को समायोजित करने वाली इन योजनाओं की लंबे समय से आलोचना भी होती रही है. उन पर आरोप लगता है कि उनकी बदौलत कंपनियां, व्यक्ति और राज्य नेट जीरो लक्ष्यों तक अपनी पहुंच को खरीद लेते हैं. पिछले साल अमेरिकी संसद को लिखी एक चिट्ठी में 200 से ज्यादा एनजीओ ने सांसदों से उस बिल का विरोध करने की मांग की है जिस पर अभी संसद के निचले सदन यानी प्रतिनिधि सभा में बहस चल रही है और जिसका उद्देश्य अमेरिका में कार्बन खेती को बढ़ावा देना है.

विरोध करने वालों की दलील है कि "कार्बन उत्सर्जनों को वास्तव में कम करने और खत्म करने के बजाय ऊर्जा संयंत्र, रिफाइनरियां और दूसरे प्रदूषक इन कार्बन क्रेडिटों को खरीद कर अपने उत्सर्जनों की भरपाई कर सकते हैं या उन्हें बढ़ा भी सकते हैं."

हायरबाउट के पास 14 एकड़ जमीन है जिस पर वो इस तरह के पौधे लगाते हैं

हायरबाउट के पास 14 एकड़ जमीन है जिस पर वो इस तरह के पौधे लगाते हैं

कार्बन फार्मिग ने कई बहुराष्ट्रीय निगमों का ध्यान भी खींचा है, जैसे कि माइक्रोसॉफ्ट है. कार्बन खेती की शुरुआती परियोजनाओं में शामिल अमेरिकी किसानों के पैदा किए कार्बन क्रेडिटों को माइक्रोसॉफ्ट ने 40 लाख डॉलर से ज्यादा की रकम में खरीद लिया है. इसके जरिए टेक्नोलजी की ये विशाल कंपनी अपने उत्सर्जनों को ऑफसेट यानी समायोजित करेगी.

हालांकि हाइरबाउट की ज्यादा हरित खेती विधियों का इस्तेमाल अपने प्रदूषण की भरपाई के लिए करने वाली कंपनियां, बहुराष्ट्रीय नहीं हैं. इस साल की शुरुआत में हाइरबाउट ने अपने पहले कार्बन क्रेडिट, एक लोकल डेयरी प्रोसेसर, मिल्कोबेल को 50 डॉलर प्रति टन सीओटू के हिसाब से बेचे थे.

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हाइबरबाउट को फ्लैंडर्स इलाके में दूसरे छोटे व्यापारिक प्रतिष्ठानों से गठजोड़ की उम्मीद है. वो कहते हैं कि, "स्थानीय स्तर पर ही कार्बन क्रेडिट खरीदने का लाभ ये है कि आप किसानों से मिल सकते हैं- लोग साथ बैठ सकते हैं हमारे साथ खा पी सकते हैं, खेतों का दौरा कर सकते हैं." हालांकि पायलट प्रोजेक्ट खत्म हो गया है, फिर भी हाइरबाउट कार्बन खेती जारी रखना चाहते हैं.

नीदरलैंड्स के राबो बैंक के कराए एक अध्ययन के मुताबिक, किसान हर साल करीब 3.6 मीट्रिक टन कार्बन प्रति हेक्टेयर अपने हाथों से सोखे रख सकते हैं. इसके लिए, उन्हें अपनी खेती के बदले हुए तरीकों में अच्छा खासा निवेश करना होगा. उन्हें स्वतंत्र विशेषज्ञ भी रखने होंगे जो मिट्टी की गुणवत्ता को जांचने वाले महंगे विश्लेषण करेंगे.      

खेती में रचनात्मक होने की गुंजाइश

हाइरबाउट कहते हैं कि यह एक थकाऊ और सख्त प्रक्रिया है जो कुछ किसानों को इस योजना से दूर कर सकती है. कुछ आलोचक आशंकित हैं कि और छोटे उद्योग, कार्बन खेती के फायदे हासिल नहीं कर सकेंगे और इसका लाभ औद्योगिक खेती से जुड़े बड़े उद्योगो को मिलेगा. 

हाइरबाउट ने एक प्रयोगशाला भी बनाई है जहां वो प्रोटीन से भरे सूक्ष्म शैवाल उगाते हैं

हाइरबाउट ने एक प्रयोगशाला भी बनाई है जहां वो प्रोटीन से भरे सूक्ष्म शैवाल उगाते हैं

बायोईंधन या वन लगाने के अभियानों से पैदा होने वाले कार्बन ऑफसेट की वजह से पूरी दुनिया में जमीन पर कब्जे की घटनाएं बढ़ी हैं यानी बड़े निगमों ने बड़े पैमाने पर भूमि अधिग्रहण किया है.

यूरोपीय पर्यावरण ब्यूरो की नाइसेन्स मानती हैं कि यूरोपीय संघ की कार्बन खेती प्रणाली का डिजाइन कमजोर है और इसके चलते उसी जाल में फंसने का खतरा है. वो कहती हैं, "अगर हम ऐसा सिस्टम बनाते हैं जिसमें ज्यादा से ज्यादा जमीन होने की अहमियत होती है तो इस तरह आप समस्याओं को बढ़ाएंगे ही, क्योंकि उसमें आप कार्बन सोखकर क्रेडिट बेच भी सकते हैं ."

अपने छोटे से डेयरी फार्म में हाइरबाउट कहते हैं कि कार्बन खेती उन्हें अपनी जमीन की सेहत को सुधारने का अवसर देती है और थोड़ा अतिरिक्त आय भी हो जाती है. ये उनका अकेला ईकोफ्रेंडली उद्यम नहीं है. कार्बन खेती के अलावा वो माइक्रोएल्गी पर आधारित नये खाद्य उत्पाद बनाने के लिए एक लैब भी बना रहे हैं. माइक्रोएल्गी की प्रोटीन से भरपूर कोशिकाएं मांस के विकल्प के रूप में तेजी से उपयोग में आ रही है.

हाइरबाउट अपने स्टोर में आगंतुको का स्वागत करते हैं और उन्हें अपनी सबसे ताजा पेशकश का स्वाद चखाते हैं, ये हेजलनट और उनकी अपनी बनाई माइक्रोएल्गी से तैयार आइसक्रीम है. वो कहते हैं, "पिछले दशकों में किसानों ने एक चीज में महारत हासिल की है. और अब हम जानते हैं कि अगर ये चीज गलत निकल जाए तो तो ये बड़ी समस्या बन सकती है."

वीडियो देखें 06:03

असम में है दुनिया का पहला कार्बन न्यूट्रल चाय बागान

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