कामकाजी लोगों का जीवन आसान बनाता को-लिविंग | लाइफस्टाइल | DW | 23.04.2019
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लाइफस्टाइल

कामकाजी लोगों का जीवन आसान बनाता को-लिविंग

भारतीय शहरों में कामकाजी तबके की बढ़ती आबादी ने अलग-अलग लोगों के को-लिविंग यानी साथ रहने जैसी नई अवधारणा को तेजी से बढ़ावा दिया है. ये लोगों को घर ढूंढने के झंझट से तो बचा ही रहा है साथ ही अकेलापन भी दूर कर रहा है.

को-लिविंग ऐसी आवासीय व्यवस्था को कहा जाता है जहां रहने वालों के लिए अलग बेडरूम और साझा किचन व मनोरंजन कक्ष होते हैं. यह पेइंग गेस्ट से बेहतर है. यहां रहने वाले साथ खाना पकाते हैं या किसी हाउस मेड को रखते हैं. साथ रहते हुए भी उनकी प्राइवेसी बनी रहती है. बेंगलूरु, मुंबई और हैदराबाद जैसे शहरों में यह अवधारणा तेजी से बढ़ रही है और अब कई कंपनियां इस क्षेत्र में उतर आई हैं. एक ताजा सर्वेक्षण में कहा गया है कि अगले 15 वर्षों में कोई 15 करोड़ और लोग इस सहूलियत का फायदा उठाने लगेंगे.

क्या कहता है सर्वे

रियल इस्टेट सर्विस फर्म जेएलएल ने अपने ताजा अध्ययन में कहा है कि अगले 15 साल में शहरों में बढ़ने वाली 15 करोड़ की आबादी को-लिविंग कल्चर में भारत को एशिया-प्रशांत क्षेत्र में सबसे अग्रणी बना देगी. इसमें कहा गया है कि युवा पीढ़ी, उपभोक्ताओं की बदलती प्रवृत्ति और भारतीय बाजारों की प्रगति की वजह से डेवलपर और स्टार्टअप कंपनियां को-लिविंग के बाजार में कदम रख रही हैं. देश में पढ़े-लिखे लोगों की बढ़ती तादाद भी इसमें सहायक है. रिपोर्ट के मुताबिक इनमें से ज्यादातर के पास कोई स्थायी या ज्यादा आय नहीं है. ऐसे में खासकर बड़े शहरों और महानगरों में मकान तलाशना उनके लिए एक भयावह अनुभव हो सकता है. मिसाल के तौर पर देश के कारोबारी केंद्र मुंबई में वेतन में सबसे तेज बढ़ोतरी के बावजूद लोग घर नहीं खरीद सकते.

फिलहाल देश में को-लिविंग सेक्टर का बाजार 120 मिलियन अमेरिकी डॉलर या लगभग 845 करोड़ रुपए का है. लेकिन इस क्षेत्र के विशेषज्ञों के मुताबिक वर्ष 2022 तक इसके बढ़ कर दो अरब डॉलर तक पहुंचने की संभावना है. बेंगलूरु स्थित सलाहकार फर्म क्वार्ट्ज के सहायक निदेशक उज्ज्वल चौधरी कहते हैं, "इस क्षेत्र में लगातार नई कंपनियां आ रही हैं. लेकिन किसी एक कंपनी की मोनोपाली रहने की उम्मीद कम ही है." अलग-अलग जरूरतों और सहूलियतों के साथ इस क्षेत्र में आने वाली कंपनियां इस बाजार में हिस्सेदारी बना सकती हैं.

इस क्षेत्र में कंपनियों का आना लगातार जारी है. बीते साल अक्टूबर में सॉफ्टबैंक के समर्थन वाली हॉस्पिटैलिटी कंपनी ओयो ने ओयो लिविंग नामक को-लिविंग आवास शुरू करने का एलान किया था. बेंगलूरु स्थित जोलो इस साल के अंत तक 50 हजार बिस्तर जोड़ने की योजना बना रही है. फिलहाल छह शहरों में उसकी क्षमता 16 हजार बिस्तरों की है. अमेरिका स्थित वी वर्क नामक कंपनी भी इस साल के अंत तक वी लिव ब्रांड के सर्विस अपार्टमेंट के जरिए इस क्षेत्र में कदम रखने वाली है. कई देशी-विदेशी कंपनियां भी इस क्षेत्र में उतरने वाली स्टार्ट अप कंपनियों में बड़े पैमाने पर निवेश कर रही हैं.

युवाओं की समस्या

भारत में खासकर अविवाहित युवक-युवतियों को किराए पर मकान लेने के मामले में काफी जूझना पड़ता है. मकान मालिक पहले तो उनको मकान देने को तैयार नहीं होते. अगर दे भी दिया तो हमेशा उनको संदेह की निगाहों से देखते हैं. मसलन वह कब लौटता है और कब जाता है? उसके घर में कौन-कौन आते हैं और क्या करते हैं? लेकिन अब नई अवधारणा से महानगरों में अकेले रह कर सूचना तकनीक समेत विभिन्न क्षेत्रों में नौकरी करने वाले युवाओं की मुश्किलें काफी हद तक कम हो जाएंगी. बेंगलूरु में ऐसे ही एक साझा अपार्टमेंट में रहने वाले कोलकाता के प्रभाकर पांडेय बताते हैं, "ऐसे मकानों में आपकी प्राइवेसी भी रहती है और साथ ही एक संयुक्त परिवार में रहने का भी अनुभव होता है. सुबह-सुबह कॉमन हाल में नाश्ता करते या फिर रात के खाने के समय मिलने-जुलने वालों में एक आत्मीयता बन जाती है. घर से दूर यह घर जैसा लगता है.”

बीते पांच वर्षो के दौरान देश में नेस्ट अवे, जोलो और को हो जैसी स्टार्टअप कंपनियों ने कदम रखा है और इसमें सिकोइया कैपिटल और गोल्डमैन सैक्स जैसे निवेशकों ने मोटी रकम निवेश की है. होम रेंटल एप्प को हो के सह-संस्थापक उदय लक्कड़ कहते हैं, "नई पीढ़ी सुविधाओं की अभ्यस्त है. इसके लिए वह पैसे खर्च करने को भी तैयार है. लेकिन पहले किसी शहर में रहने के लिए उन्हें ब्रोकरों के सहारे मकान लेकर मकान मालिक की भेदी निगाहों से जूझना पड़ता था.” वह कहते हैं कि ऐसे मकान लेने वालों को पहले तो ब्रोकरों को मोटा कमीशन देना होता था. ऊपर से मकान मालिक एडवांस के तौर पर मोटी रकम जमा करा लेता था. इसके साथ ही किराएदार को लंबे समय तक रहने की गारंटी देनी होती है. लेकिन फिलहाल देश में लाखों लोग हर 20 महीने पर नौकरियां व शहर बदल लेते हैं. ऐसे में पुरानी प्रक्रिया उनकी राह में सबसे बड़ी बाधा थी.

ओयो के चीफ ग्रोथ ऑफिसर कविकृत कहते हैं, "हम उपभोक्ताओं को ऐसी तमाम समस्याओं से बचाते हैं. वह घर बैठे डिजिटल तरीके से किराए का भुगतान कर सकते हैं. उनको मकान की तलाश के लिए दर-दर भटकना नहीं पड़ता.” इस क्षेत्र में कदम रखने वाली तमाम कंपनियां मकान मालिकों से बड़ी इमारतों को लीज पर लेकर उसे सर्विस अपार्टमेंट में बदल देती हैं. अब पूरी इमारत किराए पर लगे या नहीं, मकान मालिक को हर महीने किराया मिल जाता है. उनकी संपत्ति का रख-रखाव भी होता है.

समाजशास्त्रियों का कहना है कि शहरों में तेजी से बढ़ती युवा पीढ़ी को ये कंपनियां घर तलाशने और अकेलेपन जैसी कई समस्याओं से निजात दिला रही हैं.  समाजशास्त्री रामेश्वर चटर्जी कहते हैं, "युवा पीढ़ी के पास पैसे तो हैं लेकिन उनके पास मकान तलाशने का ना तो समय है और ना ही मकान मालिक की झिक-झिक सुनने का. इसके अलावा किराए का मकान जल्दी-जल्दी नहीं बदला जा सकता. लेकिन खासकर आईटी सेक्टर में काम करने वाले औसतन दो साल पर नौकरियां बदल रहे हैं. ऐसे में युवा पीढ़ी के लिए को-लिविंग काफी मुफीद साबित होगा.”

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