कहानी अलेक्जांडर फॉन हुम्बोल्ट के घर की | दुनिया | DW | 13.09.2019
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दुनिया

कहानी अलेक्जांडर फॉन हुम्बोल्ट के घर की

वे वैज्ञानिक भी थे और दार्शनिक भी, भूगोलविद् और अन्वेषक भी. अलेक्जांडर फॉन हुम्बोल्ट 18वीं और 19वीं सदी के सबसे जाने माने लोगों में से एक थे. यह कहानी है उन्हीं के बर्लिन स्थित घर की.

वे मध्यम कद काठी वाले थे. लगभग हमेशा ही सादे काले कपड़े पहनते थे. औरों से काफी तेज बोला करते थे. चार भाषाएं जानते थे और अच्छे व्यवहार के लिए जाने जाते थे. वे दुनिया के सबसे मशहूर लोगों में से एक भी थे. 19वीं सदी में नई नई यात्राएं करने वालों के लिए वे बेहद दिलचस्प थे. उनके साथ वक्त बिताने वालों का कहना था कि उनके साथ एक या दो घंटे भी बिता लेना किसी म्यूजियम, स्मारक या किसी दिलचस्प इमारत में जाने से ज्यादा मजेदार होता था. लोग खास कर उन्हीं के कारण बर्लिन आया करते थे.

अलेक्जांडर फॉन हुम्बोल्ट का जन्म प्रशिया के सम्राट फ्रेडेरिक महान के राज्यकाल में प्रशिया में हुआ था. वे यूरोप भर में घूमे, लातिन अमेरिका में स्पेन के उपनिवेश में भी गए और फिर आखिरकार पेरिस में जा कर रहने लगे. दो दशकों तक वहां रह कर उन्होंने कई वैज्ञानिक किताबें लिखीं और फिर 1827 में एक राष्ट्रीय हीरो के रूप में बर्लिन लौटे.

लौटने के बाद वे शहर के दो अलग अलग अपार्टमेंट में रहे और फिर आखिरकार मशहूर ओरानिएनबुर्गर श्ट्रासे 67 में उन्होंने 1842 से ले कर 1859 तक अपने जीवन के आखिरी 17 साल बिताए. लेकिन वे अकेले नहीं थे. उनके साथ था उनका बटलर योहान जाइफर्ट, योहान की पत्नी एमिली, जो कि उनके लिए खाना बनाती थीं और इस दंपति के पांच बच्चे. इनके अलावा एक सलेटी रंग का तोता भी उनके साथ रहता था जिसका नाम था याकोब. यह तोता 30 साल तक हुम्बोल्ट घराने का हिस्सा रहा. उनकी मौत के बाद भी, वह वहीं रहता रहा.

यह तीन मंजिला इमारत बर्लिन के रेलवे स्टेशन के करीब थी, हल्के पीले रंग की. निचली मंजिल पर जहां जाइफर्ट परिवार रहता था वहां सड़क की ओर खुलती छह खिड़कियां थीं और एक बड़ा सा दरवाजा जिससे घोड़ागाड़ी भी अंदर जा सकती थी. बिन बुलाए मेहमानों को घर से दूर रखने के लिए दरवाजे पर हुम्बोल्ट का नहीं, जाइफर्ट का नाम लिखा रहता था.

हुम्बोल्ट के नाम पर पड़ा किस किस का नाम

हुम्बोल्ट खुद पहली मंजिल पर रहते थे. यहां सड़क की ओर सात खिड़कियां खुलती थीं. मेहमान ड्योढ़ी में दाखिल होते जहां किताबें ही किताबें होतीं. ये सिर्फ हुम्बोल्ट द्वारा जमा की हुई किताबें नहीं थीं, बल्कि इनमें उनकी यात्राओं का लेखा जोखा था. आगे जाने पर अगला कमरा था लाइब्रेरी का. यहीं हुम्बोल्ट वैज्ञानिकों से मुलाकात करते थे. शाही परिवार के लोग भी जब उनसे मिलने आते, तो यहीं बैठा करते.

इस लाइब्रेरी के बाद आता था उनका स्टडी का कमरा. यहां वे काम किया करते थे. कुछ वक्त के लिए तो उन्होंने यहां एक छह इंच लंबी गिरगिट भी पाली हुई थी. उसे कांच के एक बक्से में रखा गया था. इस कमरे में पहुंचते ही एक बड़ी से लकड़ी की मेज और दीवार पर एक बड़े से दुनिया के नक्शे पर नजर जाती थी. इससे आगे किसी भी कमरे में जाने की अनुमति मेहमानों को नहीं थी. लेकिन यहां आने वाले इस बात से बहुत प्रभावित हुआ करते थे कि सर्दी में यह घर कितना गर्म रहता था.

कुल मिला कर यह कोई बहुत बड़ा महलनुमा घर नहीं था. लेकिन यह हुम्बोल्ट की दो बड़ी जरूरतों को पूरा करता था - उनकी लाइब्रेरी और स्टडी. और ये दोनों कमरे ठीक ठीक कैसे दिखते थे, इसका पता चलता है एडवर्ड हिल्डेब्रांट की दो पेंटिंग के जरिए.

Alexander v. Humboldt / E.Hildebrandt in seinem Arbeitszimmer (picture-alliance/akg-images)

एडवर्ड हिल्डेब्रांट की पेंटिंग

वे किस तरह का जीवन जीते थे, यह पता चलता है अमेरिकी अखबार "कमर्शियल एडवर्टाइजर" के एक लेख से. हुम्बोल्ट 81 वर्ष के थे जब एक अमेरिकी पत्रकार उनसे मिलने पहुंची. 1 जनवरी 1850 के अंक में छपा, "हुम्बोल्ट की आदतें असाधारण नहीं हैं, बस वे सोते बहुत कम हैं और हर काम नियमित रूप से करते हैं. उनका वक्त बेहद व्यवस्थित ढंग से बंटा हुआ है. सर्दियों में वे छह बजे जगते हैं और गर्मियों में पांच बजे. दो घंटे अध्ययन करते हैं, फिर एक कप कॉफी पीते हैं और अपनी स्टडी में लौट आते हैं और चिट्ठियों के जवाब देने के काम में लग जाते हैं."

"दोपहर 12 बजे से 2 बजे तक वे मेहमानों से मिलते हैं और दो बजे के बाद फिर काम में लग जाते हैं. चार बजे वे खाना खाते हैं. गर्मियों में राजा के साथ और सर्दियों में घर पर. चार से ग्यारह तक वे अकसर राजा के ही साथ रहते हैं. कभी कभार अन्य बुद्धिजीवियों के साथ इस दौरान मुलाकात करते हैं और या फिर दोस्तों के साथ यह वक्त गुजारते हैं. रात ग्यारह बजे वे अपनी स्टडी में लौट जाते हैं और एक या दो बजे तक पत्रों के उत्तर देते हैं या फिर अपनी किताबें लिखते हैं या फिर उनकी तैयारी करते हैं."

हुम्बोल्ट जितना हो सके अपने रुटीन से ही काम करने की कोशिश करते थे. सितंबर 1858 को उन्होंने बर्लिन के करीब पोट्सडाम में महारानी के साथ अपना 89वां जन्मदिन मनाया. इसके अगली मार्च में उन्होंने बर्लिन के एक अखबार में अपने प्रशंसकों के नाम एक पत्र लिखा. उन्होंने लोगों से विनती की कि वे उन्हें ऐसे मामलों से जुड़े पत्र ना भेजें जिनके बारे में उन्हें कोई जानकारी ही नहीं. उनका यह निवेदन अजीब लग सकता है लेकिन दरअसल उन्हें अपने लिए वक्त की जरूरत थी.

उनकी इस चिट्ठी को दुनिया भर में 130 बार प्रकाशित किया गया. और कुछ ही हफ्तों बाद 6 मई 1859 को दोपहर ठीक ढाई बजे उनका देहांत हो गया. उनकी मौत की खबर सुन कर रानी विक्टोरिया ने अपनी बेटी को लिखा, "हुम्बोल्ट की मौत ने हमें बहुत, बहुत दुख पहुंचाया है. वे ड्यूक ऑफ वेलिंग्टन की तरह उन लोगों में से थे, जिनके बारे में सोचा जाता है कि वे कभी मर नहीं सकते. प्रशिया ने आज बहुत कुछ खो दिया है."

Alexander v.Humboldt Scharder (picture-alliance/akg-images)

अलेक्जांडर फॉन हुम्बोल्ट

चार दिन बाद उनका अंतिम संस्कार किया गया. शवयात्रा के दौरान पूरे बर्लिन की इमारतों पर शोक में काले झंडे लगाए गए. उनके परिवार के अलावा आम नागरिक भी वहां पहुंचे. यूनिवर्सिटी के 600 छात्र भी वहां मौजूद थे. 30 साल तक हुम्बोल्ट के लिए काम करने के कारण उनकी मृत्यु के बाद उनकी सारी सम्पत्ति उनके बटलर जाइफर्ट को सौंप दी गई. उसी साल सितंबर में उनके सामान की नीलामी हुई. इसमें उनकी पेंटिंग, तसवीरें, मेडल, कई कलाकृतियां, एक छुद्रग्रह का टुकड़ा और उनके स्टडी की वह मेज भी शामिल थी.

उनकी लाइब्रेरी को दो बार बेचने की कोशिश की गई और फिर 1865 में लंदन के सॉथबी ऑक्शन हाउस ने उसे नीलाम करने का काम संभाला. इस नीलामी का कैटेलॉग ही 800 पेज लंबा था. अनुमान लगाया गया था कि नीलामी पूरा होने में 31 दिनों का समय लग जाएगा. लेकिन नीलामी के तीसरे ही दिन एक भयानक आग ने उनकी अधिकतर किताबों को जला कर खाक कर दिया. केवल 574 किताबों को ही बचाया जा सका. प्रशिया के अलेक्जांडर फॉन हुम्बोल्ट को विज्ञान जगत में उनके योगदान के लिए हमेशा याद रखा जाएगा.

रिपोर्ट: टिमथी रूक्स/आईबी

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