कहां तक फैले हैं सऊदी-ईरान विवाद के तार | दुनिया | DW | 05.01.2016
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दुनिया

कहां तक फैले हैं सऊदी-ईरान विवाद के तार

ईरान और सऊदी अरब के बीच शुरू हुआ विवाद कोई नई बात नहीं है. सालों से दोनों के बीच शिया सुन्नी विवाद होते रहे हैं. लेकिन गेहूं के साथ घुन भी पिसता है. जानिए किस किस पर पड़ेगा इसका असर.

अरब दुनिया के लिए ईरान और सऊदी अरब दोनों ही बेहद महत्वपूर्ण देश हैं. ईरान शिया बहुल देश है और सऊदी अरब सुन्नी बहुल. दोनों ही खुद को इस्लाम के इन पंथों का रखवाला साबित करने की होड़ में रहते हैं.

किस किस पर पड़ेगा असर?

इन दोनों के बीच का विवाद आसपास के देशों पर भी बड़ा असर डाल सकता है, खास कर सीरिया और यमन में शांति बहाली की कोशिशों को इस तनाव से भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है. सीरिया में 2011 से और यमन में 2015 से गृहयुद्ध चल रहा है और इन देशों में ईरान और सऊदी अरब का काफी प्रभाव है. इनके अलावा खाड़ी देश बहरीन और इराक में भी शिया सुन्नी मतभेद तेज हो सकता है.

विवाद को क्यों नहीं रोक रहा रियाद?

तेल का विशाल भंडार होने के बाद भी सऊदी अरब खुद को कमजोर दिखाने की कोशिश कर रहा है. वह अरब दुनिया के सामने यह सिद्ध करना चाहता है कि उसे तेहरान से खतरा है. माना जाता है कि सऊदी अरब पर इस्लामिक स्टेट का भी दबाव है. तेल की गिरती कीमतों को भी एक बड़ा कारण माना जा रहा है. तनाव के शुरू होने के बाद तेल की कीमतों में एक बार फिर से उछाल देखा गया, जो कि सऊदी अरब के मुनाफे का संकेत है.

तेहरान की दिलचस्पी किसमें है?

ईरान खुद को मध्य पूर्व का सबसे अहम देश मानता है. राजनयिक तौर पर वह इलाके के सभी महत्वपूर्ण फैसलों में शिरकत करना चाहता है. साथ ही वह अमेरिका का विरोधी है और यह साबित करना चाहता है कि अरब दुनिया में बगैर पश्चिम की दखलअंदाजी के भी फैसले लिए जा सकते हैं. वह फलीस्तीन को स्वतंत्र देश घोषित कराना चाहता है और साथ ही अरब मुल्कों में शिया अल्पसंख्यकों की आवाज बनना चाहता है.

सीरिया की शांति वार्ता पर इसका क्या असर होगा?

ईरान सीरिया सरकार के सबसे अहम हिमायतियों में से एक है, जबकि सऊदी अरब विरोधियों के पक्ष ले रहा है. यदि इन दोनों में आपसी सहमति नहीं बनती, तो सीरिया में गृहयुद्ध को खत्म करना और शांति स्थापित करना नामुमकिन होगा. 2015 में दोनों देशों को पहली बार सीरिया मामले में बैठक के लिए एक साथ मेज पर लाया गया. 25 जनवरी 2016 को अहम फैसला लिया जाना था. लेकिन मौजूदा हालात में किसी आपसी समझौते पर पहुंचना आसान नहीं.

यमन के गृहयुद्ध पर क्या असर होगा?

वहां भी हालात सीरिया जैसे ही बने हुए हैं. फर्क इतना है कि सऊदी अरब राष्ट्रपति अब्द राबु मंसूर हादी को सैन्य मदद पहुंचा रहा है, जबकि ईरान शिया विद्रोहियों का साथ दे रहा है. इन विद्रोहियों ने देश के बड़े हिस्से पर कब्जा किया हुआ है. दिसंबर 2015 में स्विट्जरलैंड में हुई शांति वार्ता का कोई परिणाम नहीं निकला था और युद्धविराम भी लागू नहीं हो सका था. यमन के मुद्दे पर भी जनवरी के अंत में बातचीत होनी है.

बहरीन में क्यों है विवाद?

हालांकि बहरीन का राजपरिवार सुन्नी है लेकिन इस देश में शिया बहुमत में हैं. 2011 में हुए अरब वसंत के दौरान शिया आबादी ने सुन्नी राजघराने के खिलाफ आवाज उठाई थी. सुलतान की मदद के लिए सऊदी अरब ने देश में अपनी सेना भेज दी. यह विवाद अब भी पूरी तरह सुलझा नहीं है और सऊदी अरब को डर है कि वहां भी कहीं शिया अल्पसंख्यक सरकार के खिलाफ आवाज ना उठाने लगें. इसी कारण शिया नेता निम्र अल निम्र और अन्य कई शियाओं को मौत की सजा दी गयी. यहीं से ताजा विवाद शुरू हुआ.

आईबी/एमजे (डीपीए)

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