कस्बे से आई करिश्मे की किरण हॉफ़ेनहाइम | NRS-Import | DW | 17.08.2010
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NRS-Import

कस्बे से आई करिश्मे की किरण हॉफ़ेनहाइम

जर्मन भाषा में हॉफ़ेन का मतलब है उम्मीद, कस्बाई ज़मीन से उभरकर राष्ट्रीय फ़ुटबॉल के स्तर पर आने वाला क्लब हॉफेनहाइम बहुतों की राय में जर्मन फ़ुटबॉल जगत में एक नई उम्मीद लेकर आया है.

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माटी का लाल डीटमार हॉप

परबत के पीछे बाडेन-व्युर्टेमबर्ग प्रदेश का छोटा सा कस्बा ज़िंसहाइम, उसका एक गांव हॉफेनहाइम, गांव में तीन हज़ार लोग रहते हैं. गांव में एक फ़ुटबॉल क्लब था टीएसजी 1899 हॉफेनहाइम. क्लब की टीम में एक नौजवान सेंटर फ़ॉरवर्ड था डीटमार हॉप. फिर वह अपनी किस्मत की तलाश में निकला बाहरी दुनिया में. अपने तीन साथियों के साथ उसने सॉफ़्टवेयर की कंपनी खोली. देखते ही देखते वह यूरोप की सबसे बड़ी सॉफ़्टवेयर कंपनी बन गई- एसएपी.

इस कहानी का फ़ुटबॉल से क्या नाता है? डीटमार हॉप ने इतने पैसे कमाए कि उन्हें जर्मनी के सबसे अमीर अरबपतियों में से गिना जाने लगा. उम्र हो रही थी, सो उसने सोचा कि पब्लिक के लिए, मसलन फ़ुटबॉल के लिए कुछ किया जाए. किसी क्लब में पैसे लगाए जाएं. लीवरपुल? नहीं, उन्होंने तय किया कि अपने गांव का नाम रोशन करना है. उसने टीएसजी 1899 हॉफेनहाइम में पैसा लगाना शुरू किया. एक काबिल खेल मैनेजर रखा गया, राल्फ़ रांगनिक. उनके निर्देशन में सबसे पहले 12 से 19 साल के खिलाड़ियों की कोचिंग शुरू की गई. क्लब तीसरे स्तर की क्षेत्रीय लीग तक पहुंच गई. चार साल तक यहां अनुभव जुटाए गए. फिर हॉप को लगा कि अब बुनियाद तैयार हो चुकी है, ऊपर की ओर जाना है. सन 2006 में रांगनिक के साथ मिलकर तीन साल का एक कार्यक्रम तैयार किया गया कि कैसे बुंडेसलीगा तक की दूरी तय करनी है. नुस्खा यही था कि कुछ मशहूर विदेशी खिलाड़ी खरीदे जाएंगे, लेकिन टीम का आधार क्लब में ट्रेन किए गए युवा खिलाड़ियों से तैयार किया जाएगा. खिलाड़ियों को कोई नहीं पहचानेगा, लेकिन वे जीत हासिल करेंगे, सारे जर्मनी में, और उससे बाहर भी टीएसजी 1899 हॉफेनहाइम की जय-जयकार होगी.

और ऐसा ही हुआ, लेकिन समय से कहीं पहले. उसी सत्र में दूसरी लीग में और अगले सत्र में सेकंड राउंड में लगातार सात जीत के बल पर उसे दूसरी लीग की तालिका में दूसरा स्थान मिला. अब शुरू हुआ जर्मनी के सबसे ऊपरी लीग फुटबॉल बुंडेसलीगा का दौर. यहां पहले सीजन में वह लीग तालिका में पहले स्थान पर रहा, जिसमें स्ट्राइकर वेदाद इविसेविच के दागे गये 18 गोलों की एक ख़ास भूमिका रही. खैर, आखिरकार वह सातवें स्थान पर रहा, और पिछले साल 11वें स्थान पर, जबकि टीम के कुछ पहली पांत के खिलाड़ी लगातार चोटिल रहे. इस साल स्ट्राइकर पेर नीलसेन टीम में नहीं हैं. आए हैं डुइसबुर्ग से टॉम श्टार्के और 1860 म्यूनिख से पेनएल कोकू म्लापा. लगता है कि चमत्कार भले ही ख़त्म हो चुका हो, बुंडेसलीगा में टीएसजी 1899 हॉफेनहाइम की जगह पक्की हो चुकी है.

टीम के आगे बढ़ने के साथ समस्याएं भी बढ़ी हैं. स्टेडियम में 6000 दर्शकों के लिए जगह थी, इसलिए नया स्टेडियम बनाना पड़ा है पड़ोस के कस्बे ज़िंसहाइम में. नया स्टेडियम बना है 30000 दर्शकों के लिए, क्लब का दफ़्तर भी हटाना पड़ा है. ज़मीन से लगाव घट गई है.

टीएसजी 1899 हॉफेनहाइम के 1800 सदस्य हैं. बायर्न म्यूनिख के सवा लाख और शाल्के 04 के 75000. लेकिन क्लब के फ़ैन्स की संख्या बढ़ रही है. विरोध भी हो रहा है. ख़ास कर पूर्वी जर्मनी के क्लबों की ओर से, जिनके लाखों समर्थक हैं, लेकिन टीम को आगे बढ़ाने के लिए पैसे नहीं हैं. आलोचना हो रही है कि यहां एक पूंजीपति फ़ुटबॉल को सर्कस में बदल दे रहा है. साथ ही ऐसी भी शिकायत आई है कि मुनाफ़े के लिए इस क्लब का दुरुपयोग किया जा रहा है. दूसरी ओर युर्गेन क्लिंसमान का कहना है कि टीएसजी 1899 हॉफेनहाइम जर्मन फ़ुटबॉल का एक सुपर पावर बनने जा रहा है.

लेख: उज्ज्वल भट्टाचार्य

संपादनः ए जमाल