कश्मीर में महिला सैनिकों की तैनाती क्यों कर रहा है भारत? | भारत | DW | 15.07.2021
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भारत

कश्मीर में महिला सैनिकों की तैनाती क्यों कर रहा है भारत?

भारत ने कश्मीर में पहली बार महिला सैनिकों की तैनाती की है. इस प्रयास की काफी आलोचना हुई है और यह भी पूछा गया है कि स्थानीय महिलाओं के साथ संबंध मजबूत करने और सेना में लैंगिक समानता बढ़ाने में यह कदम कितना कारगर होगा.

भारत ने अशांत कश्मीर में पहली बार महिला सैनिकों की तैनाती की है. इस कदम को स्थानीय लोगों से संबंध सुधारने और अपने अर्धसैनिक बलों में लैंगिक समानता को बढ़ावा देने की भारत की कोशिश बताया जा रहा है. हालांकि ये सवाल भी पूछे जा रहे हैं कि ये कदम कितना कारगर होगा.  मई में भारत के केंद्रीय गृह मंत्रालय ने शांतिपूर्ण तरीके से अर्द्धसैनिकल बल असम रायफल्स की एक टुकड़ी को उत्तरपूर्वी राज्य मणिपुर से कश्मीर में शिफ्ट कर दिया था. इस टुकड़ी में कई महिलाएं थीं. इस 34वीं बटालियन को गांदरबल में तैनात किया गया था. यह इलाका भारतीय प्रशासित कश्मीर की गर्मियों की राजधानी श्रीनगर से 38 किमी उत्तर में है.
महिला पैरामिलिट्री टुकड़ी को गांदरबल में गाड़ियों की जांच के लिए बनाई गई चेकपोस्ट पर तैनात किया गया है. यह रास्ता संवेदनशील लद्दाख इलाके की ओर जाता है. आने के कुछ ही दिनों के अंदर इन महिला सैनिकों ने स्थानीय महिलाओं की तलाशी लेने और आसपास के इलाकों में घूमकर स्थानीय महिलाओं और स्कूली लड़कियों से बातचीत शुरू कर दी. इन्होंने बातचीत के लिए कार्यक्रमों का आयोजन भी किया, जिसमें इन्होंने अपनी लड़ाई की तकनीकों का प्रदर्शन किया और सामाजिक मुद्दों पर स्थानीय लोगों के साथ बातचीत की.

पुरुष सैनिकों के साथ ही काम करने वाली महिला सैनिक कहती हैं कि स्थानीय लोगों से बात करने के मामले में उन्हें पुरुष सुरक्षाबलों के मुकाबले ज्यादा आसानी होती है. पश्चिमी भारतीय राज्य महाराष्ट्र से आने वाली 24 साल की सैनिक रुपाली ढांगर ने बताया, "हम स्थानीय महिलाओं को आत्मविश्वास देने की कोशिश कर रहे हैं. हमारा लक्ष्य उन्हें रोजाना के घरेलू काम छोड़ बाहर निकलकर कुछ नया करने के लिए प्रेरित करना है."

शोषण की शिकायतों के चलते तैनाती

सैन्य अधिकारियों ने बताया कि महिला सैन्यबल की तैनाती से संघर्ष से जूझ रहे कश्मीर में उग्रवाद विरोधी अभियानों के और प्रभावी होने की संभावना है. खासकर रिहायशी इलाकों में खोजी अभियान के दौरान स्थानीय महिलाओं से निपटने में इससे मदद मिलेगी. भारतीय सेना में सभी पुरुष हैं और कश्मीर में तैनात सैनिकों के बारे में स्थानीय महिलाएं कई बार यौन शोषण की शिकायतें करती रही हैं.

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पश्चिम बंगाल से आने वाली 27 साल की सैनिक रेखा कुमारी कहती हैं, "हमारा पहला काम यह सुनिश्चित करना है कि उग्रवाद विरोधी अभियानों के दौरान महिलाओं को कोई परेशानी या कठिनाई न हो. खोजी अभियानों के दौरान हम उन्हें सहज रखने की कोशिश करते हैं." हालांकि अब भी यह देखना होगा कि रात के छापेमार और उग्रवाद-रोधी अभियानों में महिलाओं का शामिल होना स्थानीय महिलाओं के डर को खत्म कर रहा है या नहीं. फोर्स मैग्जीन की एक्जीक्यूटिव एडिटर गजाला वहाब मानती हैं कि सेना ने इस इलाके में महिलाओं की तैनाती "यौन शोषण के आरोपों से निपटने के लिए की है."

महिला अधिकारों को लेकर संवेदनशील

मानवाधिकार कार्यकर्ता कहते हैं कि भारतीय सेना को ऐसी शिकायतें मिली थीं कि सैनिक खोजी अभियानों के दौरान स्थानीय महिलाओं पर भद्दी यौन टिप्पणियां और इशारे करते हैं, उन्हें गलत तरीके से दबोचने की कोशिश करते हैं. यहां तक कि उनपर बलात्कार के आरोप भी लगे हैं. एसोसिएशन ऑफ पेरेंट्स ऑफ डिसअपियर्ड पर्सन्स (APDP) की एक्टिविस्ट साबिया डार कहती हैं, "1990 के दशक में भारतीय सेना खतरनाक स्तर पर ऐसे अपराध करती थी, लेकिन अब मानवाधिकार संस्थाओं के दबाव के चलते ऐसे मामलों (अपराधों) में कमी आई है." डार ने डीडब्ल्यू को बताया कि इन राइफल वुमेन की तैनाती यह दिखाने का प्रयास भी है कि भारतीय सेना कश्मीरी महिलाओं के अधिकारों को लेकर संवेदनशील है.

सितंबर, 2019 में वीमेन अगेंस्ट सेक्सुअल वायलेंस एंड स्टेट रिप्रेशन नाम के एक वीमेंस एडवोकेसी नेटवर्क ने अपने कश्मीर दौरे के दौरान पाया था कि "स्कूल जाने वाली लड़कियों को सेना के शिविरों से गुजरना पड़ता है और वर्दी वाले सैनिक उनका यौन उत्पीड़न करते हैं. अक्सर सुरक्षाबल सड़क के किनारे अपनी पैंट की चेन खोलकर खड़े होते हैं और उनपर भद्दी टिप्पणियां और इशारे करते हैं." समस्या यह भी है कि कश्मीर में विवादित आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर्स एक्ट (AFSPA) लागू होने से सेना के किसी भी व्यक्ति पर बिना सरकारी मंजूरी के किसी भी अपराध में मुकदमा नहीं चलाया जा सकता है.

माहौल को सामान्य बनाने में मदद

34 असम राइफल के कमांडिंग अफसर कर्नल आरएस काराकोती कहते हैं, "महिला सुरक्षाबल जांच अभियानों के दौरान माहौल को सामान्य बनाने में मदद कर सकती हैं." काराकोती ने डीडब्ल्यू को बताया, "जब राइफल वुमेन जांच अभियान का हिस्सा होती हैं, तब हमें आसानी होती है. वे बातचीत की पहल करने में हमारी मदद करती हैं, जिससे जांच अभियान बिना रुकावट चलता रहता है." हालांकि जब स्थानीय महिलाओं की तलाशी लेते हुए महिला सुरक्षाबलों की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हुई थीं तब उनकी काफी आलोचना हुई थी.

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उत्तरी कोलोराडो विश्वविद्यालय में राजनीतिक मानवविज्ञानी अतहर जिया कहते हैं, "महिला सैनिकों की तैनाती कश्मीर में युद्ध अपराधों की जेंडर वॉशिंग" और "नरसंहार को लैंगिक न्याय के तौर पर" बेचने जैसा है. वे पूछते हैं, "जेल में सड़ रही महिला राजनीतिक कैदियों के लिए राइफल वुमेन क्या हैं. वे उन महिलाओं के लिए क्या है, जो गंभीर मानवाधिकार हनन और युद्ध हथियार के तौर पर बलात्कार झेल रही हैं. उन महिलाओं के लिए क्या हैं, जिन पर उनके पूरे समुदाय के साथ हमेशा नजर रखी जाती है."

सेना के भीतर भेदभावपूर्ण नीतियां

महिला सैनिकों ने कहा कि स्थानीय लड़कियां अब सेना में भर्ती होना चाहती हैं, हालांकि महिलाओं के लिए सैन्य बलों में भी कई भेदभावपूर्ण नीतियां हैं. साल 2017 में असम राइफल से जुड़ने वाली रेखा कुमारी कहती हैं, "उनसे (स्थानीय महिलाओं से) हमें अच्छी प्रतिक्रिया मिल रही है और वे हमसे दोबारा मिलने की इच्छुक हैं. उनमें से कई भारतीय सेना में शामिल होना चाहती हैं." हालांकि राइफल वुमेन धांगर मानती हैं कि अभी सेना में ही महिला-पुरुष समानता हासिल करने में लंबा समय लगेगा. वे कहती हैं, "भारतीय सेना में अब भी महिला-पुरुष समानता दूर का सपना है. और इससे निपटने के लिए हमें खुद को दिमागी रूप से मजबूत बनाना होगा."

महिला अधिकारियों को वरिष्ठ कमांडिंग पद नहीं दिए जाते. पुरुष सहकर्मियों से उलट न ही उन्हें पूरी जिंदगी के लिए नौकरी मिलती है और न ही रिटायरमेंट की सिक्योरिटी. मार्च में भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले में कहा था कि महिलाओं को मिलने वाले लाभ के मामले में सेना के मूल्यांकन के मानदंड में कई स्तर पर भेदभाव है. हालांकि महिलाएं 1888 से सेना में हैं, लेकिन वे मुख्यतः चिकित्सा सेवा में काम करती है. 2020 में तीन महिलाओं को तीन सितारा जनरल का पद मिला लेकिन सब की सब चिकित्सा सेवा में थीं.

रिपोर्ट: समान लतीफ, श्रीनगर

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