कम लड़कियों की वजह कानून | दुनिया | DW | 15.11.2013
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दुनिया

कम लड़कियों की वजह कानून

भारत के कानून ऐसे हैं जो समाज में लड़कियों के मुकाबले लड़कों को प्राथमिकता दिलाते हैं. संयुक्त राष्ट्र ने एक नई रिपोर्ट में ऐसे कारणों का ब्योरा दिया है जिनकी वजह से भारत लड़कियों की कम होती संख्या नहीं रोक पा रहा है.

एक तरफ बाल विवाह, जन्म से पहले लिंग परीक्षण और दहेज पर रोक जैसे कानून का पालन नहीं हो रहा है, तो दूसरी ओर लड़कियों और विधवाओं को विरासत के अधिकार न होने जैसे कानून खत्म नहीं हो रहे. संयुक्त राष्ट्र के विश्व आबादी कोष, यूएनएफपीए ने भारत के बारे में यह रिपोर्ट तैयार की है. दिल्ली में रिपोर्ट जारी करते हुए संयुक्त राष्ट्र के स्थानीय संयोजक लिजे ग्रैंडे ने कहा, "यह रिसर्च अहम है क्योंकि यह उन कानूनों को आईना दिखाती है जो भेदभाव को नहीं रोक पा रहे या फिर इसे बढ़ावा दे रहे हैं."

नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि भारत में बच्चों का लिंगानुपात खतरनाक स्तर तक पहुंच रहा है. छह साल से कम उम्र की लड़कियों की तादाद पिछले पांच दशकों में काफी कम हुई है. 2011 में हुई जनगणना के मुताबिक अब भारत में छह साल से कम उम्र के 1000 लड़कों पर केवल 919 लड़कियां हैं जबकि 1961 में यह संख्या 976 थी. जानकारों का कहना है कि बेटों के लिए मां बाप के दिल में भारी चाहत इस विषमता की वजह है. कुछ मां बाप तो अवैध तरीके से लिंग परीक्षण करा कर गर्भ में ही बेटियों को मार देते हैं. ब्रिटिश मेडिकल जर्नल लैन्सेट के 2011 में किए रिसर्च के मुताबिक पिछले तीन दशक में 1.2 करोड़ लड़कियों को गर्भ में ही मार दिया गया.

इसके अलावा न्यूमोनिया, डायरिया जैसी बीमारी के कारण मरने वाली लड़कियों की तादाद भी काफी बड़ी है. इसकी वजह यह है कि उनकी तुलना में लड़कों की सेहत और स्वास्थ्य का ज्यादा ध्यान रखा जाता है और लड़कियों की अनदेखी होती है. संयुक्त राष्ट्र की रिसर्च रिपोर्ट "द लॉ एंड सन प्रेफरेंस इन इंडियाः ए रियलिटी चेक" कीर्ती सिंह ने लिखी है, जो पेशे से वकील हैं. उन्होंने कहा कि राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण कई लैंगिक कानून लागू नहीं हो रहे हैं. इसके अलावा दूसरे कानून भी हैं जो बहुत खुल्लम खुल्ला भेदभाव बढ़ाने वाले हैं और इस विचार को मजबूत करते हैं कि लड़के ज्यादा महत्व के हैं.

Indisches Mädchen

कम होती बेटियां

कीर्ति सिंह ने कहा, "उदाहरण के तौर पर गोवा बहुविवाह कानून है जो पति को पहली शादी से बेटा न पैदा होने की सूरत में दूसरे विवाह की इजाजत देता है. इसके अलावा भारत के कुछ राज्यों में कानून हैं जो बेटियों और विधवाओं को जमीन का वारिस नहीं मानते." सिंह ने कहा कि इससे भारतीय महिलाओं का दर्जा नीचे हो गया है और कानून को न सिर्फ कठोरता से लागू करना होगा बल्कि उसे बदलना भी होगा. उन्होंने कहा कि इस बात की जरूरत है कि पति के हाथों बलात्कार को अपराध माना जाए और कथित "ऑनर किलिंग" को भी.

संयुक्त राष्ट्र के लैंगिक समानता सूचकांक में भारत बच्चों की मौत के दर में लैंगिक फर्क के आधार पर सबसे खराब देशों में हैं. 148 देशों की सूची में भारत 132वें नंबर पर है. भारत की हालत पाकिस्तान और बांग्लादेश से भी गई गुजरी है. भारत में लड़कों को लेकर चाहत सांस्कृतिक विचारधारा से जुड़ी है. लड़कों को आम तौर पर परिवार का पेट पालने वाले के रूप में देखा जाता है. वो परिवार का नाम धारण करने के साथ ही मां बाप के अंतिम संस्कार के भी अधिकारी होते हैं. लड़कियों को आम तौर पर ऐसा बोझ माना जाता है जिसे मां बाप बड़ी मुश्किल से उठाते हैं. इसके पीछे सबसे बड़ी वजह बेटियों को दिया जाने वाला भारी दहेज है, जिसके बगैर शादी होनी मुश्किल है.

एनआर/एजेए (रॉयटर्स)

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