कभी न रुकने वाली जंग है लोकतंत्र | ताना बाना | DW | 31.05.2013
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ताना बाना

कभी न रुकने वाली जंग है लोकतंत्र

लोकतंत्र डॉयचे वेले के लिए बेहद अहम है. इस खास पेशकश में हम उन युवाओं की बात कर हैं जो अपने देश के विकास में मदद दे रहे हैं. सहभागिता के भविष्य पर बहस करने का न्यौता दे रहे हैं डॉयचे वेले के महानिदेशक एरिक बेटरमन.

डॉयचे वेले दशकों से लोकतंत्र और मानवाधिकार के मुद्दों पर काम कर रहा है. डीडब्ल्यू के संवाददाता 1974 में पुर्तगाल की कारनेशन क्रांति और 1980 के दशक में पूर्वी यूरोप के देशों में हुई शांतिपूर्ण क्रांतियों के गवाह रहे हैं और आज भी ट्यूनीशिया, मिस्र और सीरिया जैसे देशों में विद्रोह की टीवी, ऑनलाइन और रेडियो रिपोर्टों के जरिए लगातार खबर दे रहे हैं. इन क्रांतियों में, लोगों की फैसला लेने में हिस्सेदारी की इच्छा आम रही है, लोकतंत्र की इच्छा. वह एक बड़ा वादा है और साथ ही न्यायोचित और सबों की भागीदारी वाली राजनीति के लिए सही रास्ते की खोज का भरोसा देता है.

बड़ा सवाल

कई भाषाओं में मल्टीमीडिया रिपोर्ट और फीचर के जरिए डीडब्ल्यू के ''पावर टू द पीपल'' नाम की खास पेशकश ने राजनीतिक सहभागिता के भविष्य से जुड़े सवालों पर नजर डाली. क्योंकि हर जगह लोग बदलाव की मांग कर रहे हैं. पिछले सालों में हमने विश्व के कई हिस्सों में नए आंदोलनों को पैदा होते देखा है. अरब देशों में लोगों ने दशकों से चली आ रही तानाशाहियों को उखाड़ फेंका. लेकिन भविष्य कैसा होगा, इस पर विवाद है. पूर्वी यूरोप में लोग खासकर राजनीतिक संरक्षणवाद और भ्रष्टाचार का विरोध कर रहे हैं. बहुत से साहसी लोग ज्यादा नियंत्रण की मांग कर रहे हैं और पश्चिम से मदद मांग रहे हैं. लेकिन वहां भी, पुराने लोकतांत्रिक देशों में भी हालिया वित्तीय संकट के बाद बदलाव की मांग तेज हो गई है. यूरोपीय संघ के देशों और अमेरिका में बहुत से लोग वित्तीय बाजारों के प्रभुत्व और लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए नेताओं के अधिकार छिने जाने के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं.

हम पूछते है कि विश्व भर में हो रहे इन विरोध प्रदर्शन अभियानों में एक जैसा क्या है? बदलाव कैसा हो सकता है? और खासकर यह कि लोकतंत्र को फिर से पटरी पर लाने में क्या मदद की जा सकती है?

विश्व के अलग अलग देशों में गूंज रही आवाजें और मांगें अलग हैं लेकिन इनमें सक्रिय ज्यादातर लोग युवा हैं जो अपने तरीकों से ज्यादा हिस्सेदारी के लिए संघर्ष कर रहे हैं. ये लोग आधुनिक मीडिया और तकनीकी संभावनाओं के जरिए पुरानी सत्ता संरचना पर सवाल उठा रहे हैं और अपने देश का भविष्य तय करने के नए तरीके तलाश रहे है.

बदलाव के लिए साहस

इन सारी कार्रवाइयों के साथ वे लोकतंत्र की बुनियादी बातों का समर्थन कर रहे हैं: जुड़ाव, विविधता और बदलाव के लिए साहस. लोकतंत्र कभी ''पूर्ण'' नहीं होता. ना ही वह कभी स्वाभाविक होता है. इसके विपरीत लोकतंत्र को बार बार खुद की नई खोज करनी होती है. उसके लिए हर बार नई बहस होती है, वाद विवाद होता है, संघर्ष किया जाता है. इसके लिए धैर्य से भरे, कभी न थकने वाले और निडर लोग हैं, जो ऐसा करने की हिम्मत रखते हैं और जिन्हें अपने देशों के लोकतांत्रिक भविष्य में भरोसा है.

ऐसे लोग ही हमारी इस विशेष मल्टीमीडिया पेशकश के केंद्र में हैं. तहरीर स्क्वेयर पर हफ्तों धरना देने वाला मिस्र का वह युवा जो अब काहिरा के गरीब इलाकों के लोगों को उनके लोकतांत्रिक अधिकारों के बारे में बता रहा है. यूक्रेन की वह खोजी पत्रकार जो तमाम धमकियों और सेंशरशिप के बावजूद भी रिसर्च करती रही. स्पेन का वह डिजाइनर जिसकी तमन्ना देश के आर्थिक तंत्र को ज्यादा लोकतांत्रिक बनाने की है और जिसने कई कारोबारियों को सबकी भलाई के लिए ज्यादा से ज्यादा योगदान देने के लिए मना लिया है.

आप भी इसमें हिस्सा ले सकते हैं. आप लोकतंत्र से जुड़े बड़े सवालों पर चर्चा कर कर सकते हैं. हमारे सोशल नेटवर्क चैनलों के जरिए आप अपनी राय जता सकते हैं. हमें बताइये कि आपकी राय में क्या पश्चिमी देश दूसरे देशों में लोकतंत्र के गलत विकास के लिए जिम्मेदार हैं? क्या डिजीटल मीडिया क्रांति को आसान बनाता है? क्या लोकतंत्र और अर्थव्यवस्था का मेल संभव है?

सोशल मीडिया देता है नई संभावनाएं

आप उन बेबाक और विवादास्पद लेखों से भी प्रेरणा ले सकते हैं, जिनमें दुनिया भर के जाने माने लेखकों, प्रकाशकों और बुद्धिजीवियों ने डॉयचे वेले के लिए आज और कल के लोकतंत्र पर अपने विचार लिखे हैं.

डॉयचे वेले 60 साल से दुनिया भर में उदारवादी मूल्यों के प्रचार, सिविल सोसायटी के प्रोत्साहन और लोकतंत्र के लिए प्रतिबद्ध रहा है. मल्टीमीडिया ने सोशल मीडिया के जरिए भविष्य के मुद्दों पर सीधी बहस के लिए नए रास्ते बनाए हैं. ''पावर टू द पीपल'' अपने साझीदारों के साथ डीडब्ल्यू के सहयोग की एक बानगी है. यह ''मैपिंग डेमोक्रैसी'' की बहस को आगे बढ़ा रहा है, जिसे गोएथे इंस्टीट्यूट ने तैयार किया और डीडब्ल्यू ने मीडिया पार्टनर की भूमिका निभाई.

मैं आपके विचारों का स्वागत करता हूं और आपकी प्रतिक्रियाओं के इंतजार में हूं. हमें फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करें.

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