कब तक सिर पर मैला ढोती रहेंगी महिलाएं | दुनिया | DW | 18.12.2017
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दुनिया

कब तक सिर पर मैला ढोती रहेंगी महिलाएं

बुंदेलखंड के जालौन जिले की सैकड़ों वाल्मीकि महिलायें अपने अपने गांव में सुबह उठकर मानव मल उठाती है बाद में शाम को उनके घर से रोटी मांगने जाती है और उसी को खाकर अपने बच्चो व स्वयं के पेट की भूख को शांत करती हैं.

हाथ से मल उठाने की ये कुप्रथा अभी भी जारी है. हालांकि भारत में ये कानूनन खत्म कर दी गयी है. इसके लिए खास कानून, "हाथ से मैला उठाने वाले कर्मियों के नियोजन का प्रतिषेध और उनका पुनर्वासन अधिनियम 2013” लागू है.

ये कानून साफ कहता है कि मैन्युअल स्कावेंजिंग नहीं होगी. ऐसे सभी शौचालय जिसमें मानव मल हाथ से उठाने का प्रावधान हैं तोड़ दिए जायेंगे. कोई भी ऐसा सफाई कर्मी जो मैन्युअल स्कावेंजिंग कर रहा है वो सम्बंधित अधिकारी को एप्लीकेशन दे सकता है. उसके पुनर्वास के लिए ट्रेनिंग, या फिर आय का दूसरा जरिया उपलब्ध कराया जायेगा.पुनर्वास में घर की व्यवस्था का भी प्रावधान है.

हालांकि उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड में ऐसा नहीं है. आज भी हजारो दलित महिलायें मानव मल हाथ से उठाती हैं, कमर पर टोकरी में रख कर ले जाती हैं. निभाना गांव की गिरजा व प्रभा ने कहा कि हमारी पूरी जिन्दगी ये मैला ढोते ढोते निकली जा रही है, इसे बंद करा दो और हमें जीने का कोई और सहारा दे दो ताकि अपनी बची हुई जिंदगी आराम से कट सके. उन्होंने बताया, "हम सुबह 8–10 घरों में जाकर टट्टी साफ करते हैं तब जाकर हमें शाम को उसी घर से दो सूखी बासी रोटी मिलती है, कभी शादी विवाह में कुछ पैसे व कपड़े मिल जाते हैं उसी से अपना गुजर बसर करते है बाकी हमारे जीने का कोई सहारा नहीं है. सब हमें अछूत मानते हैं, हमारे पास मकान, जमीन,पेंशन कुछ नहीं हैं."

बीते 10 दिसंबर को बड़ी संख्या में ऐसे सफाई कर्मचारियों ने लखनऊ में विधान सभा के बाहर प्रदर्शन किया. वहां मौजूद बेटीबाई ने बताया कि पूरी उम्र बीत गई, कुल्हे पर निशान बन गए लेकिन ये मैला ढोना बंद न हुआ. इसी तरह अकबरपुर इटोरा गांव की माया ने कहा "हमें अपने गांव में यह गंदा काम करना पड़ता है मेरे पास और कोई दूसरा सहारा नहीं है."

ऐसा नही हैं कि इन लोगो ने इस गंदे पेशे से निकलने की पहल नहीं की. इनके अनुसार ये काम बंद करने के लिए कानून में दिए गए स्वघोषणा पत्र पर शपथ पत्र के साथ अपना आवेदन जिला पंचायत राज अधिकारी को रजिस्टर्ड डाक से भेजा था, लेकिन उन्होंने फॉर्म स्वीकार नहीं किया और सबकी रजिस्ट्री वापस घर भिजवा दी. इन लोगों ने विधान सभा के सामने जमा हो कर अब खुद फॉर्म सौंपा. इसके साथ ही इन्होंने गुहार लगाई कि कानून के हिसाब से इनका पुनर्वास किया जाए.

वीडियो देखें 01:31

"पेट के लिए करना पड़ता है गटर साफ"

बुंदेलखंड दलित अधिकार मंच ऐसे सफाई कर्मियों के लिए संघर्ष कर रहा है. मंच के संयोजक कुलदीप कुमार बौद्ध ने बताया कि स्थिति बेहद शमर्नाक है आजादी के 70 साल बाद भी हमारी दलित महिलाओं को मैला उठाने को मजबूर होना पढ़ रहा है. एक तरफ तो गांव गली से लेकर पूरे देश में स्वच्छ भारत मिशन के चर्चे हो रहे ऐसे में उन्हें ये काम दिखाई नहीं देता. जब तक ये कुप्रथा बंद नहीं होगी ये सारे अभियान निरर्थक साबित होंगे. मंच के सर्वेक्षण के अनुसार इस कार्य में संलिप्त सभी महिलाएं किसी न किसी बीमारी की शिकार है, आये दिन उनका स्वास्थ्य बिगड़ता है. गांव में इन महिलाओ के साथ छुआछूत होती है और इनके बच्चो को भी स्कूलों में छुआछूत का सामना कर पड़ता है.

भारत की 2011 की जनसंख्या के अनुसार 24,67,40,228 हाउसहोल्ड की गिनती हुई. जिनमे 11,57,67,349 ऐसे घर थे जिनमें शौचालय हैं. इनमे से 7,92,252ऐसे घर हैं जहां आज भी मानव द्वारा मल उठाया जाता है. सरकार इसमें कई प्रोग्राम चला रही है. सभी ऐसे शौचालय को शुष्क शौचालय में बदला जा रहा हैं. हर गांव को टारगेट करके उसे ओपन डेफेकेशन फ्री किया जा रहा है. इसमें शौचालय को बदलने का अनुदान भी दिया जा रहा है और लोगो में जागरूकता भी फैलाई जा रही है.

लेकिन मानव मल को मनुष्य द्वारा साफ करने के पेशे से अभी लोगों को मुक्ति नहीं मिल पाई है. इसमें क्षेत्रो का पिछड़ापन, लोगों में गरीबी और पुरानी व्यवस्था आड़े आ रही है.

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