कब तक भगवान के नाम पर होगा लड़कियों के जिस्म का सौदा? | दुनिया | DW | 22.01.2019
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दुनिया

कब तक भगवान के नाम पर होगा लड़कियों के जिस्म का सौदा?

दक्षिण भारत के राज्य कर्नाटक में आज भी लड़कियों को भगवान के नाम पर वेश्यावृति में धकेलने का सिलसिला खत्म नहीं हुआ है. इस पुरानी परंपरा को देवदासी कहा जाता है.

Indien Devadasi-System Prostitution (Imago/ZumaPress)

18 साल की शोभा "देवदासी" है

साल 2019 की शुरुआत में दो ऐसी रिपोर्टें आई हैं जो कर्नाटक में जमानों से चली आ रही देवदासी प्रथा की ओर ध्यान खींचती हैं. ये रिपोर्टें नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी और टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज ने प्रकाशित की हैं. रिपोर्टों की सहलेखक बिनसी विलसन का कहना है कि यह एक "खुले राज" जैसा है, "पूरे समाज को लड़की के बारे में पता होता है लेकिन इसे अपराध के रूप में नहीं, बल्कि एक सामाजिक समस्या के रूप में देखा जाता है जिसे संस्कृति का हिस्सा मान कर अपना लिया जाता है." विलसन का कहना है कि इस प्रथा के खिलाफ बने कानून को आज भी ठीक तरह से लागू नहीं किया गया है और कई जगहों पर चुपचाप लड़कियों को देवदासी बनने पर मजबूर किया जा रहा है.

कर्नाटक में 1982 में देवदासी प्रथा पर रोक लगा दी गई थी. इसे एक "सामाजिक बुराई" बताया गया था जो महिलाओं को देह व्यापार में जाने पर मजबूर कर रही थी. इस वक्त राज्य में कितनी "देवदासियां" हैं, इस पर कोई विश्वसनीय आंकड़ा तो मौजूद नहीं है लेकिन 2007-2008 के एक सरकारी अनुमान के अनुसार कर्नाटक के 14 जिलों में आज भी 46,660 लड़कियां और महिलाएं देवदासी के रूप में जीने को मजबूर हैं.

देवदासी प्रथा के खिलाफ काम कर रही कर्नाटक की एक अधिकारी सी वसुंधरा देवी ने थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन से बातचीत में कहा, "हम इस अपराध को खत्म करने के लिए प्रतिबद्ध हैं और दोनों रिपोर्टों में जो मुद्दे उठाए गए हैं, उन पर ध्यान देंगे." उन्होंने आगे कहा, "हम ऐसे कई कार्यक्रम चला रहे हैं जिनसे देवदासी रह चुकी महिलाओं के परिवारों की मदद की जा सकेगी ताकि सुनिश्चित किया जा सके कि वे इस परंपरा को आगे ना ले जाएं."

देवी ने बताया कि पिछले साल सिर्फ दो ही ऐसे मामले उनके सामने आए जहां लड़कियों को इस कुरीति में धकेला जा रहा था. पर साथ ही उन्होंने यह भी माना कि छिपते छिपाते जहां लड़कियों को देवदासी बना दिया जाता है, उन मामलों तक पहुंचना बेहद मुश्किल है.

इस प्रथा की शुरुआत प्राचीन भारत में हुई. पहले मासिक धर्म के साथ ही तय कर दिया जाता कि लड़की अब अपना जीवन भगवान की सेवा में बिताएगी. लड़की को दुल्हन की तरह सजाया जाता, उसके गले में फूलों की माला डाली जाती, खूब जश्न के साथ उसे मंदिर ले जाया जाता. मंदिर ही उसका घर बन जाता जहां वह प्रभु की आराधना में शास्त्रीय संगीत और नृत्य भी सीखती. लेकिन वक्त के साथ साथ इसका रूप बदलता गया. लड़कियों के अकेलेपन का फायदा उठा कर उनके साथ जबरन शारीरिक संबंध बनाए जाने लगे. क्योंकि परिवार लड़कियों को त्याग चुके होते हैं, इसलिए उनका कहा कोई मायने नहीं रखता.

रिपोर्ट की एक और सहलेखक शैरन मेनेजेस का कहना है कि जबसे इस प्रथा पर रोक लगी है लोग छिप छिपा कर घर पर ही छोटी सी रस्म करने लगे हैं. उन्होंने बताया कि ज्यादातर पीड़ित लड़कियां गरीब दलित परिवारों से नाता रखती हैं, "जो भी कोई प्रथा का विरोध करने की कोशिश करता है, उसका सामाजिक रूप से बहिष्कार कर दिया जाता है, इसलिए यह प्रथा आज भी चली आ रही है." उन्होंने आगे कहा, "हमने रिसर्च के दौरान जितनी भी लड़कियों से बात की, सभी ने बताया कि वे कितना दर्दनाक जीवन बिता रही हैं और हर किसी ने कहा कि उनके पास इसके खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत नहीं है." गले में फूलों की माला डाल कर लड़कियों को कांटों के बिस्तर पर फेंका जा रहा है.

आईबी/एके (थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन)

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