कटघरे में चुनाव आयोग | भारत | DW | 16.05.2019
  1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages
विज्ञापन

भारत

कटघरे में चुनाव आयोग

कोलकाता में अमित शाह के रोड शो के दौरान हुई हिंसा और हंगामे में ईश्वर चंद्र विद्यासागर की प्रतिमा तोड़े जाने के मुद्दे पर बीजेपी और टीएमसी का तनाव चरम पर पहुंच गया है. इस मामले में चुनाव आयोग भी कटघरे में है.

चुनाव आयोग ने इस मामले में मंगलवार देर रात राज्य के प्रधान सचिव (गृह) और खुफिया विभाग के सहायक महानिदेशक राजीव कुमार को हटा दिया और साथ ही आखिरी चरण के लिए चुनाव प्रचार के समय में भी 20 घंटों की कटौती कर दी. अब बंगाल में चुनाव अभियान शुक्रवार शाम छह बजे की बजाय गुरूवार रात दस बजे ही थम जाएगा. मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस अध्यक्ष ममता बनर्जी ने इस मामले पर आयोग पर अंगुली उठाते हुए उसे कटघरे में खड़ा किया है.

Indien Wahlkommission Protest (DW/P. Mani Tiwari)

विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लेती मुख्यमंत्री ममता बनर्जी

विवाद क्या है

पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में मंगलवार शाम को बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के रोड शो के दौरान तृणमूल कांग्रेस छात्र परिषद और अखिल भारतीय विदार्थी परिषद (एबीवीपी) के समर्थकों के बीच जिस तरह हिंसा हुई और वहां एक कालेज परिसर में ईश्वर चंद्र विद्यासागर की प्रतिमा तोड़ी गई, उससे राज्य की राजनीति में अचानक उबाल आ गया है. ममता ने इस मामले को बंगाल की संस्कृति और महापुरुषों के अपमान से जोड़ते हुए इसे एक भावनात्मक मुद्दा बना दिया है.

बुधवार को पूरे दिन इस मामले में आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी रहा. बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने जहां अपनी प्रेस कांफ्रेंस में आयोग पर मूकदर्शक बने रहने का आरोप लगाया वहीं प्रतिमा तोड़ने के लिए भी तृणमूल कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराया. वह तो यहां तक कह गए कि अगर सीआरपीएफ के जवान नहीं होते तो उनका जिंदा बच पाना नामुमकिन था.

शाह ने कहा, "तृणमूल ने सियासी फायदे की खातिर आम लोगों की भावनाओं को उकसाने के लिए खुद ही प्रतिमा तोड़ी है.” पार्टी ने इस मामले में आयोग से भी शिकायत की थी. दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस ने भी प्रतिमा तोड़ने के सबूत के तौर पर एक वीडियो के साथ आयोग से शिकायत की थी. उसके बाद कोलकाता और दिल्ली में धरने-प्रदर्शनों और रैलियों का दौर जारी रहा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी बुधवार को बंगाल में अपनी दो रैलियों में ममता बनर्जी और उनकी सरकार की जम कर खिंचाई की. उनके अलावा यहां चुनाव प्रचार के लिए आए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी इस हिंसा के लिए सरकार की खिंचाई करते हुए ममता बनर्जी पर बंगाल में लोकतंत्र का गला घोंटने का आरोप लगाया.

Indien Wahlkommission Protest (DW/P. Mani Tiwari)

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ भी चुनाव प्रचार के लिए बंगाल में हैं.

बुधवार की रात को आयोग ने अपने फैसले में राज्य के प्रधान सचिव (गृह) अत्रि भट्टाचार्य और सीआईडी के एडीजी राजीव कुमार को उनके पद से हटा दिया. इसके साथ ही आयोग ने संविधान की धारा 324 के तहत मिले अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए बंगाल में आखिरी दौर के मतदान के लिए चुनाव प्रचार की सीमा भी 20 घंटे कम कर दी.

आयोग ने देश में संभवतः पहली बार इस धारा के तहत मिले अधिकार का इस्तेमाल किया है. राजीव कुमार वही हैं जिनके कोलकाता के पुलिस उपायुक्त रहते सीबीआई की पूछताछ के मुद्दे पर बीती फरवरी में केंद्र व राज्य सरकार आमने-सामने आ गई थी. तब इसके विरोध में ममता धरने पर भी बैठी थीं. आयोग ने राजीव को केंद्रीय गृह मंत्रालय से संबद्ध करते हुए उनको गुरुवार सुबह 10 बजे तक गृह मंत्रालय में हाजिर होने का भी फरमान सुना दिया.

आयोग का कहना है कि प्रधान सचिव (गृह) ने केंद्रीय बलों के चुनावी इस्तेमाल का आरोप लगा कर चुनावी प्रक्रिया में हस्तक्षेप किया है. दरअसल, दो दिन पहले भट्टाचार्य ने आयोग को पत्र लिखा कर आरोप लगाया था कि केंद्रीय बल लोगों को बीजेपी के पक्ष में वोट देने के लिए उकसा रहे हैं.

ममता का आरोप

आयोग के उक्त फैसले के बाद ममता बनर्जी ने देर रात जल्दबाजी में बुलाई गई अपनी प्रेस कांफ्रेंस में चुनाव आयोग पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी प्रमुख अमित शाह के निर्देश पर काम करने का आरोप लगा दिया. ममता ने सवाल किया कि जब हिंसा व तोड़-फोड़ के मुद्दे पर दोनों दलों की ओर से आयोग को शिकायत भेजी गई थी तो उसने अमित शाह के खिलाफ कोई कार्रवाई क्यों नहीं की?

ममता बनर्जी का आरोप है कि इस बार के चुनावों में आयोग मतदान का संचालन केंद्रीय बलों के जरिए करा रहा है. इसके बावजूद बीजेपी चुनावी धांधली के आरोप लगा रही है. उन्होंने कहा कि शाह दंगा भड़काने की नीयत से ही यहां आए थे. लेकिन उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई. तृणमूल कांग्रेस प्रमुख का कहना था, "दिल्ली में प्रेस कांफ्रेंस के दौरान शाह ने आयोग को धमकाया था. उसके बाद ही आयोग फौरन हरकत में आया और राज्य सरकार के खिलाफ कार्रवाई की.” वे कहती हैं कि बंगाल में केद्रीय बलों की भारी तादाद में मौजूदगी ही चुनावी हिंसा की सबसे बड़ी वजह है.

ममता सवाल करती हैं, "अगर बंगाल में हालात इतने ही खराब थे तो आयोग ने तत्काल प्रभाव से चुनाव प्रचार पर रोक क्यों नहीं लगाई?” फिर इसका जवाब भी वह खुद ही देती हैं. उनका कहना है कि गुरूवार को प्रधानमंत्री मोदी की दो-दो रैलियों की वजह से ही आयोग ने बीजेपी की सहूलिय़त के मुताबिक समय चुना है.

राजनीतिक पर्यवेक्षक इस टकराव को लोकतंत्र के हित में नहीं मानते. राजनीतिक विश्लेषक सुजीत कुमार सरकार कहते हैं, "मौजूदा लोकसभा चुनावों के मुद्दे पर इन दोनों प्रमुख दलों और केंद्र व राज्य सरकारों के बीच लगातार बढ़ती कड़वाहट गंभीर चिंता का विषय है. इससे केंद्र-राज्य संबंधों की परिभाषा बदल सकती है.” वह कहते हैं कि चुनाव आयोग ने भी इस मामले में निष्पक्षता नहीं दिखाई है. उसके फैसलों से कहीं न कहीं यह संदेह बढ़ता है कि वह केंद्र के इशारों पर काम कर रहा है.

कलकत्ता रिसर्च ग्रुप नामक थिंकटैंक के राजनीतिक विश्लेषक प्रोफेसर रणबीर समाद्दार कहते हैं, "आयोग को अपनी निष्पक्षता बरकरार रखनी चाहिए. मौजूदा चुनावों के दौरान पहले दौर से ही उसके दामन पर विवाद के छींटे पड़ते रहे हैं. ताजा फैसले ने इस शक को और पुख्ता ही किया है.” वह कहते हैं कि आयोग के ऐसे फैसलों से लोकसभा चुनावों के मुक्त व निष्पक्ष होने पर भी सवालिया निशान लग सकता है.

DW.COM

संबंधित सामग्री

विज्ञापन