ओलंपिक मेडल में जर्मन इंजीनियरिंग | खेल | DW | 29.01.2014
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खेल

ओलंपिक मेडल में जर्मन इंजीनियरिंग

मेडल के आंकड़ों में दिलचस्पी रखने वाले लोग यदि जानना चाहते हैं कि जर्मनी ने विंटर ओलंपिक में दूसरे देशों से ज्यादा पदक क्यों जीते हैं तो उन्हें बर्लिन के इंजीनियरिंग इंस्टीट्यूट में इसका राज मिल सकता है.

पूर्वी बर्लिन के एक सुनसान इलाके में सरकारी समर्थन वाले एफईएस इंस्टीट्यूट में इंजीनियरों की हाई टेक कारीगरी ने जर्मनी को ज्यादातर मेडल दिलवाने में मदद की है. यह इंस्टीट्यूट पूर्वी जर्मनी की कम्युनिस्ट सरकार ने 1963 में बनवाया. शीतकालीन ओलंपिक खेलों में जर्मनी के खिलाड़ियों ने यहां तैयार अत्याधुनिक मशीनों की मदद से 128 स्वर्ण पदक जीते हैं और अगले महीने होने वाले सोची खेलों से पहले फिर बड़ी उम्मीदें हैं.

एफईएस यानि इंस्टीट्यूट फॉर रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑफ स्पोर्ट्स इक्विपमेंट. इस इंस्टीट्यूट का एकमात्र मकसद है कि जर्मन खिलाड़ियों को खराब इक्विपमेंट की वजह से हारना न पड़े. इंस्टीट्यूट के 70 कर्मचारियों में 35 इंजीनियरिंग हैं, जो हमेशा सर्वोत्तम बॉब स्लेज, स्पीड स्केट, स्नोबोर्ड या स्की जंपिंग या दूसरे जरूरी उपकरण डिजाइन करने या बनाने के प्रयास में रहते हैं.

Olympia Sotchi Deutsches Team wird eingekleidet

सोची ओलंपिक के लिए तैयार जर्मनी की टीम

एफईएस के डायरेक्टर हाराल्ड शाले कहते हैं, "कुछ खेलों में तकनीक की बहुत बड़ी भूमिका होती है." उनका कहना है कि उनके संस्थान द्वारा बनाए गए अत्याधुनिक उपकरण विश्वस्तरीय खिलाड़ियों को प्रतिस्पर्धी बना सकते हैं, लेकिन औसत खिलाड़ी को मेडल नहीं दिला सकते. पहली बार विदेशी पत्रकारों को संस्थान दिखाने के बाद उन्होंने कहा, "हमारा लक्ष्य है कि जिन खेलों में हम हैं, उनमें दुनिया की बेहतरीन कंपनियों में शामिल होना."

शाले कहते हैं, "हमारे इंजीनियर मानवीय प्रदर्शन की गुणवत्ता को तकनीकी आविष्कार के जरिए बेहतर बनाने की कोशिश कर रहे हैं." संस्थान के अंदर एक प्रयोगशाला में कर्मचारी बॉब स्लेज के ब्लेड को बेहतर बनाने के लिए कंप्यूटर सिमुलेशन पर काम कर रहे हैं. दूसरे लैब में कुछ लोग एक कायाक को रंग रहे हैं. शाले कहते हैं कि उनका इंस्टीट्यूट तकनीक का फायदा उठाने के लिए ओलंपिक पदकों के प्रयासों में जर्मन इंजीनियरिंग का इस्तेमाल कर रहा है.

पेशे से खुद इंजीनियर और नौकायन के पेशेवर खिलाड़ी रहे शाले कहते हैं, "हां, सब कुछ बहुत जर्मन है. इंजीनियर हर कहीं यह देखते हैं कि विज्ञान की मदद से चीजें कैसे सुधारी जा सकती हैं. संभव है कि जर्मन इस मामले में दूसरों के मुकाबले ज्यादा सनकी हैं."

पिछले छह ओलंपिक खेलों में पांच में जर्मनी पहले या दूसरे स्थान पर रहा है. गर्मी के खेलों में एकीकरण के बाद से उसका प्रदर्शन लगातार गिरता गया है. 2012 में हुए लंदन ओलंपिक में उसने 11 स्वर्ण पदक जीते और छठे स्थान पर रहा जबकि बार्सिलोना में उसने 33 सोने के पदक जीते थे. शीतकालीन खेलों की हालत अलग थी. 1992, 1998 और 2006 में वह पहले स्थान पर रहा जबकि 1988, 2002 और 2010 में दूसरे स्थान पर. कुल मिलाकर जर्मनी ने विंटर ओलंपिक में कुल 358 पदक जीते हैं जिनमें 128 स्वर्ण पदक हैं.

जर्मन ओलंपिक संघ ने सोची के लिए 30 पदकों का लक्ष्य रखा है. शाले का कहना है कि उनकी कंपनी के उपकरणों की मदद से जर्मनी 15 पदक जीत सकता है. बॉब स्लेज, ल्यूज, बायथलन और क्रॉस कंट्री स्कीइंग में उपकरण निर्णायक साबित हो सकते हैं. शाल्के कहते हैं, "हम तकनीक के विकास से सेकंड के 10वें हिस्से का फायदा पाने की कोशिश में हैं."

एफईस के इंजीनियरों को जर्मन खिलाड़ियों की सफलता में योगदान पर नाज है. इंस्टीट्यूट को अपने बजट का 90 फीसदी यानि 45 लाख यूरो खेल मंत्रालय से मदद के रूप में मिलता है.

एमजे/एजेए (रॉयटर्स)

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