ऑनलाइन बाजार पर टंगा सेल का बोर्ड | ब्लॉग | DW | 06.10.2014
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ब्लॉग

ऑनलाइन बाजार पर टंगा सेल का बोर्ड

फ्लिपकार्ट ने अपनी बंपर सेल के 'बिग बिलियन डे' को कुछ इस तर्ज और इस तेवर के साथ उतारा है जैसे ब्रह्मांड का बिगबैंग. कम से कम ऑनलाइन बाजार में तो फ्लिपकार्ट की यह सोमवारी पेशकश किसी बिगबैंग से कम नहीं.

90-99 फीसदी छूट के साथ ऑनलाइन रिटेल बाजार में फ्लिपकार्ट का यह एक नये 'युद्ध' का एलान भी है. इसका असर और इसके निहितार्थ बेशक व्यापक हैं लेकिन इसकी चोटें भी गहरी और अदृश्य हैं. फ्लिपकार्ट बाजार में एक नई गतिशीलता और तीव्रता का प्रतीक है. इसमें जड़ता को तोड़ने वाले बाजार मूल्य निहित हैं. ये बाजार की नई धज ही है कि फ्लिपकार्ट ने अविश्वसनीय कीमतों पर चीजें सजा दी हैं. इंटरनेट पर जाइये और इस महाकाय ऑनलाइन सेल पर टूट पड़िए.

देश के सबसे बड़े ऑनलाइन रिटेलर बन गए फ्लिपकार्ट ने भारत के बड़े और छोटे शहरों में खरीदारी की प्रवृत्ति और उसके स्वरूप को बदला है. ग्रोसरी को छोड़ दें तो इसने तमाम अन्य उपभोक्ता सामग्री के पारंपरिक बाजार में सेंध लगा दी है. अब इस कड़ी प्रतिस्पर्धा और तीसरी पीढ़ी के मुक्त बाजार में 'सरवाइवल ऑफ द फिटेस्ट' का मंत्र काम कर रहा है.

इस तरह ऐसा लगता है कि हम सब लोग वास्तविक समाज से लेकर वर्चुअल समाज तक हर ओर एक बहुत विशाल और महाबंपर सेल से घिरे हुए हैं और चारों ओर उसके आक्रामक विज्ञापन फैले हुए हैं. सुबह का अखबार आता है तो खबरों की सुर्खियों पर हमारी निगाहें गिरें, उससे पहले उसमें से पंफलेट और पर्चे गिरने लगीं, जिनमें सेल और छूट और आकर्षक उपहारों की दावतें हैं. इनमें से कई कागज खुदरा व्यापार के हैं, जिन्हें लगता है कि वर्चस्व की लड़ाई में कूद पड़ने को विवश कर दिया गया है. लेकिन खुदरा कारोबार में भी अब शोरूम और डिपार्टमेंटल स्टोर और मॉल कल्चर ने सेंध लगा दी है. इस तरह उस पर दोतरफा हमला है.

फ्लिपकार्ट ने तो बिग सेल के अपने विज्ञापनों में भी भारतीय उपभोक्ताओं को अलग ढंग से रिझाने की कोशिश की है. एक पंचलाइन कहती है, “भारत को हर बड़ी चीज़ से प्यार है. बड़ी मूंछें, बड़ी शादियां, बड़ी कारें, आदि.” एक विज्ञापन में फ्लिपकार्ट ने चुटकी ली है कि “उसकी सेल तो गरबा और कुंभ मेले से भी बड़ी है.” इस तरह बाजार, संस्कृति से लेकर भावना तक एक चुनौतीपूर्ण एम्बियंस बनाता है और सब कुछ इतना बड़े पैमाने पर करता हुआ दिखाई देता है जैसे अपना खजाना लुटा रहा हो. लेकिन ऐसा होता कहां है.

फ्लिपकार्ट के आने से खुदरा कारोबार और छोटे शहरों की स्थानीय अर्थव्यवस्था पर कुछ हद तक असर तो पड़ेगा ही. ग्रोसरी के अलावा फ्लिपकार्ट जैसे ऑनलाइन रिटेलर सब कुछ बेचते हैं. लेकिन अब ग्रोसरी का सामान बेचने वाली ऑनलाइन एजेंसियां भी आ गई हैं. खुदरा कारोबार ठिठका हुआ जहां का तहां स्थिर है.

क्या किसी समाज और देश की अर्थव्यवस्था के लिए यह सही संकेत है कि जो इसकी बहुसंख्यक आबादी का बाजार है, वह धीरे धीरे हाशिये पर जाता हुआ दिखे और नई भव्यताएं, प्लास्टिक मनी और इंटरनेट कारोबार के रूप में जगह बनाती जाएं. क्या यह संभव नहीं है कि खुदरा कारोबार की जगह भी बनी रहे और प्रतिस्पर्धा के पैमाने तय किये जाएं. एक दुकान दूसरी दुकान को निगलते हुए ही फैलेगी, क्या स्वस्थ और विकासशील बाजार का यही एक फलसफा है. ऑनलाइन कारोबार के पास जो पूंजी और डायनेमिक्स आया है उससे तो छोटे दुकानदार और कारोबारी तो मुंह ताकते रह जाएंगे.

मध्यवर्ग और उससे ऊपर के उपभोक्ता को तो सब कुछ उपलब्ध हो जाएगा. फोन और कुकर से लेकर चेतन भगत की 'हाफ गर्लफ्रेंड' तक. सेल का बोर्ड ऑनलाइन बाजार पर टंग गया है.

ब्लॉगः शिवप्रसाद जोशी

संपादन: ईशा भाटिया

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