एससी-एसटी छात्रों की फीस बढ़ाकर सीबीएसई को क्या मिलेगा | ब्लॉग | DW | 12.08.2019
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ब्लॉग

एससी-एसटी छात्रों की फीस बढ़ाकर सीबीएसई को क्या मिलेगा

केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड, सीबीएसई ने 2020 की 10वीं और 12वीं परीक्षा के लिए फीस में भारी वृद्धि की है. अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की श्रेणियों के विद्यार्थियों के लिए तो ये तीन गुना बढ़ोत्तरी बताई गई है.

बोर्ड का कहना है कि पांच साल बाद फीस बढ़ाना जरूरी हो गया था क्योंकि प्रतियोगी परीक्षाएं संचालित करने से होन वाली उसकी सरप्लस कमाई अब घट गई है. जनरल कैटेगरी वाले छात्रों को जहां 750 की जगह अब 1500 रुपये फीस देनी होगी वहीं एससी-एसटी वर्ग के छात्रों को 350 की जगह 1200 रुपये देने होंगे. माइग्रेशन शुल्क भी 150 रुपये से बढ़ाकर 350 रुपये कर दिया गया है. विदेशों में स्थापित सीबीएसई स्कूलों के छात्रों को अब 5000 की जगह 10 हजार रुपये देने होंगे.

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् (एनसीईआरटी) द्वारा 2016 में प्रकाशित आठवें अखिल भारतीय स्कूली शिक्षा सर्वे (एआईएसईएस) के मुताबिक देश में 10वीं कक्षा में नामांकित ढाई करोड़ से ज़्यादा विद्यार्थियों में करीब 16 फीसदी एससी और करीब साढ़े सात फीसदी एसटी वर्ग से हैं. 12वीं में नामांकित डेढ़ करोड़ से कुछ अधिक छात्रों में एससी के करीब साढ़े 13 प्रतिशत और एसटी के छह प्रतिशत छात्र हैं. दिल्ली में सीबीएसई से जुड़े सरकारी स्कूलों के एससी-एसटी छात्रों की फीस का भार राज्य सरकार वहन करती आई है. उन्हें वहां सिर्फ 50 रुपये फीस देनी होती थी. नयी बढोत्तरी के बाद भी दिल्ली सरकार के शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया ने कहा है कि उन विद्यार्थियों की फीस सरकार भरेगी. वैसे सीबीएसई से जुड़े देश भर के केंद्रीय विद्यालयों में पढ़ने वाले एससी-एसटी छात्रों की फीस भारत सरकार वहन करती है. निजी स्कूलों में एससी एसटी छात्रों की संख्या का कोई आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है.

फीस बढ़ोतरी से अभिभावकों पर दबाव आना निश्चित है. यहां तक कि निजी स्कूलों में भी अभिभावक इस बात से हैरान है कि फीस एक झटके में दुगुनी और तिगुनी कर देने की वास्तविक मंशा क्या है. राजनीतिक दलों, मानवाधिकार संगठनों और शिक्षा से जुड़े आंदोलनकारियों ने भी फीस बढ़ोतरी को अनुचित बताते हुए आरोप लगाया है कि ये पहले से गरीब और वंचित तबकों को और पीछे धकेलने की कोशिश नजर आती है. उधर स्कूलों ने अभिभावकों से कहा है कि वे अपनी शिकायतें सीबीएसई के पास भेजें.

बोर्ड का कहना है कि पिछले साल तक वो जेईई-मेन, नीट और नेट जैसी प्रतियोगी और पात्रता परीक्षाएं आयोजित करता आ रहा था जिससे उसके पास कुछ हजार करोड़ रुपए की अतिरिक्त धनराशि की व्यवस्था हो गई थी और जो फीस की सब्सिडी में खर्च हो रही थी लेकिन अब उपरोक्त परीक्षाएं नेशनल टेस्टिंग एजेंसी, एनटीए के हवाले कर दी गई हैं, लिहाजा ये कदम उठाया गया है. बोर्ड का ये दावा भी है कि बढ़ोतरी के बावजूद उसकी फीस देश के कई दूसरे स्कूलो बोर्डों से कम ही है. मानव संसाधन विकास मंत्रालय के तहत सीबीएसई एक स्वायत्त इकाई है. बोर्ड कहता है कि वो स्वपोषित है और नो प्रोफिट नो लॉस के आधार पर काम करता है और अपने फंड खुद जेनरेट करता है.

लेकिन सीबीएसई जैसे विशाल आकार वाले बोर्ड का खर्चों में वृद्धि और अपनी ढांचागत और प्रक्रियात्मक समस्याओं के लिए इस तरह रोना हैरान करता है. पूछा जा सकता है कि बोर्ड आज या कल से तो संचालित हो नहीं रहा है. केंद्र सरकार द्वारा नियंत्रित और संचालित इस राष्ट्रीय बोर्ड का पुनर्गठन 1962 में हुआ था. 1921 में उत्तर प्रदेश में पहला इंटरमीडिएट और हाईस्कूल यूपी बोर्ड अस्तित्व में आया था. आगे चलकर अलग अलग क्षेत्रों में स्कूली बोर्ड के गठन हो जाने के बाद 1952 में इस बोर्ड का नाम बदलकर सीबीएसई किया गया और नवंबर 1962 से इसे राष्ट्रीय स्तर का बोर्ड बनाकर नये ढंग से संचालन शुरू हुआ. बोर्ड की वेबसाइट पर दर्ज जानकारी के मुताबिक बोर्ड के देश में 21271 और दुनिया के 25 अन्य देशों में 228 स्कूल हैं. बोर्ड 1138 केंद्रीय विद्यालयों, 3011 सरकारी या सहायता प्राप्त स्कूलों, 16741 स्वतंत्र या निजी स्कूलों, 595 जवाहर नवोदय विद्यालयों और 14 केंद्रीय तिब्बती स्कूलों का संचालन करता है. इन स्कूलों में एनसीईआरटी द्वारा बनाई पाठ्यक्रम को मान्यता मिली हुई है.

असल में बोर्ड की फीस बढ़ोत्तरी के फैसले के पीछे कुछ आहटें और ध्वनियां अलग ढंग से भी सुनी जा सकती हैं जिनका संबंध समूचे शिक्षा बजट में साल दर साल होती आ रही कटौतियों से भी जुड़ता है. ये अंदेशे नये नहीं है कि क्या केंद्र हो या राज्य सरकारें, धीरे धीरे अपने अधीन बोर्डों की स्वायत्तता को या तो छीन रही हैं या उनमें अपने नियंत्रण को इसलिए ढीला कर रही हैं क्योंकि उनकी रुचि अब प्राइवेट सेक्टर की ओर है कि वो शिक्षा के क्षेत्र में निवेश करे. देश भर में गैर सीबीएसई स्कूलों की बढ़ती संख्या और निजी विश्वविद्यालयों की संख्या में बढ़ोत्तरी में इन अंदेशों की कुछ छाया देखी जा सकती हैं.

प्रस्तावित राष्ट्रीय शिक्षा नीति के मसविदे में भी कहा गया है कि सकल नामांकन दर बढ़ाने के लिए और अधिक स्कूलों और अधिक विश्वविद्यालयों की आवश्यकता है. शिक्षा बजट में कटौतियां बताती हैं कि ये आगामी निवेश सरकारों द्वारा या सरकारी संस्थाओं द्वारा तो नहीं होंगे. या तो वे विशुद्ध निजी स्वामित्व होंगे या पब्लिक प्राइवेट भागीदारी-पीपीपी. ये भी एक बड़ी चिंता जताई जाती है कि शिक्षा का जिस तेजी से निजीकरण और कॉरपोरेटीकरण हो रहा है उसके चलते कहीं दलित और गरीब पूरी तरह से शिक्षा के इस भव्य, महंगे, और आलीशान सिस्टम से बाहर ना कर दिए जाएं. असल में सबको शिक्षा सबको काम के मानवाधिकारों की उल्टी गिनती आज की नहीं, ये 90 के दशक से ही शुरू हो चुकी थी जब आर्थिक उदारवाद और बाजार केंद्रित मुक्त अर्थव्यवस्था के लिए दरवाजे खोले गये थे.

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