एशियाई फुटबॉल को मसीहा का इंतजार | ब्लॉग | DW | 29.06.2018
  1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages
विज्ञापन

ब्लॉग

एशियाई फुटबॉल को मसीहा का इंतजार

एशिया और अफ्रीका में दुनिया की 80 फीसदी आबादी रहती है. वहां खेलों के प्रति दीवानगी जरा भी कम नहीं है, लेकिन फिर भी आज तक ये महाद्वीप फुटबॉल में इतने पिछड़े क्यों दिखते हैं?

हर देश में एक टीम स्पोर्ट्स सबसे बड़ा होता है, बाकी उसकी छाया में छुप जाते हैं. यूरोप, दक्षिण अमेरिका और अफ्रीका में फुटबॉल को ये दर्जा हासिल है. वहीं भारत, पाकिस्तान और ऑस्ट्रेलिया में क्रिकेट का खुमार सिर चढ़कर बोलता है. अंतरराष्ट्रीय मंच पर टीम की बड़ी जीतें इस दीवानगी को फैलाने में अहम भूमिका दर्ज करती हैं. वर्ल्ड कप की जीत तो हमेशा सोने पर सुहागे का काम करती है. वह पूरे देश को गर्व के साथ झूमने का मौका देती है और बच्चों की नई पीढ़ी को भविष्य के खिलाड़ियों के रूप में अंकुरित होने का.

नाइजीरिया, सेनेगल, आइवरी कोस्ट, जापान, दक्षिण कोरिया, ईरान और सऊदी अरब जैसे देशों में फुटबॉल के प्रति दीवानगी कम नहीं. लेकिन इसके बावजूद आज तक कोई भी एशियाई या अफ्रीकी देश देश फुटबॉल वर्ल्ड कप के फाइनल तक नहीं पहुंच सका है. 2018 के वर्ल्ड कप में भी कोई नया नजारा नहीं दिखा. अफ्रीका और एशिया की ज्यादातर टीमें पहला राउंड भी पार नहीं कर सकीं.

इसके पीछे कई वजहें हैं. जापान को छोड़ दें तो इस बार वर्ल्ड कप में पहुंची एशियाई टीमें बहुत ही कड़े ग्रुपों में फंस गई. ईरान और मिस्र पुर्तगाल और स्पेन के बीच फंस गए. सऊदी अरब और मोरक्को उरुग्वे और मेजबान रूस वाले ग्रुप में दब गए. नाइजीरिया क्रोएशिया और अर्जेंटीना से पार नहीं पा सका. सबसे बुरा दक्षिण कोरिया फंसा, वह जर्मनी, स्वीडन और मेक्सिको जैसे पावरहाउसों से घिर गया. फिर जिसका अंदाजा था वही हुआ. सारी टीमों ने आखिर में जबरदस्त खेल दिखाकर तारीफें बटोरीं लेकिन तब तक देर हो चुकी थी. एशिया और अफ्रीका एक बार फिर सफलता से कोसों दूर रह गए.

बड़ी सफलता के बिना किसी खेल को दीवानगी की हद तक पहुंचाना असंभव सा है. अमेरिका में बेसबॉल, रग्बी और बॉस्केटबॉल ने यह कर दिखाया है. न्यूजीलैंड में रग्बी सफलता की इबारत लिखती है. भारत में यह काम क्रिकेट करता है. भारत को जब तक फील्ड हॉकी से गोल्ड मेडल मिलते रहते थे, तब तक छोटे शहरों में भी युवा हॉकी खिलाड़ी दिख जाते थे. 1970 के दशक तक एक बहुत ही छोटा सा तबका क्रिकेट खेला करता था. लेकिन 1983 के आईसीसी वर्ल्ड कप ने तस्वीर बदल दी. नए सितारे पैदा हुए. देश को नए हीरो मिले जो दुनिया का सबसे बड़ा मुकाबला जीत चुके थे. उनकी स्टार वैल्यू को बाजार ने भुनाना शुरू किया. आज भारतीय क्रिकेट बोर्ड और उसके खिलाड़ी दुनिया के सबसे अमीर क्रिकेटरों में शुमार हैं. उनका प्रदर्शन टीम को जीत भी दिलाता है और साबुन और मोटरसाइकिल भी बिकवाता है. स्टेट, जोन, रणजी और आईपीएल जैसे मौकों के चलते अब परिवारों को भी लगता है कि सुनहरे भविष्य तक पहुंचा जा सकता है.

एशिया और अफ्रीका में फुटबॉल का खेल यह ग्लैमर कभी हासिल नहीं कर सका. भारत समेत कई देशों के बच्चों से पूछिए कि उनकी पंसदीदा फुटबॉल टीम कौन सी है तो ज्यादातर कहेंगे ब्राजील, अर्जेंटीना या पुर्तगाल. लेकिन क्यों? इसकी वजह इन टीमों की सफलता है, उनके स्टार खिलाड़ी है जिनके फैंस दुनिया भर में हैं.

एशिया और अफ्रीका में फुटबॉल का चाहे कितना ही बड़ा खिलाड़ी पैदा हो जाए, उसे हमेशा यूरोप और दक्षिण अमेरिकी सितारों से प्रतिस्पर्धा करनी पड़ेगी. उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खुद को बेस्ट साबित करना होगा. लेकिन भविष्य तक पहुंचने के लिए उसे यूरोप के क्लबों की जरूरत पड़ेगी. यूरोपीय क्लबों में पैसा है, शोहरत है और दूसरे खिलाड़ियों व कोचों से बहुत कुछ सीखने को भी मिलता है. एशिया और अफ्रीकी देशों में भले ही फुटबॉल लीगें हों, लेकिन वहां खेलते रहने से अंतरराष्ट्रीय पहचान कभी नहीं मिलती. एशिया में फुटबॉल के साथ यह एक सबसे बड़ी दिक्कत है. जिस दिन एशिया और अफ्रीका में भी रोनाल्डो, मैराडोना, मेसी या पेले जैसा कोई सितारा उभरेगा और टीम को जीत दिलाता चला जाएगा, उस दिन पृथ्वी के इन दो बड़े महाद्वीपों पर फुटबॉल का पुर्नजन्म होने लगेगा.

(लंबे समय तक खेलना और लगातार चोटी का प्रदर्शन करते रहना, महान खिलाड़ियों की यही पहचान होती है. एक नजर अलग अलग खेलों के बड़े खिलाड़ियों पर.)

DW.COM

संबंधित सामग्री

विज्ञापन