एनआरआई भी चाहते हैं भारत में बदलाव | जर्मन चुनाव 2017 | DW | 26.08.2011
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जर्मन चुनाव

एनआरआई भी चाहते हैं भारत में बदलाव

भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे के आंदोलन से देश भर में खलबली है लेकिन जो भारतीय देश के बाहर रहते हैं वे क्या सोचते हैं इस आंदोलन के बारे में. डॉयचे वेले हिंदी ने कुछ ऐसे भारतीयों से बात की जो देश से बाहर रहते हैं.

अन्ना का आंदोलन

अन्ना का आंदोलन

ऐसा कहा जाता है कि भारत में जन्म प्रमाणपत्र से शुरू होकर मृत्यु प्रमाणपत्र तक भ्रष्टाचार निरंतर चलता रहता है. स्कूल में एडमिशन के लिए घूस देनी पड़ती है और गैस कनेक्शन के लिए मंत्री और एमपी की सिफारिश लगानी पड़ती है. भारत का हर दूसरा शख्स भ्रष्टाचार से रोजाना दो चार होता है. इस भ्रष्टाचार के पेड़ को जड़ से उखाड़ने के लिए अन्ना हजारे और उनके साथियों ने कमर कस ली है. अन्ना के साथ  उनकी इस मुहिम में मध्य वर्ग और उच्च वर्ग भी शामिल हो गया है.

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जनलोकपाल का एक समर्थक

लेकिन जो लोग सालों पहले देश छोड़ विदेश चले गए हैं या फिर काम के सिलसिले में विदेश में रहते हैं, उनकी क्या राय है लोकपाल बिल और भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के बारे में. डॉयचे वेले हिंदी ने विदेश में बस गए या काम कर रहे भारतीयों से बात की.

फ्रांस की राजधानी पेरिस में सिनिवर्स टेकनोलॉजी में डेवलपमेंट के मैनेजर रोहित कुमार कहते हैं, "भारत में बदलाव के लिए अच्छा मौका है. देश की जनता भ्रष्टाचार से परेशान हो चुकी हैं. लंबे अर्से बाद लोग सड़कों पर उतरे हैं और यही मौका है भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़ा कानून लाने का क्योंकि आपको नहीं पता फिर कितने और साल लग जाएंगे इस तरह के आंदोलन को तैयार होने में." पेरिस में पिछले चार साल से रह रहे कुमार बताते हैं कि पेरिस में भ्रष्टाचार नहीं है. अगर है भी तो रोजमर्रा की जिंदगी में लोगों को इससे परेशान नहीं होना पड़ता है. उनके मुताबिक भारत में कदम कदम पर भ्रष्टाचार है.

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भ्रष्टाचार से परेशान सब

लंदन में टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज के दफ्तर में पोर्टफोर्लियो मैनेजर के तौर पर काम करने वाले विजय आनंद अन्ना के आंदोलन के तरीके से थोड़ा असहमत  हैं. आनंद का कहना है कि सरकार पर किसी कानून को बनाने के लिए दबाव डालना ठीक नहीं है. उनके मुताबिक, "सरकार और संसद एक प्रक्रिया के तहत चलती है. कोई भी कानून दबाव में पास नहीं किया जा सकता है. भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना जो कर रहे हैं ठीक है लेकिन समयसीमा तय करना ठीक नहीं है."

जर्मनी की वित्तीय नियामक संस्था बाफिन में सीनियर इंस्पेक्टर भारतीय मूल के राकेश सिंह कहते है, "अन्ना के आंदोलन से मैं सहमत हूं क्योंकि आंदोलन के जरिए भ्रष्टाचार राजनीतिक मुद्दा बन पाया है.  लेकिन मुझे नहीं लगता कि जन लोकपाल बिल के जरिए भ्रष्टाचार खत्म हो पाएगा या काबू में आ पाएगा."

राकेश कहते हैं, "जन लोकपाल समिति में शामिल चंद लोगों के पास इतनी शक्ति हो जाएगी कि वे संसद और प्रधानमंत्री के बराबर पहुंच जाएंगे और हो सकता है कि भ्रष्टाचार का समर्थन कर दें क्योंकि बहुत कम लोगों के पास बहुत ज्यादा ताकत आ जाएगी."

डॉयचे वेले ने भारत से बाहर रह रहे भारतीय लोगों से पूछा कि क्या भ्रष्टचार के खिलाफ अन्ना के आंदोलन से भारत की छवि खराब हो रही है तो ज्यादातर लोगों का कहना है कि देश की छवि खराब नहीं हो रही है.

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अन्ना के समर्थन में रैली

यूनेस्को इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर एजुकेशन के रिटायर्ड निदेशक प्रोफेसर डॉक्टर आर एच दवे कहते हैं,  "भारत की छवि अच्छी हो रही है. क्योंकि यह आंदोलन अहिंसक है और दुनिया भर में जहां भी आंदोलन हो रहे हैं वह हिंसक है. भारत की छवि भ्रष्टाचार की वजह से खराब होती आई है लेकिन इस आंदोलन की वजह से भारत की छवि सुधरी है."

जर्मनी में रह रहे दवे कहते हैं भ्रष्टाचार के राक्षस का वध करने के लिए टीम अन्ना और सरकार को साथ मिलकर काम करना चाहिए. भारत ही नहीं दुनिया भर में फैले भारतीय भ्रष्टाचार के खिलाफ लामबंद हो रहे है.

पिछले कुछ महीनों में अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, कनाडा में रह रहे भारतीयों ने अन्ना का समर्थन किया है और संसद में जन लोकपाल बिल पेश करने की मांग की है. विदेशों में जन लोकपाल के समर्थन में बकायदा अभियान चलाए जा रहे हैं. सोशल नेटवर्किंग साइट का भी सहारा लेकर वे अपनी आवाज को बुलंद कर रहे हैं.

रिपोर्टः आमिर अंसारी

संपादनः ए जमाल

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