एक-दो सेंट पर संकट | दुनिया | DW | 25.05.2013
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दुनिया

एक-दो सेंट पर संकट

भारत में एक, दो, पांच, दस, पच्चीस, पचास पैसे के सिक्के भले ही अब निजी संकलन की शोभा बढ़ा रहे हों. यूरोप में इन सिक्कों का चलन अभी भी है. लोग 10.01 यूरो बराबर अदा करते हैं. लेकिन ऐसा कब तक हो पाएगा, पता नहीं...

अब इन सिक्कों की भारी आलोचना हो रही है क्योंकि इन्हें बनाना बहुत महंगा है. और इन्हें दुकानों में बांटना भी. इसलिए अब यूरोपीय संघ तांबे के रंग के सिक्के बंद करने के बारे में विचार कर रहा है.

यूरो संकट के दौर में कई बार इन सिक्कों को बंद करने के खिलाफ आवाज उठी. जैसे कि जर्मनी की नई पार्टी, अल्टरनेटिव फॉर डॉयचलांड. यह पार्टी तो यूरो के भी खिलाफ है वह तुरंत इस साझा मुद्रा को खत्म करने के पक्ष में हैं.

यूरोपीय संघ में मुद्रा आयुक्त ओली रेन इस समय जिस मुद्दे की जांच कर रहे हैं वह है यूरो के कुछ हिस्से खत्म करना चाहते हैं, मुद्रा नहीं बल्कि छोटे छोटे एक और दो सेंट के सिक्के. यूरोपीय संघ संसद और यूरोपीय संघ मंत्रिपरिषद ने ओली रेन से ये जांच करने की मांग की है. व्यवसाय और राजनीति की दुनिया में अलग अलग लोगों से पूछने के बाद शुरुआती रिपोर्ट में रेन ने कहा,"एक और दो सेंट के सिक्के घाटे का सौदा है.

कीमत से ज्यादा महंगी

लोहे और तांबे से बने इन सिक्कों को बनाना इनकी कीमत से कहीं ज्यादा महंगा है. इसके अलावा और कीमतें इसमें जुड़ती हैं जब इन्हें छोटी दुकानों में भेजना पड़ता है. यूरोपीय आयोग के मुताबिक इन सिक्कों के निर्माण और कीमत में अंतर अबक 1.4 अरब यूरो का हो गया है.

फिनलैंड और नीदरलैंड्स में बिना एक और दो सेंट के सिक्कों के ही काम चलाया जा रहा है. क्योंकि सभी कीमतें पांच सेंट पर खत्म की गई हैं और इसलिए व्यवहारिक रूप में इन सिक्कों का बाजार में प्रचलन नहीं के बराबर है. जर्मनी में ऐसा कोई सोच भी नहीं सकता. जर्मन व्यापार संघ के प्रेस अधिकारी श्टेफान हैर्टेल कहते हैं, "कई सर्वे ऐसे हैं, जर्मन बैंक बुंडेसबांक के भी, जो दिखाते हैं कि उपभोक्ताओं का बहुमत एक और दो सेंट के सिक्के पसंद करता है और उन्हें बाजार में रहने देना चाहता है."

Im Supermarkt CAP in Hamburg sitzt eine Mitarbeiterin an der Kasse.

छोटी दुकानें भी इन सिक्कों को रखना चाहती हैं. क्योंकि मनोवैज्ञानिक कारणों से 0,99 सेंट कीमत तय करना एक परंपरा है. हैर्टेल कहते हैं, "बिना एक सेंट के हम ऐसा कर ही नहीं पाएंगे."

महंगा पैसा

जर्मनी में छोटी दुकानों में सिक्के भेजने का जिम्मा संघीय बैंक का है. 2002 से पैसे बचाने के लिए बैंक ने अपनी शाखाओं में लोग कम किए. दुकानदारों के लिए मुश्किल क्योंकि उन्हें बैंक में सिक्के लेने जाना पड़ता है. नगदी देने के जिम्मेदार कार्ल लुडविग थीले बैंक ने बैंक का पक्ष रखते हुए डॉयचे वेले को बताया, बुंडेसबांक के तौर पर हमें ये शाखाएं हर जगह रखने की कोई जरूरत नहीं है." आखिरकार बुंडेसबांक को व्यावसायिक तरीके से काम करना है और उपभोक्ता को इसके बारे में कुछ पता नहीं चलता.

सिक्कों को लाने ले जाने की कीमत इतनी ज्यादा है कि बुंडेसबांक ने 2011 में ही यूरो सिक्के खास कंटेनर में भेजने शुरू किए हैं.

नॉर्मकंटेनर कहे जाने वाले इन कंटेनरों में सभी सिक्के मिला कर कुल तीन लाख चौदह हजार यूरो होते हैं. इनमें एक सेंट के ढाई हजार यूरो के सिक्के और दो सेंट के चार हजार यूरो के सिक्के होते हैं. यह छोटे दुकानदारों के लिए बहुत बड़ी समस्या है क्योंकि कम सिक्के अगर लेने हों तो पैसे देने पड़ते हैं.

एक और दो सेंट के सिक्कों को खत्म करने से मदद मिलेगी ये तय है. हैर्टेल के मुताबिक, "सिक्के खत्म करने से खर्च तो कम होगा ही. क्योंकि चेंज के लिए हमें हमेशा सिक्कों के रोल्स साथ में रखने होते हैं, इसमें पैसा लगता है जिसकी बचत करना जरूरी है."

बुंडेसबांक की फिलहाल कोई योजनाएं नहीं है कि सिक्के बाजार से हटाए. ऐसा तब तक नहीं होगा जब तक जर्मनी की अधिकांश जनता ऐसा नहीं चाहेगी. अब जब तक ओली रेन अपनी जांच में इस नतीजे तक नहीं पहुंचते कि यूरो के कुछ सिक्के हटा दिए जाएं, तांबे के सिक्के जर्मन और यूरोपीय जेबों में खनकते रहेंगे.

रिपोर्टः फ्रीडेल ताउबे/एमजे

संपादनः एन रंजन

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