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एक दूसरे को तबाह करती टेलिकॉम कंपनियां

१४ दिसम्बर २०१७

एसएमएस अब कोई भेजता नहीं. कॉल भी इंटरनेट से हो रही है. डाटा मुफ्त मिल रहा है. ऐसे में टेलिकॉम कंपनियां कैसे खुद को बचा पाएंगी. हजारों नौकरियां खत्म हो चुकी हैं और यह सिलसिला रूकने वाला नहीं है.

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Vodafone Abhörskandal
तस्वीर: REUTERS

जबरदस्त हो़ड़, विलय और अधिग्रहण की वजह से भारत में टेलिकॉम क्षेत्र लगातार सिकुड़ रहा है. इससे ग्राहकों की तो पौ-बारह है लेकिन इस क्षेत्र में नौकरियों में लगातार कटौती हो रही है. बीते एक साल में इस क्षेत्र में एक-चौथाई नौकरियां कम हुई हैं. दूसरी ओर, ग्राहकों को पहले के मुकाबले बेहद कम कीमत पर डाटा और लगभग मुफ्त में फोन की सुविधा मिल रही है. खासकर बीते साल रिलायंस जियो के मैदान में उतरने के बाद इस क्षेत्र में परिदृश्य तेजी से बदला है.

नौकरियों में कटौती

दूरसंचार क्षेत्र से जुड़े सूत्रों का कहना है कि इस क्षेत्र में कुल खर्च का लगभग पांच फीसदी वेतन-भत्तों पर खर्च होता है. बीते कुछ वर्षों के दौरान इस क्षेत्र में वेतन आसमान छूने लगा था. लेकिन तब फोन की दरों और डाटा की कीमतों के भी आसमान छूने की वजह से दूरसंचार कंपनियां दोनों हाथों से माल बटोर रही थीं. बीते साल रिलायंस जियो के मैदान में उतरने और फोन व डाटा की मुफ्त सुविधा देने के बाद दूसरी कंपनियों को भी अपनी दरों में कटौती पर मजबूर होना पड़ा. इससे उनके मुनाफे में गिरावट आई और तमाम कंपनियां खर्चों में कटौती के उपाय तलाशने लगी. इस मामले में पहली गाज कर्मचारियों पर ही गिरी. दरों में कटौती की वजह से एयरटेल का मुनाफा वर्ष 2016-17 की आखिरी तिमाही में 72 फीसदी की गिरावट के साथ 373.4 करोड़ रुपये पर आ गया. इसी तरह वोडाफोन के संचालन मुनाफे में 10 फीसदी की गिरावट आई. वित्त वर्ष 2016-17 के दौरान उद्योग का राजस्व पहली बार गिरकर 1.88 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया. चालू वित्त वर्ष के दौरान इसमें और गिरावट का अंदेशा है.

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रिलायंस जियो ने बाकी कंपनियों की हालत खस्ता कीतस्वीर: picture-alliance/abaca/I. Khan

मुनाफा घटने की वजह से कंपनियों के विलय व अधिग्रहण की प्रक्रिया भी तेज हुई है. मोटे अनुमान के मुताबिक, इस क्षेत्र में काम करने वाले लगभग तीन लाख कर्मचारियों में से बीते साल भर के दौरान 75 हजार लोगों की नौकरियां चली गईं. उनको या तो निकाल दिया गया या फिर करियर को ध्यान में रखते हुए वह खुद छोड़ कर चले गए.

(एक नजर मोबाइल फोन के सफर पर)

रोजगार तलाशने वाली एक वेबसाइट के पार्टनर केसी रामचंद्रन कहते हैं, "ज्यादातर मामलों में कर्मचारियों से इस्तीफे मांग लिए गए और कुछ मामलों में उनको मुआवजे के तौर पर तीन से छह महीने तक का वेतन दिया गया." वह कहते हैं कि अभी तो यह शुरूआत है. विलय प्रस्तावों को अमली जामा पहनाए जाने नौकरियां और घटेंगी. रामचंद्रन कहते हैं कि जिन लोगों की नौकरियां जा रही हैं उनमें से ज्यादातर लोग मध्यक्रम या वरिष्ठ प्रबंधन स्तर के हैं. उनके लिए अब दूसरे क्षेत्रों में नौकरी तलाशना बेहद मुश्किल साबित होगा.

एक अन्य फर्म एबीसी कंसल्टेंट्स के कार्यकारी निदेशक विवेक मेहता कहते हैं, "अब तक नौकरी से हटाए गए या इस्तीफा देने वालों में 25 से 30 फीसदी मध्यक्रम के प्रबंधन का हिस्सा थे." वह भी कहते हैं कि कई कंपनियों के विलय के प्रस्तावों को अब तक अंतिम स्वरूप नहीं दिया गया है. विलय प्रस्तावों को अमली जामा पहनाने की स्थिति में मैनपावर में और कम से कम 15 फीसदी कटौती तय है.

जियो का असर

बीते साल सितंबर में रिलायंस जियो के मौदान में उतरने के बाद राजस्व व मुनाफा तेजी से घटने के बाद टेलिकॉम कंपनियों में खुद को मजबूत करने की होड़ मची है. यह क्षेत्र फिलहाल पांच लाख करोड़ के कर्ज के बोझ से हांफ रहा है. दूसरे नंबर पर रही वोडाफोन और तीसरे नंबर की आइडिया विलय की राह पर हैं. दूसरी ओर, पहले टेलीनोर इंडिया को खरीद चुकी भारती एयरटेल ने टाटा टेलीसर्विसेज के वायरलेस कारोबार को खरीदने का एलान किया है. रिलायंस कम्युनिकेशंस भी अब काल सुविधा खत्म कर चुकी है. इसी तरह एयरसेल भी अपना कारोबार सीमित करने का मन बना चुकी है.

सूत्रों का कहना है कि सिर्फ मोबाइल फोन कंपनियां ही नहीं बल्कि वेंडर और टावर कंपनियां भी इसी समस्या से जूझ रही हैं. रोजगार मुहैया कराने वाली तमाम वेबसाइटों का कहना है कि हाल में दूरसंचार क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारियों का बायोडाटा आने की गति तेज हुई है. यह वैसे लोग हैं जो समय रहते दूसरी नौकरियां तलाशने का प्रयास कर रहे हैं.

एक फर्म हेडहंटर्स इंडिया के अध्यक्ष के लक्ष्मीकांत कहते हैं, "टेलिकॉम क्षेत्र में वरिष्ठ प्रबंधन स्तर पर नई नौकरियां तेजी से कम हुई हैं. इसके अलावा उद्योग में मैनपावर 25 से 33 फीसदी तक कम हुई है. "  

टेलिकॉम उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि इस क्षेत्र में लगभग डेढ़ लाख रोजगार खत्म होने वाले हैं. इसकी वजह यह है कि तेजी से बढ़ती चुनौतियों के माहौल में वह लागत घटाने के लिए लगातार जूझ रहा है. रेटिंग एजंसी क्रिसिल ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि डाटा ग्राहकों के लिए कीमतों में कटौती की लगातार बढ़ती होड़ के चलते टेलिकॉम आपरेटरों को जो झटका लगा है उससे उबरना बेहद मुश्किल साबित होगा. रिपोर्ट के मातिबक, इस होड़ के खत्म होने पर इसके फायदे नजर आएंगे. लेकिन फिलहाल तो इस क्षेत्र की मुश्किलें कम होने के आसार कम ही हैं.

(किस देश में मोबाइल डाटा की कितनी खपत)

रिपोर्टः प्रभाकर