उलझे हुए रिश्तों को सुलझाने की कोशिश | ब्लॉग | DW | 06.04.2018
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ब्लॉग

उलझे हुए रिश्तों को सुलझाने की कोशिश

नेपाल के प्रधानमंत्री खड्ग प्रसाद शर्मा ओली की तीन-दिवसीय भारत यात्रा दोनों देशों के जटिल संबंधों के साए में हो रही है. नेपाल एवं भारत की आंतरिक राजनीति के वर्तमान स्वरूप को देखते हुए यह यात्रा बहुत महत्वपूर्ण है.

अपने देश में ओली की राजनीतिक स्थिति जितनी सुदृढ़ है, उतनी सुदृढ़ उनके किसी भी पूर्ववर्ती प्रधानमंत्री की दशकों से नहीं रही. नेपाली संसद ने उनकी सरकार में तीन-चौथाई बहुमत से विश्वास व्यक्त किया है. इस समय उनकी पार्टी सीपीएन-एमएल और पुष्पकमल दाहल "प्रचंड" की पार्टी सीपीएन-एमसी का गठबंधन सत्ता में है और दोनों को मिलाकर एक पार्टी बनाने की कोशिशें चल रही हैं. अगर उपेंद्र यादव की मधेसी पार्टी एफएसएफएन ने भी इस गठबंधन से हाथ मिला लिया तो सरकार को संसद में दो-तिहाई बहुमत प्राप्त हो जाएगा. नेपाल में इसके पहले कभी भी कम्युनिस्टों का राष्ट्रीय राजनीति और संसद में इतना अधिक प्रभाव नहीं था. इसका सीधा मतलब यह है कि विदेशी सरकारों के साथ कम्युनिस्ट केपी शर्मा ओली एक मजबूत प्रधानमंत्री के रूप में पेश आएंगे. उधर नयी दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में हिंदुत्ववादी भारतीय जनता पार्टी की सरकार है जिसने दो साल पहले नेपाल के खिलाफ अघोषित आर्थिक नाकेबंदी लागू कर दी थी जिसके कारण नेपाल की जनता को काफी कष्ट उठाना पड़ा था. 

नेपाल की राजनीति के तार हमेशा से भारत के साथ जुड़े रहे हैं लेकिन अब वह रिश्ता टूट रहा है क्योंकि पहले कांग्रेस और नेपाली कांग्रेस के बीच वैचारिक नजदीकी थी और समाजवादी धारा से जुड़े लोग भी नेपाली कांग्रेस के समर्थक थे. लेकिन अब स्थिति एकदम बदली हुई है. ओली भी नेपाल और भारत के बीच के विशिष्ट रिश्ते को तो मानते हैं, लेकिन साथ ही चीन और भारत के साथ समान दूरी बनाए रखने की बात भी करते हैं जो चीन को बहुत अच्छी लगती है लेकिन भारत को कतई नहीं क्योंकि भारत हमेशा नेपाल को अपने प्रभावक्षेत्र के भीतर देखने का आदी रहा है.

China Besuch Khadga Prasad Sharma Oli (Getty Images/L. Zhang)

दो साल पहले चीन के दौरे पर पीएम ओली

उधर चीन सैन्य महाशक्ति ही नहीं, आर्थिक महाशक्ति भी है और वह अपनी आर्थिक मजबूती का पूरा-पूरा इस्तेमाल नेपाल को अपनी ओर खींचने के लिए कर रहा है. पनबिजली परियोजनाओं, सडकों और पर्यटन के क्षेत्रों में वह भारी निवेश करने के लिए तैयार है. उधर नेपाली जनता को हमेशा इस बात की शिकायत रही है कि नेपाल के व्यापार जगत पर भारतीयों का कब्जा है. पिछले कुछ सालों में भारत और नेपाल के संबंधों में तनाव बढ़ा ही है, घटा नहीं.

इस समीकरण में पाकिस्तान भी एक घटक है. पिछले महीने उसके प्रधानमंत्री एसके अब्बासी ने नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री ओली को बधाई देने के लिए अचानक काठमांडू पहुंच कर सभी को चौंका दिया था. भारत की काफी दिनों से शिकायत रही है कि पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई नेपाल को भारतविरोधी गतिविधियों के लिए इस्तेमाल करती है. यूं भी पाकिस्तान चीन का सदाबहार दोस्त है, इसलिए भारत चीन-नेपाल-पाकिस्तान के त्रिकोणीय समीकरण को हमेशा से नापसंद करता रहा है. 

क्या उम्मीद लेकर भारत आए हैं नेपाल के प्रधानमंत्री?

राजनीतिक विश्लेषक चंद्रकिशोर, काठमांडू

ऑडियो सुनें 06:25

क्या उम्मीद लेकर भारत आए हैं नेपाल के प्रधानमंत्री?

राजनीतिक दृष्टि से नेपाल भारत के प्रति दुहरा मानदंड अपनाता रहा है. जब वहां की आन्तरिक स्थिति ख़राब होती है, तो वहां के राजनीतिक दल भारत से हस्तक्षेप की गुहार करते हैं. वरना वे भारत पर नेपाल के अंदरूनी मामलों में दखलंदाजी का आरोप लगाते रहते हैं. संविधान निर्माण के साथ ऐसा ही हुआ. जो संविधान बना, वह भारत की पसंद का नहीं था लेकिन नेपाल का कहना था कि यह तो उसका अपना मामला है, भारत को क्या लेना-देना?

ओली को प्रधानमंत्री बने दो माह ही हुए हैं. उनकी भारत यात्रा की घोषणा भी अचानक ही हुई है. कुछ लोगों का तो यह भी कहना है कि भारत ने एकतरफा ढंग से इसकी घोषणा कर दी और अभी ओली पर्याप्त रूप से इसके लिए तैयार नहीं हैं. खैर जो भी हो, इन तीन दिनों में तय हो जाएगा कि नेपाल की नयी कम्युनिस्ट सरकार के साथ भारत की भाजपा सरकार के कैसे संबंध बनेंगे.

 

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