उद्योग नहीं हैं, फिर भी प्रदूषण में अव्वल कैसे हैं ये शहर | दुनिया | DW | 19.02.2019
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दुनिया

उद्योग नहीं हैं, फिर भी प्रदूषण में अव्वल कैसे हैं ये शहर

नए अध्ययन के मुताबिक, इस साल भारत में पड़ोसी देश चीन के मुकाबले 50 प्रतिशत ज्यादा प्रदूषण बढ़ा है. उत्तर भारत के मैदानी शहरों में हालात सबसे बुरे पाए गए हैं.

प्रदूषण के ताजा आंकड़ों पर नजर दौड़ाएं तो गंगा के मैदानी क्षेत्रों में बसे शहरों में इसकी स्थिति गंभीर होती जा रही है. एक नए अध्ययन से पता चला है कि पटना, कानपुर और वाराणसी जैसे शहर देश के सबसे ज्यादा प्रदूषित शहरों में शामिल हैं.

इन शहरों में कभी छोटे-मोटे उद्योग और औद्योगिक इकाइयां हुआ करती थीं जो या तो बंद हो गईं या फिर उन्हें प्रदूषण फैलाने की वजह से बंद कर दिया गया, बावजूद इसके प्रदूषण का स्तर बढ़ रहा है. आईआईटी कानपुर ने दो अन्य संस्थाओं के साथ मिलकर जो अध्ययन किया है, उसके मुताबिक इन शहरों में प्रदूषण की मात्रा सबसे ज्यादा पाई गई है जबकि मध्य भारत के शहरों में उत्तर भारत की तुलना में ये स्थिति बेहतर है.

यह आंकड़ा 45 दिन के अध्ययन के आधार पर सामने आया है और सर्वेक्षण पिछले वर्ष अक्टूबर और नवंबर महीने में किया गया था. रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल भारत में पड़ोसी देश चीन के मुकाबले 50 प्रतिशत ज्यादा प्रदूषण बढ़ा है.

अध्ययन के मुताबिक, पटना, कानपुर और वाराणसी की हवा अक्टूबर और नवंबर माह में 170 माइक्रोग्राम्स प्रति घनमीटर से ज्यादा थी. पार्टिकुलेट मैटर यानी पीएम 2.5 के पार्टिकल की वजह से लोगों को सांस लेने और देखने काफी दिक्कत हो रही है और स्वास्थ्य से जुड़ी गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है.

यदि बात कानपुर की जाए तो ये शहर कभी औद्योगिक इकाइयों का एक बड़ा केंद्र समझा जाता था, जहां लाल इमली, एल्गिन मिल जैसी बड़ी फैक्ट्रियां थीं और हजारों लोग यहां काम करते थे. आज ये सभी फैक्ट्रियां बंद हो गई हैं, फिर भी प्रदूषण का स्तर कम होने की बजाय बढ़ा ही है.

जानकारों के मुताबिक, प्रदूषण के लिए अकेले औद्योगिक इकाइयां ही जिम्मेदार नहीं हैं बल्कि इसके और भी कई कारक हैं. मसलन, गाड़ियों की बढ़ती संख्या, छोटे उद्योगों का मौजूद होना और उनका डीजल जैसे ईंधनों पर निर्भर होना, निर्माण कार्यों और टूटी सड़कों की वजह से हवा में उड़ती धूल भी बढ़ते प्रदूषण के लिए काफी हद तक जिम्मेदार है.

कानपुर के वरिष्ठ पत्रकार प्रवीण मोहता कहते हैं कि बड़े उद्योग भले ही न रहे हों लेकिन उद्योगों का एक बड़ा केंद्र अभी भी कानपुर है. उनके मुताबिक, चमड़ा उद्योग के अलावा हैवी मशीनरी, कंफेक्शनरी, डिटर्जेंट, रोलिंग मिल्स, प्लास्टिक इत्यादि का बड़ा निर्माता है कानपुर.

Indien - Ganges in Kanpur (Reuters/D. Siddiqui)

कानपुर में गंगा नदी के किनारे बहता गंदा नाला

मोहता कहते हैं, "आईआईटी कानपुर के एक विशेषज्ञ के अनुसार, शहर में सड़कों की हालत बदतर है, टूटी और खराब सड़कों के साथ सड़कों के किनारे कच्ची जमीन से जबर्दस्त धूल उड़ती है, बेतहाशा अतिक्रमण से नालियां ढक गई हैं, प्राकृतिक परिस्थितियों के कारण भी वातावरण में धूल उड़ती रहती है. प्रदूषण के ये ऐसे कारक हैं जिन पर लोगों का ध्यान नहीं जाता या ये कहें कि ध्यान देकर भी कुछ कर नहीं सकते. लेकिन यदि इस धूल पर काबू पाया जाए तो वायु प्रदूषण काफी हद तक कम किया जा सकता है.”

यही नहीं, शहरों में वाहनों से निकलने वाला धुंआ भी हवा में जहर घोलने का काम कर रहा है. शहर में वाहनों की औसत स्पीड 30 से 40 किमी/घंटा की है. यदि कानपुर शहर की बात करें तो परिवहन विभाग में 12 लाख गाड़ियां रजिस्टर्ड हैं. यही हाल पटना, वाराणसी, लखनऊ और गाजियाबाद जैसे शहरों का भी है.

ये गाड़ियां धूल उड़ाने के साथ कार्बन और अन्य गैसों का उत्सर्जन भी करती हैं. बेतरतीब यातायात और बार-बार लगने वाले भीषण जाम में यह गति 25 किमी तक रह जाती है. शहर से गुजर रहे हाइवे भी वायु प्रदूषण को बढ़ाने का काम करते हैं.

सड़कों की धूल के अलावा उद्योगों में प्रयुक्त होने वाले ईंधन भी वायु को जहरीला बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं. इन शहरों से बड़े कारखानों को भले ही हटा दिया गया हो लेकिन छोटे उद्योगों का एक बड़ा केंद्र आज भी यही शहर हैं. इन उद्योगों में अभी भी कई जगह डीजल, कोयला और लकड़ी का ही इस्तेमाल ईंधन के तौर पर किया जा रहा है.

उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की एक रिपोर्ट के मुताबिक, वायु प्रदूषण के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार सड़कों पर उड़ने वाली धूल और वाहनों से निकलने वाला धुंआ है. बोर्ड की ये रिपोर्ट में ये भी कहा गया था कि इस वायु प्रदूषण के चलते हर साल ठंड के मौसम में दूसरे देशों से आने वाले प्रवासी पक्षियों की संख्या में भी दिनोंदिन भारी कमी आ रही है.

यही नहीं, गंगा और उसकी सहायक नदियों में गिरने वाले अपशिष्ट पदार्थों की वजह से न सिर्फ पानी दूषित होता है बल्कि प्रदूषण के दूसरे कारकों पर भी ये सीधा असर डालता है. कुंभ के दौरान प्रदूषण कम करने के लिए बोर्ड ने कई कदम उठाए लेकिन वो आगे भी जारी रहेंगे, इसकी कोई गारंटी नहीं है.

अध्ययन की रिपोर्ट जारी करते हुए आईआईटी कानपुर के वैज्ञानिकों ने चेतावनी भी दी है कि वायु प्रदूषण खतरनाक स्तर तक पहुंच गया है और यदि हमने अभी नहीं ध्यान दिया तो बाद में काफी देर हो जाएगी.

आईआईटी कानपुर के प्रोफेसर सच्चिदानंद त्रिपाठी कहते हैं, "प्राकृतिक परिस्थितियों के चलते गंगा के मैदानी क्षेत्रों में जबर्दस्त प्रदूषण है. देश के 20-30 सबसे ज्यादा प्रदूषित शहर इसी क्षेत्र से हैं. वायु प्रदूषण से हर साल लाखों मौतें हो रही हैं, जो किसी महामारी से कम नहीं है. ड्यूक यूनिवर्सिटी ने कुछ वर्ष पहले एक शोध के हवाले से बताया था कि 2030 तक भारत डीजल से होने वाले उत्सर्जन को कम कर ले तो आधा ट्रिलियन डॉलर की बचत होगी. यही नहीं, यह प्रदूषण रुक जाए तो फसलों को होने वाला एक ट्रिलियन डॉलर का नुकसान भी रोका जा सकता है.”

वायु प्रदूषण पर पिछले पंद्रह वर्षों से काम कर रहे प्रोफेसर त्रिपाठी देश में हवा की गुणवत्ता जांचने के लिए लगे 100 मॉनिटरिंग स्टेशनों में 70 गंगा के मैदानी क्षेत्र में हैं. वो कहते हैं कि ये सेंसर काफी महंगे हैं लेकिन बिना इनके वायु की गुणवत्ता का पता नहीं चलेगा. प्रोफेसर त्रिपाठी के मुताबिक, वायु प्रदूषण रोकने के लिए तात्कालिक रूप से इसे फैलाने वाले कारकों पर नियंत्रण पाना होगा, क्लीन एनर्जी से चलने वाले वाहनों की ओर मुड़ना होगा और कानपुर जैसी जगहों पर पॉवर प्लांट्स बंद करने होंगे.

वहीं पटना की आबो-हवा खराब होने को गंभीरता से लेते हुए बिहार के पर्यावरण मंत्री सुशील कुमार मोदी ने कहा कि ये आंकड़े पटना के लिए चिंताजनक हैं. उन्होंने बताया कि राज्य सरकार ने एक एक्शन प्लान बनाया है, जिसे लागू कराने की पूरी कोशिश की जा रही है.

Indien - Ganges verschmutzung (Getty Images/AFP/S. Kanojia)

चमड़ा कारोबार में होता है पशुओं के अंगों का इस्तेमाल

आईआईटी कानपुर की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन ने भारत के मुकाबले कहीं ज्यादा बेहतर कार्य करते हुए प्रदूषण पर अंकुश लगाया है. रिपोर्ट के मुताबिक भारत में घरेलू धुंआ, ठोस ईंधन जलाना, बिजली संयंत्रों का उत्सर्जन और कचरा जलाने जैसे प्रदूषण के कई स्रोत हैं, जिन पर एक साथ अंकुश लगाना कठिन जरूर है लेकिन धीरे-धीरे कोशिश तो की ही जा सकती है.

रिपोर्ट के अनुसार इन तीनों शहरों में 70 फीसदी दिनों में हवा की गुणवत्ता खराब श्रेणी में दर्ज की गई जबकि मध्यम श्रेणी के दिनों की संख्या पटना में 30, कानपुर में 28 और वाराणसी में 19 फीसदी रही.

रिपोर्ट में दिलचस्प बात ये है कि इस अवधि में राजधानी दिल्ली में अच्छी श्रेणी के दिन 19 फीसदी, मध्यम 30 और खराब श्रेणी के दिन 51 फीसदी रहे. इसके मुताबिक, पटना, कानपुर और वाराणसी के बाद प्रदूषित हवा के मामले में दिल्ली का नंबर आता है जबकि प्रदूषित शहरों में जयपुर, रायपुर, रांची और अहमदाबाद हैं आते हैं.

राजधानी दिल्ली में वायु प्रदूषण की बड़ी वजह हरियाणा और पंजाब में फसल कटने के बाद उसके अवशेष यानी पराली जलाने को माना जाता रहा है और काफी हद तक यह है भी. लंबे समय से इसे रोकने की कोशिशें हो रही हैं लेकिन इसे रोका नहीं जा सका है. वहीं दूसरी ओर, पराली जलाने की समस्या अब पंजाब, हरियाणा से आगे बढ़कर उत्तर प्रदेश और बिहार के गांवों तक पहुंच चुकी है और वहां की हवा दूषित कर रही है.

 

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