उत्तराखंड में जंगल की आग से पिघलते ग्लेशियर | दुनिया | DW | 04.05.2016
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दुनिया

उत्तराखंड में जंगल की आग से पिघलते ग्लेशियर

उत्तर भारतीय राज्य उत्तराखंड में जंगल की आग से केवल इलाके की हरियाली और जीव-जंतु ही प्रभावित नहीं हुए हैं, बल्कि विशेषज्ञों ने इसकी वजह से हिमालय के ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने का अंदेशा भी जताया है.

एक पुलिसकर्मी समेत कम से कम आठ लोग अब तक इस दावानल की चपेट में आकर मारे जा चुके हैं. आग से जंगल के करीब 20 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र जल या झुलस चुका है. अप्रैल के महीने में ही इस इलाके में 1,200 से ज्यादा जगह आग लगी, जिसमें से ज्यादातर को बुझाया जा चुका है. अधिकारियों के हवाले से मीडिया रिपोर्टों में कहा गया है कि पिछले हफ्ते शुरु हुई 400 में से करीब 300 आग को बुझाया जा चुका है.

अल्मोड़ा में हिमालय के पर्यावरण और विकास के लिए स्थापित संस्थान जीबी पंत इंस्टीट्यूट के निदेशक पीपी ध्यानी ने बताया कि जंगल की आग ने अब तक "इलाके की जैवविविधता और नाजुक इकोसिस्टम को गंभीर नुकसान" पहुंचाया है. उन्होंने कहा कि "स्मॉग और राख की काली कार्बन आसपास के ग्लेशियरों पर जम रही है. ये विकिरणों को सोख लेगी और जिससे ग्लेशियरों का पिघलना और तेज हो जाएगा और वे घटते जाएंगे."

जंगल में रहने वाले हाथी, बाघ और हिरण जैसे बड़े जानवर तो किसी तरह सुरक्षित जगहों की ओर भागने में कामयाब रहे. लेकिन जैवविविधता के मामले में असली नुकसान तो पक्षियों और तितलियों जैसी प्रजातियों को पहुंचा है, जिनके अंडे और घोंसले आग में नष्ट हो गए.

इंसान भी इससे अछूते नहीं रहे. 10,000 से भी अधिक स्थानीय लोग, कई आपदा प्रबंधन कर्मचारी और सेना के कर्मचारी आग बुझाने की कोशिशों में लगे हैं. केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कहा है कि यह आग साल 2012 में लगी उत्तराखंड की भीषण आग से भी बड़ी साबित हो रही है. इस पर पूरी तरह काबू पाने में बुधवार या गुरुवार तक का समय लगने की उम्मीद है.

गर्मी के मौसम में अत्यंत सूखे वातावरण में चलने वाली तेज हवाएं आग को दूर दूर तक फैलाने का काम कर रही हैं. लू की चपेट में आने से मार्च से अब तक ही देश में 300 से भी अधिक लोगों की जान चली गई है.

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