उठ रहे हैं आलोचना के स्वर | ब्लॉग | DW | 07.05.2015
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ब्लॉग

उठ रहे हैं आलोचना के स्वर

नरेंद्र मोदी सरकार को सत्ता में आए एक साल पूरा होने को है और सभी तरफ से खबरें आ रही हैं कि मोदी मैजिक एक साल में ही फीका पड़ गया है. जनता ही नहीं, मोदी के समर्थक भी खुद को छला हुआ महसूस कर रहे हैं.

यह बात विपक्षी नेता कहें तो स्वाभाविक लगेगी लेकिन यदि अगर सत्तारूढ़ पार्टी के सांसद भी सरकार की आलोचना के सुर में बोलने लगें, तो स्पष्ट है कि समस्या गंभीर हो चली है. पिछले एक साल से भारतीय जनता पार्टी और केंद्र सरकार, दोनों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके सबसे नजदीक समझे जाने वाले पार्टी अध्यक्ष अमित शाह का निर्विवाद वर्चस्व है. पार्टी के भीतर मजाक भी चलता है कि यहां तो 2जी स्पेक्ट्रम है. यहां जी से अर्थ गुजराती से है क्योंकि मोदी और शाह दोनों ही गुजरात के हैं. खबर है कि उत्तर प्रदेश के बलिया निर्वाचन क्षेत्र से लोकसभा में चुनकर आए भरत सिंह ने बुधवार को हुई बीजेपी संसदीय दल की बैठक में खुलेआम मोदी सरकार की आलोचना करके सबको सकते में डाल दिया है. उनका कहना है कि एक साल बीतने के बावजूद जमीन पर कहीं विकास नजर नहीं आ रहा और मंत्रियों का सांसदों और पार्टी कार्यकर्ताओं से संपर्क टूट चुका है. मंत्रियों से संपर्क करना मुश्किल है और वे सांसदों की बातों पर ध्यान नहीं देते.

दरअसल समस्या कुछ और ही है, जिसके बारे में भरत सिंह भी जानते होंगे और शायद उसी की ओर ध्यान आकृष्ट करने के लिए उन्होंने यह कहा होगा. हकीकत यह है कि मोदी सरकार में मंत्रियों की नहीं, नौकरशाहों की चलती है. प्रधानमंत्री कार्यालय में सत्ता का ऐसा केन्द्रीकरण शायद इन्दिरा गांधी के कार्यकाल में भी न हुआ हो. इकोनोमिक टाइम्स की रिपोर्ट है कि विभिन्न मंत्रालयों को मिलाकर बनाए गए कार्यदलों में मंत्रियों की जगह वरिष्ठ अधिकारियों को रखा गया है. यह एक खुला रहस्य है कि मोदी सरकार में अरुण जेटली जैसे कुछेक मंत्रियों को छोडकर अन्य मंत्रियों के पास कुछ काम ही नहीं है. ऐसे में ये मंत्री सांसदों की बातें सुनें भी तो उनके अनुरोधों को पूरा नहीं कर पाएंगे. शायद इसीलिए वे सांसदों से दूरी बनाए हुए हैं.

लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी जैसे वरिष्ठ नेता पहले से ही हाशिये पर पहुंचा दिये गए हैं. मंगलवार को काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में आयोजित एक सेमिनार में जोशी ने भी मोदी सरकार पर परोक्ष रूप से कटाक्ष करते हुए कहा था कि वे बनारस को तोक्यो और क्योतो जैसा शहर बनाने की योजना के खिलाफ नहीं हैं लेकिन इसके लिए पहले ढांचागत विकास करना होगा. यही बात बुलेट ट्रेन चलाने की योजना पर लागू होती है. जोशी के यह कहने का अर्थ ही यह था कि योजनाओं की घोषणा तो कर दी गई है लेकिन उन्हें अमली जामा पहनाने के लिए ढांचागत सुविधाओं को विकसित करने की ओर अभी तक कोई ध्यान नहीं दिया गया है.

हकीकत यही है कि जमीनी स्तर पर अभी तक कहीं भी बदलाव के लक्षण नजर नहीं आ रहे और इसके कारण अब बीजेपी नेताओं और कार्यकर्ताओं में भी बेचैनी पैदा होने लगी है. चुनाव प्रचार के दौरान नरेंद्र मोदी ने जितने वादे किए थे, चाहे वे काला धन विदेश से वापस लाने के बारे में, महंगाई कम करने के बारे में या दाऊद इब्राहिम को भारत वापस लाने के बारे में हों, उनमें से एक भी पूरा होता नजर नहीं आ रहा है. और तो और, नरेंद्र मोदी पहले भारतीय प्रधानमंत्री बन गए हैं जिनका पुतला विदेश में फूंका गया है, और वह भी पड़ोसी देश नेपाल में.

हर किसी को मिस्ड कॉल देकर पार्टी मेम्बर बनाने के अभियान और इसके आधार पर दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी बनने के दावे के कारण बीजेपी की यूं भी काफी जग हंसाई हो रही है. ऐसे में यदि पार्टी के भीतर से असंतोष और आलोचना के और स्वर भी उभरें तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए. लोकसभा के बाद हुए चुनावों में भी पार्टी का प्रदर्शन निराशाजनक रहा है. अब बिहार में विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं. यदि उसमें भी बीजेपी को अपेक्षित सफलता न मिल पायी तो आलोचना के इन सुरों को बल मिलेगा.

ब्लॉग : कुलदीप कुमार

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