उग्रदक्षिणपंथ और इस्लामी कट्टरपंथ का पाट | दुनिया | DW | 31.10.2014
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दुनिया

उग्रदक्षिणपंथ और इस्लामी कट्टरपंथ का पाट

जर्मनी में सीरिया और इराक के गृहयुद्ध से प्रभावित लोगों के बीच झड़पें हुई है. इस पर उग्र दक्षिणपंथियों की प्रतिक्रिया हुई है. डॉयचे वेले के ग्रैहम लूकस का कहना है कि यह जर्मनी जैसे देशों के लिए यह परीक्षा की घड़ी है.

सीरिया और इराक का विवाद कुर्दों और इस्लामिक स्टेट के समर्थकों के बीच भिड़ंत के साथ अब जर्मनी आ पहुंचा है. यह दिखाता है कि विश्व के दूसरे हिस्सों के शरणार्थी, आप्रवासी गुट और इस्लामी कट्टरपंथी अपनी राजनीतिक विचारधारा इस देश में ला रहे हैं. जर्मनी में पले बढ़े कुछ आप्रवासियों की संतानों ने उन लोगों के विचारों को स्वीकार कर लिया है जिनके साथ मध्यपूर्व में उनकी सहानुभूति है. ऐसा लगता है कि आने वाले समय में यहां भी सड़कों पर लोग मारे जाएंगे. इसके अलावा इस बात का खतरा है कि सीरिया और इराक में इस्तामिक स्टेट के लिए हथियार उठाने वाले इस्लामी उग्रपंथी जब जर्मनी वापस लौटेंगे तो वे सामान्य जर्मनों के खिलाफ आतंकी अत्याचार करेंगे.

यह जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन और बेल्जियम जैसे देशों के लिए परीक्षा की घड़ी है, सब उदारवादी लोकतंत्र हैं जिन्होंने अपने यहां दुनिया के दूसरे हिस्सों से आए बहुत से लोगों को स्वीकार किया है. जर्मन अपने आप से आसान सा सवाल कर रहे हैं, लोकतंत्र और शांतिपूर्ण समझौते पर आधारित जर्मन समाज क्या अपने नागरिकों और संस्थानों पर आए इस तनाव को बर्दाश्त कर पाएगा? चिंतित होने की बड़ी वजह है. कुछ ही दिन पहले जर्मनी की घरेलू खुफिया एजेंसी के प्रमुख ने कहा है कि इस समय जर्मनी में कोई 6,000 सलाफी हैं और उनमें से कुछ सौ इस्लामिक स्टेट के साथ लड़ने के लिए सीरिया जा चुके हैं. उनका कहना है कि इस्लामी कट्टपंथियों की असली तादाद और ज्यादा हो सकती है.

इस विकास पर प्रतिक्रिया भी हुई है. उग्र दक्षिणपंथी नवनाजियों ने पिछले हफ्ते कोलोन में सलाफियों के खिलाफ प्रदर्शन किया. साफ है कि उग्र दक्षिणपंथियों को जर्मनी के बहुजातीय समाज के खिलाफ आवाज उठाने के लिए एक नया मुद्दा मिल गया है. और सलाफियों के खिलाफ मोर्चा खोल कर उग्र दक्षिणपंथ ने इस बात का सबूत दिया है कि उनके सपनों का जर्मन समाज सहिष्णु समाज नहीं है.

जर्मनी के पहले लोकतंत्र वाइमार रिपब्लिक को 1930 के दशक में नाजियों ने नष्ट कर दिया था. इस वजह से द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जर्मनी की संवैधानिक अदालत ने जर्मनी को उग्र लोकतंत्र बताया था, जिसे खुद की रक्षा करनी होगी. हालांकि लोकतंत्र के लिए मौजूदा खतरे की तुलना 1930 के दशक से नहीं की जा सकती है, लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि दोनों ही गुटों से आतंकवाद का खतरा है.

आखिर जर्मनी इस स्थिति आई कैसे? कई दशकों तक जर्मनी ने आप्रवासियों से समाज में पूरी तरह घुलने और लोकतांत्रिक मूल्यों को स्वीकार करने की मांग नहीं की. राजनीतिज्ञों के लिए इस्लामी घृणा प्रचारकों की करतूतों पर आंख मूंदना आसान था. सांस्कृतिक अंतर का बहाना बनाना आसान था. कोई आश्चर्य नहीं कि 2001 में अमेरिका पर आतंकी हमला करने वाले कुछ चरमपंथी हैम्बर्ग में रहते और पढ़ते थे और घृणा और नरसंहार की अपनी बीमार विचारधारा को परवान चढ़ा रहे थे.शायद इस विचारधारा पर इसलिए सवाल नहीं उठाए गए क्योंकि कोई असहिष्णु नस्लवादी या यहां तक कि नाजी नहीं कहलवाना चाहता था. हाल में शरिया पुलिस की वर्दी में एक जर्मन शहर में सलाफियों की गश्त खतरे की घंटी थी. धर्मनिरपेक्ष जर्मन राज्य के समांतर किसी कानून की इजाजात नहीं दी जा सकती.

उग्र दक्षिणपंथ और उसके पीछे काम करने वाली नस्लवादी विचारधारा को कम कर आंकना भी सुविधाजनक था. इसलिए आश्चर्य नहीं कि जर्मन सुरक्षाबलों को पता ही नहीं था कि नेशनल सोशलिस्ट अंडरग्राउंड नाम का एक आतंकी गुट पिछले दशक में कई आप्रवासियों और एक पुलिसकर्मी की मौत का जिम्मेदार था. वे अपराधियों की खोज आप्रवासियों के बीच ही कर रहे थे.

यह कहने की कोई जरूरत नहीं कि कोलोन में पिछले हफ्ते हुए दंगों के बाद अनुदारवादियों ने कानूनों को सख्त बनाने की मांग की है. इस रवैये में सामान्य निर्दोष नागरिकों की लोकतांत्रिक आजादी में कटौतियों का खतरा निहित है, जो जर्मनी के सहिष्णु समाज का हिस्सा हैं और जो चाहें वह धर्म मानने के लिए आजाद हैं.

लेकिन दूसरे राजनीतिज्ञों ने संयम से काम लिया है और कहा है कि कानून को बदलने की जरूरत नहीं है. वे सही हैं. लेकिन सुरक्षाबलों को दोनों चरमपंथी गुटों के खिलाफ मौजूदा कानूनों को सख्ती से लागू करना होगा. हमें इससे इंकार करना बंद करना होगा कि हिटलर की बचीखुची विचारधारा और इस्लामी कट्टरपंथ के आयात की जर्मनी में कोई समस्या नहीं है. जर्मनी के सहनशील समाज को अपनी रक्षा करनी होगी. उग्र लोकतंत्र का यही मतलब है.

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