ईवीएम के विवाद से कब मिलेगी निजात | भारत | DW | 15.04.2019
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भारत

ईवीएम के विवाद से कब मिलेगी निजात

इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों को लेकर विपक्ष की आशंकाएं गहराती जा रही हैं और इसीलिए तमाम विपक्षी दल एक बार फिर गोलबंद हो गए हैं. इस सिलसिले में एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने का फैसला किया गया है.

आखिर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों में ऐसा क्या है जिसे लेकर अभी तक विपक्षी नेता संतुष्ट नहीं हो पाए हैं और चुनाव आयोग की कोशिशों में ऐसी क्या और कहां कमी रह जाती है जो वो विश्वास बहाल नहीं कर पाता है? और आखिर ऐसी कौन सी तकनीकी और संसाधनीय कठिनाई है जिसके चलते आयोग 50 प्रतिशत वोटों की वीवीपैट मय गिनती पर असमर्थता जता रहा है? क्योंकि इस तरह के संदेह और सवाल, मतदान की समूची लोकतांत्रिक एक्सरसाइज और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली की शुचिता के लिए भी ठीक नहीं हैं. जानकारों का मानना है कि आयोग को ढुलमुल मानसिकता से उबरना ही होगा.

चुनावी आचार संहिता की भीषण अनदेखी के इधर जैसे मामले सामने आए हैं उनमें आयोग की लाचारी और दबावों को लेकर भी सवाल उठे हैं. इस बीच वीवीपैट मामले में भी वो अभी तक बचाव मुद्रा में ही नजर आया है. सही है कि चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है और पारदर्शी और निष्पक्ष चुनाव कराना उसकी बुनियादी जिम्मेदारी है लेकिन वीवीपैट और ईवीएम को लेकर अंदेशे तो आज या कल के तो हैं नहीं. 2014 के आम चुनावों में विभिन्न विपक्षी दल और नेता अनौपचारिक या आधिकारिक तौर पर धांधली और गड़बड़ी के आरोप लगाए थे. आज टीडीपी नेता चंद्रबाबू नायडू फिक्रमंद होकर कांग्रेस और वाम समेत तमाम विपक्षी दलों को एकजुट करने में लगे हैं और आयोग पर निशाना साध रहे हैं, लेकिन नायडू का इस बारे में होमवर्क तो बहुत देर से शुरू हुआ लगता है. यह राजनीतिक शिथिलता और लेटलतीफी विपक्षी दलों के लिए ही नहीं लोकतांत्रिक ढांचे के लिए भी असहनीय और खतरनाक मानी जाएगी. भले ही अब ये सभी दल देशव्यापी अभियान छेड़ने की बात कर रहे हैं लेकिन इन्हें क्या खुद से ये नहीं पूछना चाहिए कि प्यास लगने पर ही कुआं खोदने की प्रवृत्ति क्या उनके अस्तित्व और लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए नुकसानदेह नहीं हैं.

सुप्रीम कोर्ट मे बेशक पिछले दिनों इन राजनीतिक दलों ने मांग की थी कि प्रत्येक असेम्बली सेगमेंट में 50 फीसदी ईवीएम के वोट, वीवीपैट के साथ गिने जाएं लेकिन आयोग ने कोर्ट में अपनी असमर्थता जता दी कि टाइम नहीं है, ट्रेनिंग नहीं हुई है और नतीजे आने में बहुत देर हो जाएगी. इस पर सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि एक असेंबली सेगमेंट में एक ईवीएम की जगह पांच ईवीएम से वीवीपैट पर्चियों की गिनती की जाए. थोड़ा राहत तो दलों को मिली लेकिन जिस तरह के अंदेशे जताए जा रहे हैं उस स्थिति में तो ये संख्या कुछ भी नहीं.

विपक्षी दल चाहते हैं कि प्रत्येक विधानसभा सेगमेंट मे कमसे कम 50 प्रतिशत वीवीपैट पर्चियों की गिनती ईवीएम वोटों के साथ कराई जाए. उनका आरोप है कि आयोग तो सैंपलिंग की तरह वीवीपैट का इस्तेमाल कर रहा है यानी एक फीसदी से भी कम ईवीएम पर वीवीपैट मैचिंग की जा रही है. अभी तक आयोग देश के करीब 479 पोलिंग बूथों पर वीवीपैट पर्चियों से गिनती कराता रहा है. आयोग के नियमों के मुताबिक हर असेम्बली सेगमेंट में एक बूथ के लिए वीवीपैट मिलान की सिफारिश की गई है, ये संख्या करीब 4,125 ईवीएम की बैठती है. लेकिन सुप्रीम कोर्ट के पिछले आदेश के आधार पर देखें तो देश भर में करीब 20,625 ईवीएम पर वीवीपैट से गिनती होगी.

नायडू ने तो जर्मनी और नीदरलैंड्स जैसे देशों का हवाला भी दिया जहां उनके मुताबिक बैलट पेपर से चुनाव कराए जाते हैं. उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त से मिलकर पहले चरण के मतदान में ईवीएम की गड़बड़ी कि शिकायत भी की. उधर सत्तारूढ़ बीजेपी ने विपक्षी दलों की शिकायतों और संदेहों को उनकी हताशा बताते हुए आरोप लगाया कि ये दल पहले ही हार मान चुके हैं और बहाने गढ़ रहे हैं. इस बीच सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता और 2014 में रायबरेली से कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी के खिलाफ बीजेपी प्रत्याशी रह चुके अजय अग्रवाल का एक सनसनीखेज बयान मीडिया में आया है कि अगर साफ ढंग से चुनाव हुए तो बीजेपी 40 सीटों पर सिमट कर रह जाएगी.

ईवीएम और वीवीपैट को लेकर विवाद थमता नजर नहीं आता. दिलचस्प है कि नायडू के गृह राज्य आंध्रप्रदेश में ही 2011 में 12 सीटों के उपचुनाव में चुनाव आयोग ने ईवीए और बैलट पेपर की क्षमताओं का सफल परीक्षण किया था. इससे पहले 2010 में आयोग की सर्वदलीय बैठक में वीवीपैट को अंतिम हल के रूप में स्वीकार कर लेने की सिफारिश की गई थी. 2011 और 2012 में वीवीपैट का सफल ट्रायल देश के पांच शहरों में किया गया थाः तिरुअनंतपुरम, दिल्ली, लेह, जैसलमेर और चेरापुंजी. ये चयन भूगोल और जलवायु की विविधता के आधार पर भी किया गया था. 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को निर्देश दिया था कि 2019 में इस्तेमाल के लिए वो वीवीपैट मशीनों के लिए पर्याप्त धनराशि जारी करे. 2017 से तमाम विधानसभा चुनावों में ईवीएम से जुड़े वीवीपैट के जरिए चुनाव कराए जा रहे हैं लेकिन प्रत्येक विधानसभा सीट पर एक वीवीपैट से निकली पर्चियों को गिनने का नियम बनाया गया है.

पिछले दिनों अवकाश प्राप्त आईएएस अधिकारियों और पूर्व राजनयिकों के एक समूह ने भी चुनाव आयोग को चिट्ठी लिखकर वोटों के समुचित ऑडिट की मांग की थी. चिट्ठी में कहा गया था कि असल मुद्दा आज ईवीएम बनाम मतपत्रों का नहीं हैं बल्कि असावधान वीवीपैट ऑडिट वाली ईवीएम बनाम सचेत और समुचित वीवीपैट ऑडिट वाली ईवीएम का है.

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