ईरान डील से यूरोपीय कंपनियां खुश | दुनिया | DW | 27.11.2013
  1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages

दुनिया

ईरान डील से यूरोपीय कंपनियां खुश

ईरान के साथ परमाणु मुद्दे पर ऐतिहासिक समझौते के बाद यूरोपीय कंपनियां बेहद खुश हैं. उन्हें उम्मीद है कि ईरान में उनका कारोबार चल निकलेगा. मध्य पूर्व देश पर अंतरराष्ट्रीय पाबंदियां कम हो सकती हैं.

रविवार को जिनेवा में छह देशों और ईरान के बीच समझौता होने के बाद यूरोपीय कंपनियों को लग रहा है कि वहां काफी पैसा बन सकता है. जर्मनी के डीआईएचके चैंबर ऑफ इंडस्ट्री एंड कॉमर्स के विदेश व्यापार प्रमुख फोल्कर ट्रायर का कहना है, "फिलहाल ईरान के साथ तीन अरब यूरो का कारोबार हो रहा है. पाबंदियां ढीली होने के बाद हो सकता है कि हम दो या तीन साल में 10 अरब के निशान को पार कर जाएं."

बदलेगा कारोबार

अब तक ईरान के साथ कारोबार को बेहद नियंत्रित रखा गया था. जर्मन सरकार निर्यात पर बारीकी से नजर रखती थी, जबकि केंद्रीय बैंक पैसों के लेन देन पर निगाह रखता था. यूरोपीय संघ के बैंकों ने तो ईरान के साथ लेन देन लगभग बंद ही कर दिया था. ईरानी कंपनियों के लिए मौजूदा वक्त में किसी यूरोपीय कंपनी को पैसा ट्रांसफर करना लगभग नामुमकिन है. ट्रायर का कहना है, "हाल के सालों में ज्यादातर नकदी देकर कारोबार हुआ और यह एक निश्चित सीमा की राशि से ज्यादा के लिए नहीं हो सकता है."

पाबंदी लगाए जाने से पहले जर्मनी की कार कंपनियों, बिजली और इलेक्ट्रॉनिक की बड़ी कंपनी सीमेन्स, केमिकल कंपनी बीएएसएफ और दवा कंपनी बायर का ईरान में अच्छा खासा कारोबार था. लेकिन हाल के वर्षों में यह लगभग रुक गया है.

बहुत कुछ संभव

ईरान के परमाणु कार्यक्रम की वजह से उस पर जो प्रतिबंध लगे, वह जर्मनी की कंपनियों के लिए खतरे की घंटी साबित हुए. जर्मन-ईरानी चैंबर ऑफ कामर्स के मिषाएल टोकुस का कहना है, "पिछले कुछ दिनों से उन कंपनियों ने काफी दिलचस्पी दिखाई है, जो फिर से ईरान के साथ व्यापार करना चाहती हैं. और ऐसी कंपनियों ने भी, जो अपना कारोबार शुरू करना चाहती हैं. जर्मनी ईरान का सबसे बड़ा कारोबारी साझीदार था. और अब अगर कारोबार पर लगी पाबंदी हट जाएगी, तो यह एक बार फिर से सबसे बड़ा साझीदार बनेगा."

सिर्फ जर्मनी में ही कंपनियों को उम्मीद नहीं जगी है. फ्रांसीसी निर्माताओं को भी इससे काफी नुकसान पहुंचा है. साल 2011 में कार कंपनी जीट्रोएन ने ईरान में साढ़े चार लाख से कुछ ज्यादा कारें बेचीं. लेकिन जब फरवरी 2012 में ईरान पर ज्यादा पाबंदियां लगा दी गईं, तो उन्हें इस पर रोक लगानी पड़ी.

दूसरी कार कंपनी रेनां की बात की जाए, तो 2013 में उसकी बिक्री आधी हो गई है. कंपनी के एक प्रवक्ता ने बताया, "अगर पाबंदी हट जाए, तो हम अपना कारोबार एक बार फिर बढ़ा सकते हैं." अभी भी रेनां की कारों की एसेंबलिंग ईरान में हो रही है क्योंकि जब पाबंदियां सख्त की गईं, तो उसके कई कल पुर्जे ईरान में थे.

सलाह और चेतावनी

हालांकि फ्रांसीसी ईरानी रिश्तों के जानकार जेवियर हाउसेल का कहना है कि लोगों को बहुत ज्यादा उम्मीद नहीं रखनी चाहिए, "दस्ताने हट गए हैं. अमेरिका भी देख रहा और जर्मनी भी अपनी योजनाओं को टटोल रहा है." उनका कहना है कि इसके अलावा ईरान एशिया में भी अपने साझीदार खोज रहा है.

हालांकि जर्मनी को इस बात की उम्मीद है कि वे अपने हिस्से की प्रतिद्वंद्विता को संभाल लेंगे. ट्रायर कहते हैं, "हमारे निर्यात को देखा जाए, तो लगता है कि जैसे ईरान देश बना ही हमारे लिए है." ईरान के लोग पढ़े लिखे हैं, वहां तेल का बड़ा भंडार है और वहां का बुनियादी ढांचा भी अच्छा है. ट्रायर का कहना है, "सड़कों पर भले ही गाड़ियों की लाइन लगी रहती हो लेकिन यह तो कार इंडस्ट्री के लिए अच्छा ही है."

एजेए/एनआर (डीपीए)

DW.COM

विज्ञापन