इस्राएल में सुरक्षा से अहम हैं आर्थिक मुद्दे | दुनिया | DW | 17.03.2015
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दुनिया

इस्राएल में सुरक्षा से अहम हैं आर्थिक मुद्दे

इस्राएली इतिहासकार टॉम सेगेव का कहना है कि इस्राएल के संसदीय चुनावों में ईरान से खतरे या फलीस्तीन के साथ संबंधों से ज्यादा अहम आर्थिक मुद्दे हैं. लोग मकान के किरायों में इजाफे और महंगाई से परेशान हैं.

टोबियास आर्मब्रुस्टर: क्नेसेट के चुनाव दुनिया के सबसे दिलचस्पी लिए जाने वाले चुनावों में शामिल हैं, इसलिए भी कि इस्राएल के मतदाताओं के फैसले पर मध्यपूर्व के विकास का बहुत कुछ निर्भर करता है. और सचमुच चुनाव के अंतिम समय में प्रधानमंत्री बेंयामिन नेतन्याहू और उन्हें चुनौती दे रहे इत्साक हैर्त्सोग के बीच कांटे की टक्कर दिख रही है. क्या यह चुनाव ऐतिहासिक साबित हो सकता है?

टॉम सेगेव: मुझे लगता है कि जर्मनी के सेबिट मेले का ऐतिहासिक महत्व इस्राएल के चुनावों से ज्यादा है. लेकिन यह चुनाव इस मायने में ऐतिहासिक हो सकता है कि नेतन्याहू का शासनकाल खतम हो सकता है. इस समय ऐसा नहीं कहा जा सकता. जैसा कि आपने कहा, कांटे की टक्कर है. सर्वेक्षण दो दिन पुराने हैं. यह संभव है कि नेतन्याहू को विपक्ष से कम वोट मिलें, लेकिन फिर भी वे छोटी पार्टियों के साथ मिलकर सरकार बनाने की हालत में हों.

आपने कहा कि सेबिट चुनावों से ज्यादा अहम है. क्या मकान के किराये फलीस्तीनियों के साथ रिश्ते से ज्यादा अहम हैं?

हां. दरअसल चुनाव में दो ही मुद्दे हैं. पहला यह कि नेतन्याहू रहेंगे या नहीं? और दूसरा मकानों की कीमत? यह मुद्दा इस्राएलियों के लिए ईरान की धमकियों या फलसीस्तीनियों के साथ संबंध से ज्यादा अहम है. फलीस्तीनियों के साथ रिश्तों पर विपक्ष ने जो विकल्प पेश किया है वह साफ नहीं है. सवाल इस या उस समाधान का नहीं है. फलीस्तीनियों के साथ विवाद का निकट भविष्य में समाधान नहीं होने वाला है. सवाल सिर्फ यह है कि उसे कैसे मैनेज किया जाता है. दरअसल आर्थिक समस्याएं इस्राएलियों को परेशान कर रही हैं.

यह दिलचस्प है. जब नेतन्याहू ने दिसंबर में चुनाव कराने का फैसला लिया तो उन्होंने आसान जीत के बारे में सोचा था. फिर पिछले महीनों में ऐसा क्या हुआ कि नेतन्याहू पिछड़ गए हैं?

यह अहसास कि अब वे कुछ और करने की हालत में नहीं हैं, और बहुत सारी छोटी छोटी गलतियां, जिन्हें हर रोज भुला दिया जाता है, लेकिन जब पता चलता है कि उनकी पत्नी सरकारी पैसे से खरीदी गई बोतलें सुपर मार्केट में वापस करवाती हैं और उससे मिला पैसा खुद रख लेती हैं. मुझे यह कहते हुए भी अजीब लग रहा है. इस बीच उनकी पार्टी में भी ऐसे नेता हैं जो खुद को उनकी जगह लेने के लिए परिपक्व पा रहे हैं.

यदि इत्साक हैर्त्सोग और लेबर पार्टी की जीत होती है तो क्या इसका मतलब यह होगा कि इस्राएल की जनता अपने चुनावी बर्ताव में वामपंथ की ओर झुकी है?

नहीं, मैं यह नहीं समझता. इस्राएल की जनता कुल मिलाकर दक्षिणपंथी और राष्ट्रवादी है. इसीलिए इस बात की संभावना है कि नेतन्याहू को अंततः दक्षिणपंथी पार्टियों के साथ सरकार बनाने में कामयाबी मिल सकती है.

पिछले हफ्तों में नेतन्याहू ने खुलकर अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा का विरोध किया है. क्या उन्हें इसका नुकसान हुआ है?

हां, इसका उन्हें नुकसान जरूर हुआ है. इस्राएल में लोग कहते हैं, हमारे पास कोई और दूसरा देश नहीं है. अब वे यह भी कहने लगे हैं हमारे पास कोई दूसरा अमेरिका नहीं है. इसने लोगों को बहुत चिंतित किया है. इस्राएल पूरी तरह अमेरिका और उसके हर राष्ट्रपति पर आश्रित है और वहां संसद में राजनीति करना, मेरी राय में इसने उन्हें बहुत नुकसान पहुंचाया है. 24 घंटे के लिए ऐसा लगा कि उनका संसद में ऐसे स्वागत हुआ जैसे अमेरिकी राष्ट्रपति का होता है. 24 घंटे बाद आप पूछते हैं कि वे अमेरिका में कौन सी राजनीति कर रहे हैं, रिपब्लिकन के साथ. उनका इस्राएल में कहीं ऐसा स्वागत नहीं होता जैसा अमेरिकी कांग्रेस में हुआ.

इंटरव्यू: टोबियास आर्मब्रुस्टर

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