इन्होंने हर चुनाव में मतदान किया है | भारत | DW | 17.04.2019
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भारत

इन्होंने हर चुनाव में मतदान किया है

कर्नाटक में भी दो ऐसे बुजुर्ग मतदाता हैं, जिन्होंने आजादी के बाद से लेकर अब तक हर चुनाव में वोट डाला है. दोनों बीते बदलती चुनावी राजनीति के गवाह भी हैं.

Prof. G Venkatsubbaiah (DW/T. Sharma )

प्रोफेसर वेंकटसुब्बाया

106 वर्षीय वेंकटसुब्बाया और 107 वर्षीया थिमक्का एक बार फिर वोट देने जा रहे हैं. पद्मश्री से सम्मानित दोनों बुर्जुग कर्नाटक के उन 5,500 मतदाताओं में से है जिनकी उम्र 100 साल या उससे अधिक है.

वेंकटसुब्बाया लगभग 50 वर्षो की मेहनत के बाद 1,000 पन्नों वाले कन्नड़-अंग्रेजी शब्दकोष के निर्माण के लिए प्रसिद्ध हैं. वह 1951-52 और 2014 के बीच हुए सभी चुनावों में मतदान करने के बाद भी, इस वर्ष 18 अप्रैल को 17वीं लोकसभा के चुनाव में वोट डाल एक अलग इतिहास रचने की तैयारी में हैं.

उनके मुताबिक हर लोकसभा, विधान सभा और नगर निगम के चुनाव में अपने क्षेत्र से वोट डालने वाले वह पहले मतदाता होते हैं. यही रिकॉर्ड इस बार भी कायम रखने की चाहत है. और तो और मत डालने के बाद उनका एक ही प्रयास रहता है, अधिक से अधिक दोस्तों और नौजवानों को वोट डालने के लिए प्रोत्साहित करना.

इतने वर्ष मतदान करने के बाद भी वह अपना पहला 1951-52 में दिया गया वोट नहीं भूलते. उस समय उनकी उम्र 38 वर्ष की थी. वह स्वतंत्र भारत का पहला चुनाव था. जैसा कि वह कहते हैं, आज 18 साल के लड़के लड़कियां अपना वोट आराम से डाल सकते हैं. यह भारतीय लोकतंत्र की सबसे भारी जीत है. उनके मुताबिक यह भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी जीत है.

उन दिनों के प्रचार की बात करते हुए प्रो. वेंकटसुब्बाया का चेहरा खिल उठता है. वह आज कल के चुनाव प्रचार और शोर शराबे से अधिक प्रसन्न नहीं हैं. बीते दिनों को याद करते हुए कहते हैं कि उस जमाने में लोग घोड़ा गाड़ी या साइकिलों में घर घर जा कर चुनाव प्रचार करते थे और इतना ज्यादा शोर अथवा नाटक नहीं होता था.

आज कल तो लोग व्हाट्सऐप, मोबाइल और इंटरनेट पर भी प्रचार करते हैं और कई बार सच और झूठ का पता भी नहीं चलता. इसके अलावा आज जगह जगह रास्ते रोक कर सार्वजनिक रैलियां कर जनता को परेशान करने की परंपरा ने जोर पकड़ लिया है.

इन सबसे परे पुराने दिनों में प्रतियोगी कई बार एक ही मंच का इस्तेमाल करते थे. जहां एक उम्मीदवार का समय समाप्त होता वहीं दूसरी पार्टी का प्रत्याशी जल्दी से मंच पर चढ़ अपना भाषण शुरू कर देता था.

इसी विषय पर बोलते हुए थिमक्का, जो अपने जीवनकाल में 8,000 से ज्यादा पेड़ लगा चुकी हैं, कहती हैं कि 1970 के चुनावों तक, प्रत्याशी अधिकतर एक दूसरे को अपने तर्क से मात देने की कोशिश करते थे, न कि इल्जाम लगा कर. आज कल तो उम्मीदवार बिना डरे या अपमानित हुए एक दूसरे पर लांछन लगाने से नहीं कतराते.

उन दिनों अलग अलग पार्टियों के उम्मीदवार मान मर्यादा की सीमा का उलंघन कभी भी नहीं करते थे. कुछ प्रत्याशी तो विपक्ष के साथी पर व्यंग्यात्मक प्रहार कर के जीतने में माहिर थे. थिमक्का के अनुसार आज नेता, तर्क से नहीं बल्कि एक दूसरे पर सिर्फ कीचड़ उछाल कर जीतना चाहते हैं.

वेंकटसुब्बाया की ही तरह, थिमक्का भी अब तक के हुए हर चुनाव में मतदान कर चुकी हैं. पिछले वर्ष हुए विधान सभा चुनाव में तो वह मतदाता केंद्र से लगभग 200 किलोमीटर दूर थीं. यह सफर उनकी उम्र को देखते हुए काफी लंबा था, लेकिन उनकी जिद के आगे किसी की नहीं चली. जब तक उन्होंने अपना वोट नहीं डाला, तब तक उन्होंने किसी को भी चैन से नहीं बैठने दिया.

वोटरों को पैसों या उपहारों से लुभाने के विषय पर दोनों बुजुर्ग एक ही राय रखते हैं. उनके अनुसार इस कुप्रथा का आरम्भ कुछ चुनाव पहले ही हुआ, क्योंकि 1970 तक हुए चुनावों में काफी हद तक ऐसा कभी सुनने में नहीं आया था. वेंकटसुब्बाया स्वयं मानते हैं कि इसका एक मुख्य कारण पार्टियों की भरमार है और साथ साथ निर्दलीय उम्मीदवार भी काफी तादाद में देखे जा सकते हैं.

थिमक्का कहती हैं 1950 और 1960 के बीच जितने भी चुनाव हुए थे, उनमें पार्टियों की संख्या गिनी चुनी होती थी और निर्दलीय तो बहुत कम या न के बराबर होते थे.

इन सब के बीच दोनों निर्वाचन आयोग से अत्यंत प्रसन्न है, खास कर जब इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) का सवाल आता है. एक तरफ वेंकटसुब्बाया इसे वोटरों के लिए एक अत्यंत आवश्यकीय सहूलियत मानते हैं वहीं थिमक्का ईवीएम को वरदान से कम नहीं समझतीं.

यही कारण है की ईवीएम का विषय आते ही वह अपने पुराने दिनों की याद ताजा कर बैलेट पेपरों पर बात करने से नहीं कतराते. दोनों मानते है की समय के अनुसार ईवीएम और बैलेट पेपर का अपना स्थान रहा है.

निर्वाचन आयोग द्वारा जारी डाटा के मुताबिक कर्नाटक के 5.11 करोड़ मतदाताओं में से 1.90 लाख की उम्र 90 और 100 वर्ष से ऊपर है और इनमें प्रोफेसर वेंकटसुब्बाया और थिमक्का का नाम सब से ऊपर आता है.

यही नहीं, कर्नाटक की 28 लोकसभा सीटों में अकेले उत्तर बेंगलुरू में राज्य के सर्वाधिक मतदाता हैं जिनकी संख्या 28.48 लाख है इसके विपरीत चिकमगलूर चुनावी क्षेत्र में वोटरों की संख्या राज्य में सबसे कम, 15 लाख बताई जा रही है. निर्वाचन आयोग की मानें तो आम तौर पर देश की हर लोकसभा सीट पर मतदाताओं की औसत संख्या करीब 16 लाख है. 

गौर करने योग्य है कि सूचना तकनीक की राजधानी अकेले बेंगलुरू के चार चुनाव क्षेत्र दक्षिण बेंगलुरू, उत्तर बेंगलुरू, बेंगलुरू ग्रामीण और बेंगलुरू मध्य में 95 लाख मतदाता हैं, यानी कर्नाटक के लगभग 19 फीसदी मतदाता राजधानी में ही बसते हैं.

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