इतिहास ′चीन का सबसे महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक औजार′ है | दुनिया | DW | 06.01.2021
  1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages
विज्ञापन

दुनिया

इतिहास 'चीन का सबसे महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक औजार' है

चीन को हजारों साल पुराना राष्ट्र-राज्य माना जाता है लेकिन यह धारणा गलत है. बिल हेटन ने अपनी नई किताब में ये दावा किया है. चीन में राष्ट्र निर्माण प्रक्रिया के बारे में डीडब्ल्यू के रोडियॉन एबिगहाउजेन ने उनसे बात की.

अपनी नई किताब, 'द इन्वेंशन ऑफ चाइना' में पत्रकार बिल हेटन ने आधुनिक चीन की राष्ट्र-निर्माण प्रक्रिया का खांका खींचा है. उनका कहना है कि 19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी के शुरुआती दिनों में राष्ट्रवादी सोच रखने वाले बुद्धिजीवियों और कार्यकर्ताओं ने लोगों, भाषा, क्षेत्र और इतिहास की पश्चिमी अवधारणाओं का इस्तेमाल कर हजारों साल पुराने राष्ट्र-राज्य की तस्वीर बनाई है, जो वास्तव में कभी भी अस्तित्व में नहीं थी. डीडब्ल्यू के साथ एक साक्षात्कार में, हेटन ने चीन के राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया के बारे में बताया कि यह दूसरे देशों को कैसे प्रभावित कर रहा है और राष्ट्रवादी होते चीन से लोकतांत्रिक देशों को किस तरह निबटना चाहिए.

डीडब्ल्यू: चीन में राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया कब से कब तक चली

बिलहेटन: मैं कहूंगा कि यह एक सतत प्रक्रिया है. मिसाल के तौर पर, चीनी गृहयुद्ध (1945-49) में कम्युनिस्टों की जीत के बाद मार्क्सवाद सबसे महत्वपूर्ण कारक था. लेकिन इसने राष्ट्र को उन लोगों में बांट दिया जो इसके खिलाफ थे और जो क्रांति के लिए लड़े थे. 1989 में त्यानआनमेन चौक पर विरोध प्रदर्शन और नरसंहार के बाद वहां चीनी राष्ट्र को फिर से परिभाषित करने और गृहयुद्ध में हारे लोगों तथा ताइवान को राष्ट्र के अंदर वापस लाने के प्रयास हुए.

Bill Hayton, Autor & Asienexperte

बिल हेटन की किताब द इन्वेंशन ऑफ चाइना येल यूनिवर्सिटी प्रेस द्वारा प्रकाशित की गई है.

हाल में, राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने उन सब को एक ही चीनी राष्ट्र में शामिल करने की कोशिश में एक नया अध्याय जोड़ा, जिन्हें जातीय अल्पसंख्यक माना जाता है, जैसे तिब्बती, उइगुर और अन्य. और उसे भी फिर से परिभाषित किया गया है कि चीनी राष्ट्र क्या है. चीनी राष्ट्र का विचार काफी बदल गया है. मुख्य चीजों में से एक ये विचार है, और जाहिर तौर पर शी जिनपिंग इस समय इससे जूझ रहे हैं, कि क्या एक एकल चीनी राष्ट्र, एकल झोंगहुआ मिंजु है, या 56 विभिन्न राष्ट्र हैं, यानि देश के भीतर विभिन्न जातीय समूह, मिंजु शब्द का प्रयोग दोनों के लिए किया जाता है.

और शी अब इस विचार के लिए प्रतिबद्ध लगते हैं कि चीनी होने का एक ही तरीका होना चाहिए, चीनी राष्ट्र का हिस्सा होने का एक ही तरीका है, और उसे वह बहुत सख्ती से थोपने वाले हैं.

दुनिया भर में अधिकांश लोग चीन को सदियों पुरानी जड़ों वाले देश के रूप में देखते हैं. इस धारणा के बारे में आप क्या कहेंगे?

आप कह सकते हैं कि संस्कृति में निरंतरताएं हैं जो बहुत लंबे समय तक पीछे जाती हैं. ये तथ्य है कि आधुनिक विद्वान बहुत पुराने ग्रंथों को पढ़ सकते हैं, यह दिखाता है कि भाषा काफी पुरानी है, कम से कम लिखित रूप में. लेकिन यह कहना अलग होगा कि चीनी राष्ट्र बहुत प्राचीन है. एक राष्ट्र के चारों ओर एक प्रकार की सीमा होती है, जो तय करती है कि कौन अंदर है और कौन बाहर है. और चीन के मामले में वह सीमा पिछली सदी में ही परिभाषित हुई है और अभी भी फिर से परिभाषित की जा रही है.

वह मुख्य 'सांस्कृतिक क्षेत्र', जिसे चीनी राष्ट्रवादी 'मूल चीन' मानते हैं, पीली और यांग्त्से नदियों की घाटियां हैं, जो मौजूदा चीन का बहुत छोटा सा हिस्सा है.

पिछले 5,000 वर्षों की महत्वपूर्ण अवधियों में उस इलाके में जो आज चीन है, पूरी तरह से अलग अलग राज्य थे और अलग लोग रहा करते थे. जाहिर है, हम आम तौर पर तिब्बतियों और उइगुरों के बारे में सोचते हैं, लेकिन यहां तक ​​कि मंचु और युनान प्रांत के लोगों के पास अलग-अलग राज्य, बोलने के अलग-अलग तरीके, अलग-अलग संस्कृतियां थीं. यह विचार कि चीन नाम का एक अलग राज्य था, प्राचीन इतिहास का एक सामूहिक राष्ट्र, साक्ष्य द्वारा समर्थित नहीं है.

तो यह विचार कहां से आया

यह 19वीं शताब्दी के अंत और 20वीं शताब्दी की शुरुआत के आसपास एक्टिविस्टों और बुद्धिजीवियों द्वारा लिया गया बहुत ही सोचा समझा निर्णय था. उन्होंने यूरोपीय विचार उधार लेकर एक ऐसे राष्ट्र की व्याख्या की जो उस समय यूरोप में फैशनेबल था.

और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने अभी भी इन विचारों को क्यों अपना रखा है?

उनके लिए अतीत से निरंतरता दिखाना वास्तव में महत्वपूर्ण है क्योंकि यह वर्तमान स्थिति की आलोचना करने की संभावना को कम करता है. यदि आप लोगों को समझा सकें कि चीजें हमेशा से ऐसी ही रही हैं, तो उनके लिए यह सवाल करने का कोई कारण नहीं है कि उन्हें भविष्य में भी ऐसा ही क्यों नहीं रखना चाहिए.

बीजिंग तिब्बत और शिनजियांग में या हांगकांग और ताइवान जैसी जगहों पर अलगाववादी भावना को दबाने की प्रक्रिया में लगा हुआ है. और वह न केवल अपने लोगों और उन इलाकों के लोगों को, बल्कि यूरोप और संयुक्त राज्य अमेरिका के लोगों को भी समझाना चाहता है कि ये स्वाभाविक स्थिति है और चीनी राष्ट्र हजारों साल पुराना है.

इतिहास की ऐसी व्याख्या का निष्कर्ष यह है कि इसका विरोध करने का कोई मतलब नहीं है. यह एक ऐतिहासिक तथ्य है. और इतिहास का यह उपयोग संभवतः कम्युनिस्ट चीन की टूलकिट में सबसे महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक औजार है.

तो क्या आप यह कहना चाहेंगे कि चीन एक औपनिवेशिक सत्ता है, मसलन तिब्बत या शिनजियांग के मामले में?

वे स्पष्ट रूप से घरेलू तौर पर औपनिवेशिक सत्ता हैं, इस तरह से कि उन्होंने दूसरे ऐसे समाजों पर कब्जा कर लिया है जो सांस्कृतिक रूप से अलग हैं और उन्हें एक ही पहचान में 'ढालने' की कोशिश कर रहे हैं.

तिब्बत और शिनजियांग पर नियंत्रण को बनाए रखने के लिए बीजिंग जितना संसाधन और धन खर्च कर रहा है, वैसा हमने दुनिया में कहीं और नहीं देखा है. यह विचार कि आप एक लाख लोगों को फिर से शिक्षित करने की कोशिश कर रहे हैं, ऐसा कुछ हमने कभी किसी अन्य औपनिवेशिक स्थिति में नहीं देखा है.

चीन की राष्ट्र निर्माण प्रक्रिया पीपुल्स रिपब्लिक से संबंध रखने वाले अन्य देशों को कैसे प्रभावित करती है?

चीन ये चाहता है कि बहस खत्म हो, और चीन के साथ राजनयिक और व्यापारिक संबंध रखने की कीमत ये हो कि वे राष्ट्र और क्षेत्र की चीनी परिभाषा को स्वीकार करें. कंपनियों को इसलिए दंडित किया जाता है कि वे, उदाहरण के लिए, अपनी वेबसाइटों पर ताइवान का एक अलग स्थान के रूप में उल्लेख करते हैं. विश्वविद्यालयों को मुश्किल होती है यदि वे दलाई लामा को अपने परिसर में आने और बोलने की अनुमति देते हैं.

चीन अपनी आर्थिक ताकत का इस्तेमाल असल स्थिति के बारे में पूरी तरह से वैध चर्चा या बयान को दबाने के लिए करता है, जैसे कि ये तथ्य कि ताइवान का शासन दशकों से एक अलग राज्य के रूप में हो रहा है. और वे सिर्फ अपने देश में ही नहीं, बल्कि अन्य देशों में भी विकल्पों पर चर्चा को रोकने की कोशिश कर रहे हैं. हमने इसे ऑस्ट्रेलिया में देखा है जहां चीनी दूतावास ने अपनी 14 शिकायतों की सूची जारी की है. उनमें से यह भी शामिल था कि मीडिया और थिंक टैंक ऐसे विचार व्यक्त कर रहे हैं जो चीन सरकार को पसंद नहीं हैं.

लोकतांत्रिक देशों को तेजी से बढ़ते राष्ट्रवादी चीन से कैसे निबटना चाहिए

मुझे लगता है कि हमें अपने स्वयं के मूल्यों पर जोर देना होगा और अपनी मान्यताओं की रक्षा करनी होगी. हमें सवाल पूछने और अलग दृष्टिकोण के अधिकार पर भी जोर देना चाहिए. एक व्यापारिक सौदे के लिए हमारे विश्वविद्यालयों या समाचार पत्रों में चर्चा को बंद करने का कोई औचित्य नहीं है. और जाहिर है कि हमें सामूहिक रूप से काम करना होगा क्योंकि चीन अकेले देशों पर बहुत बड़ा दबाव डाल सकता है. तो छोटे और मध्यम आकार के देशों के लिए एकमात्र विकल्प एक साथ सहयोग करना है.

बिल हेटन पत्रकार, लेखक और ब्रिटिश थिंक टैंक चैथम हाउस के एक एसोसिएट फेलो हैं. उन्होंने एशिया के बारे में कई किताबें लिखीं हैं. उनकी नवीनतम रचना, द इन्वेंशन ऑफ चाइना, 2020 में येल यूनिवर्सिटी प्रेस द्वारा प्रकाशित की गई है.

बिल हेटन के साथ इंटरव्यू रोडियॉन एबिगहाउजेन ने किया.

__________________________

हमसे जुड़ें: Facebook | Twitter | YouTube | GooglePlay | AppStore

वीडियो देखें 07:06

दलाई लामा के बाद क्या करेगा तिब्बत

DW.COM

संबंधित सामग्री