इंडोनेशिया का मृत्युदंड न्याय का मजाक | दुनिया | DW | 29.04.2015
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दुनिया

इंडोनेशिया का मृत्युदंड न्याय का मजाक

ड्रग्स अपराध में इंडोनेशिया ने आठ कैदियों को मौत के घाट उतारा है. ड्रग्स मामलों से जु़ड़े करीब 50 अन्य दोषियों को भी जल्द मौत दी जा सकती है. डॉयचे वेले के ग्रैहम लूकस की टिप्पणी.

किसी भी और मामले से ज्यादा "बाली 9" केस दिखाता है कि क्यों दुनिया भर में मौत की सजा खत्म की जानी चाहिए. एमनेस्टी इंटरनेशनल के मुताबिक मौत की सजा जीवन के अधिकार की अवेहलना करने वाली "क्रूर, अमानवीय और पतनोन्मुखी सजा" है. सिर्फ मारने के तरीके पर ही सवाल नहीं हैं, बल्कि सजा से पहले मानसिक वेदना और पीड़ा भी है. जिन लोगों को बुधवार के शुरुआती घंटों में मौत दी गई वे सालों तक मानसिक वेदना से गुजरे. उनका मामला अदालतों में जाता रहा, यह किसी यातना से कम नहीं. उनके परिवार ने जो झेला और भविष्य में जो झेलेंगे वो बयान नहीं किया जा सकता.

यह भी एक सवाल है कि क्या सजा और अपराध फिट बैठते हैं. संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक मौत की सजा सिर्फ देशद्रोह या हत्या के लिए ही नहीं दी जा रही, बल्कि ड्रग्स की तस्करी जैसे गैरसंगीन अपराधों के लिए भी दी जा रही है. यह इतना गंभीर मामला नहीं जिसके लिए मौत की सजा को अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत लाया जाए.

राजनीतिक है मृत्युदंड

सजा का मकसद इसका असर देखना है. दो ऑस्ट्रेलियाई, एंड्र्यू चैन और म्यूरन सुकुमारन को ही लीजिए, दोनों 10 साल पहले इंडोनेशिया से ड्रग्स ऑस्ट्रेलिया पहुंचाने के दोषी साबित हुए. उन्होंने अपराध स्वीकार किया, प्रायश्चित किया और माफी मांगी. उन्होंने नशा मुक्ति केंद्र में जाने की मांग भी की, जिसे राष्ट्रपति जोको विडोडो ने दया याचिका ठुकराते हुए नजरअंदाज कर दिया.

यह दिखाता है कि ड्रग्स अपराधों में मृत्युदंड को अमल में लाना राजनीतिक है. यह पुर्नवास नहीं है. विडोडो इंडोनेशिया में ड्रग्स संकट के बारे में बोल चुके हैं. लेकिन वह इस बात को नजरअंदाज करते जा रहे हैं कि मौत की सजा कोई निवारण नहीं है. क्या मौत की सजा लागू करने के बाद से इंडोनेशिया में ड्रग्स की तस्करी बंद हो गई है? नहीं, ऐसा नहीं हुआ है. तथ्य तो यह है कि यह बढ़ी है. असली समस्या व्यापक गरीबी है. इस पर ध्यान देने की जरूरत है और यह मामला लोगों को गोली मारने से ज्यादा चुनौतीपूर्ण है.

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डॉयचे वेले के दक्षिण पूर्व एशिया विभाग के प्रमुख ग्रैहम लूकस

विडोडो ने मौत की सजा के इन मामलों और आगे भी ऐसी कार्रवाई करने के रुख को राष्ट्रीय भावना से खेलेने के लिए इस्तेमाल किया है. सुहार्तो के तानाशाही धब्बे से बाहर निकलने वाले वह पहले राष्ट्रपति हैं. उनके सामने देश के मानवाधिकार रिकॉर्ड को बेहतर करने का मौका था. वह मौत की सजा को पांच साल के लिए टालकर या पूरी तरह खत्म कर ऐसा कर सकते थे.

वकील का खुलासा

खुद को एक मजबूत शख्सियत के तौर पर पेश करने के लिए उन्हें न्यायिक प्रक्रिया में निष्पक्ष होने की भी जरूरत थी. मौत की सजा के खिलाफ एक सबसे बड़ा तर्क यह है कि न्यायिक तंत्र खामियों से भरा है. कुछ दिन पहले बचाव पक्ष के एक वकील ने खुलासा किया कि "बाली 9" मामले में पर्दे के पीछे क्या हुआ. उन्होंने आरोप लगाया कि जजों ने मौत की सजा को 20 साल की कैद में बदलने के लिए 1,30,000 डॉलर मांगे. शायद यह इंडोनेशिया में एक विदेशी की जान की कीमत है. बाद में अधिकारियों ने मामले में दखल दिया और अदालत की कार्रवाई से इतर मौत की सजा देने की मांग की. यह सब इंडोनेशिया के न्यायतंत्र का मजाक उड़ाते हैं. एक बार फिर पता चल रहा है कि सजा ए मौत अमीर के बजाए गरीब और इंडोनेशियाई नागरिक के बदले विदेशी पर इस्तेमाल की जा रही है. विडोडो की विश्वसनीयता भी गिरी है क्योंकि उन्होंने अपने नागरिक को सऊदी अरब में मौत की सजा से बचाने की कोशिश की. जाहिर तौर पर वह अपने लोकप्रिय राजनीतिक मकसदों के लिए मौत की सजा का समर्थन करते हैं. चुनावों के बाद वह नैतिक ऊंचाई पर थे. लेकिन अब उसे वह खो चुके हैं.

विरोध की लहर

इंडोनेशिया में जो कुछ हुआ, उसके नतीजे कई साल तक दिखाई पड़ेंगे. विडोडो ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी और अपने देश की छवि खराब की है. इसका असर इंडोनेशिया के अंतरराष्ट्रीय साझेदारों, खास तौर पर ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील, नीदरलैंड्स, फ्रांस और नाइजीरिया के साथ संबंधों पर पड़ेगा. मौत की सजा पाने वाले इन्हीं देशों से आते हैं. कुछ राजदूत वापस लौट चुके हैं और कई आने वाले दिनों में ऐसा करेंगे.

जिन लोगों को बुधवार को मौत के घाट उतारा गया, उनके परिवार का दुख किसी भी तरह कम नहीं किया जा सकता है. पर हम सब इस मामले में एक छोटा लेकिन आशा भरा संकेत देख सकते हैं. ड्रग्स अपराधों में मृत्युदंड को लेकर जोको विडोडो के जुनून के खिलाफ विरोध की लहर दिखाई पड़ रही है. अरब वसंत और ईरान की क्रांति की तरह सोशल मीडिया में #IstandForMercy (मैं माफी के साथ हूं) और #Bali9 जैसे अभियान चल रहे हैं. ये अभियान मौत की सजा की निंदा और मृत्युदंड को खत्म करने की आवाज बुलंद कर रहे हैं. यह उम्मीद की जा सकती है कि बुधवार को मृत्युदंड पाने वाले लोगों का मामला दुनिया भर में मौत की सजा के खिलाफ छिड़े अभियान का अहम मोड़ साबित होगा.

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