′इंडिया और भारत का फर्क दिखा रहा हूं′ | लाइफस्टाइल | DW | 24.07.2012
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लाइफस्टाइल

'इंडिया और भारत का फर्क दिखा रहा हूं'

मंगेश हडावले की फिल्म 'देख इंडियन सर्कस' को श्टुटगार्ट फिल्म फेस्टिवल में मुख्य फिल्म के तौर पर दिखाया गया. विदेशों में तारीफ बटोर चुकी फिल्म अगले महीने भारत में रिलीज होगी.

आप अपनी नई फिल्म 'देख इंडियन सर्कस' के साथ फेस्टिवल में आए हैं. अपनी फिल्म के बारे में कुछ बताइए.

'देख इंडियन सर्कस' एक ऐसी फिल्म है जो इंडिया और भारत के फर्क को दर्शाती है. जब मैं शहरों को देखता हूं, तो मैं इंडिया को महसूस करता हूं और जब मैं छोटे छोटे गांव में जाता हूं तो मुझे लगता है कि वह भारत है. वहां आप कई मल्टीनेशनल कंपनियों द्वारा बनाई गई चीजें देखेंगे, लेकिन मूलभूत सुविधाओं की वहां कमी है, जैसे शिक्षा या स्वास्थ्य को ले कर. यही दिखाने के लिए सर्कस शब्द का इस्तेमाल किया गया है. कहानी एक छोटे से परिवार की है जिसके लिए सर्कस देखना यूरोप का टूर करने जैसा है. उनके घर से चालीस मील दूर एक सर्कस आया है. उसे देखने के लिए उनकी जिंदगी में क्या क्या सर्कस होता है, यह फिल्म में दिखाया गया है. जो एक आम आदमी रोजमर्रा की जिंदगी जीने के लिए संघर्ष करता है, वह एक सर्कस है, या दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत की संसद में जो होता है, वह सर्कस है. 'देख इंडियन सर्कस' में यही सब बेहद हास्यप्रद और रोमांचक तरीके से दिखाया गया है.

आम आदमी की जिंदगी पर या भ्रष्टाचार पर और भी कई फिल्में बनी हैं. आपकी फिल्म में क्या अलग है?

मेरी फिल्म में कहीं भी मैंने दर्शकों को यह नहीं बताया कि देखो क्या हो रहा है. मैं दर्शकों को ज्ञान बांटने की कोशिश नहीं कर रहा हूं. बुसान में जब फिल्म को अवॉर्ड मिला तो 'हॉलीवुड रिपोर्टर' में एक बहुत अच्छा लेख छपा था कि हमेशा जब गरीबी दिखाई जाती है तो बहुत रोना धोना दिखाया जाता है. 'देख इंडियन सर्कस' की सबसे खूबसूरत बात यह है कि गरीबी को कहीं भी बेचा नहीं गया है. मुझे लगता है कि जो मजा एक बच्चे को स्विमिंग पूल में स्विमिंग करने से मिलता होगा, वही तालाब में या नदी में भी मिलता होगा. दुनियावी चीजों से ज्यादा अंदर से खुशी पाना जरूरी है, चाहे आपकी आर्थिक स्थिति कुछ भी हो. फिल्म में जो परिवार दिखाया गया है वह एक सुखी परिवार है. आप फिल्म देखते समय बहुत हंसते हैं और उसके साथ साथ हालात को समझते हैं. यही इस फिल्म की अलग बात है.

पश्चिम में भारत की जो छवि है, क्या आपको लगता है कि फिल्मों में गरीबी दिखाना एक हिट फॉर्मूला बन गया है?

यह हिट फॉर्मूला है या नहीं, यह तो मुझे नहीं पता. लेकिन ऐसा होता है कि जिस इंसान को दो वक्त का खाना मिलता है, जिसे जीने के लिए दिक्कतों का सामना नहीं करना पड़ता, जब ऐसा इंसान हद से ज्यादा गरीबी देखता है, तो कहीं ना कहीं उसे एक अलग तरह का मनोवैज्ञानिक एहसास होता है. उसे यह संतुष्टि मिलती है कि मैं कितना सुखी हूं, मेरे साथ ये सब नहीं हो रहा है जो मैंने देखा, मैं बहुत अच्छी जिंदगी जी रहा हूं. दूसरी बात यह कि जब आप किसी के साथ सहानुभूति जताते हो तो मन ही मन आपको अच्छा लगता है.

कुछ महीने पहले मैं लॉस एंजेल्स में था. वहां किसी ने फिल्म देखने के बाद कहा कि आपने तो फिल्म में सरासर झूठ दिखाया है. मैंने पूछा कैसा झूठ, तो उसने कहा कि आपके किरदारों ने जो कपड़े पहने हैं, वे फटे हुए नहीं हैं, वे लोग दो वक्त अच्छा खाना खा रहे हैं, और बारिश आती है तो उनके घर में पानी नहीं टपकता. उसने पूछा कि सब कुछ इतना ठीक ठाक कैसे हो सकता है. तो मैंने उन्हें बताया कि ऐसे परिवार भी हैं. गरीब का मतलब यह नहीं है कि लोग नंगे घूमते हैं या उनके पास खाने को कुछ नहीं है. पश्चिम में भारत को ले कर यह छवि है कि लोग हद से ज्यादा गरीब हैं. मुझे लगता है कि सच्चाई ऐसी है ही नहीं.

1991 में भारत की अर्थव्यवस्था में बदलाव आया, बाजार विदेशों के लिए खोले गए. तब से ऐसा होने लगा है कि आप छोटे से छोटे गांव की झोपड़ी में भी अगर जाएंगे, तो आपको ब्रैंडेड शैम्पू के पाउच नजर आएंगे. छोटे से छोटे घर में आपको मोबाइल के पांच छह अलग अलग हैंडसेट नजर आएंगे. यहां तक कि पहले जब घर में मेहमान आते थे तो बुजुर्ग लोग पूछा करते थे कि चाय या छाछ लोगे. अब वे पूछते हैं ठंडा लोगे. यह ठंडा कभी हमारी जरूरत ही नहीं था. हर कोई गरीबों को निशाना बना कर उन्हें चीजें बेचना चाहता है. इस से गरीब और गरीब होते जा रहे हैं और रईस और रईस. इन दो वर्गों के बीच में जो लोग हैं उन पर मैंने इस फिल्म में प्रकाश डाला है.

अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल में इस फिल्म को कई अवॉर्ड मिल चुके हैं, इसे काफी सराहा गया है. भारत में जब यह रिलीज होगी तब आप दर्शकों से कैसी प्रतिक्रिया की उम्मीद कर रहे हैं?

मुझे लगता है कि भारत में लोग फिल्म को बहुत पसंद करेंगे. बुसान कोरिया का बहुत बड़ा फिल्म फेस्टिवल है. वहां फिल्म को बेस्ट ऑडिएन्स च्वाइस अवॉर्ड मिला. लगभग सभी शो हाउस फुल गए. हमें ही टिकट नहीं मिलती थी. जब ज्यूरी फिल्म को अवॉर्ड देती है तो वह चार पांच लोगों का दृष्टिकोण होता है. लेकिन ऑडिएन्स च्वाइस अवॉर्ड में दर्शक यह निर्णय लेते हैं कि फिल्म अच्छी है या बुरी. फिल्म में वही चीजें हैं जो हम रोजमर्रा की जिंदगी में देखते हैं. मैंने कुछ हट कर दिखाने की कोशिश नहीं की है. मैं कहता हूं कि मेरी मां को जो फिल्म समझ आती है, उसे दुनिया का कोई भी दर्शक समझ सकता है. जब मेरी मां ने यह फिल्म देखी तो वह बहुत हंसी, बहुत रोई. मुझे लगता है कि भारतीय दर्शकों की जो जरूरतें हैं, वे सब इस फिल्म में है, मनोरंजन, संगीत, कहानी. इसलिए यह हिट होगी.

इंटरव्यू: ईशा भाटिया, श्टुटगार्ट

संपादन: महेश झा

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