इंटरनेट से चमकती नेतागिरी | दुनिया | DW | 31.01.2010
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दुनिया

इंटरनेट से चमकती नेतागिरी

एलके आडवाणी हों, नरेंद्र मोदी, अमर सिंह या फिर शशि थरूर. ज्यादा से ज़्यादा राजनेता अपनी छवि को चमकाने और अपनी बात लोगों तक पहुंचाने के लिए इंटरनेट का सहारा ले रहे हैं और ख़ासकर युवाओं को लुभा रहे हैं.

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इंटरनेट इस्तेमाल करने वाले राजनेताओं में सबसे ज़्यादा नाम विदेश राज्य मंत्री शशि थरूर का आता है, जो ख़ासे विवादों में भी रहे हैं. सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट ट्विटर पर सरकार की नीतियों की आलोचना करने पर उन्हें अपने बॉस से झाड़ भी पड़ी. लेकिन ट्वीट करने का उनका ज़ज्बा कम नहीं हुआ.

Veteran L K Advani in Indien

चुनावों के दौरान आडवाणी ने लिया इंटरनेट का ख़ूब सहारा

ख़ैर, भारत में वेबसाइट तैयार करने वाली एक कंपनी के मुखिया पुष्कर श्रीवास्तव राजनेताओं में इंटरनेट के बढ़ते चलन पर कहते हैं, "दरअसल भारत की 50 प्रतिशत आबादी युवा है जो टेक्नॉलजी इस्तेमाल करते हैं. इसलिए राजनेता भी उन्हें लुभाने के लिए इंटरनेट को सबसे अच्छा माध्यम मान रहे हैं." 24 साल के सैफ़ इक़बाल नियमित रूप से इंटरनेट इस्तेमाल करते हैं. वह कहते हैं कि राजनेता युवा और छात्रों को अपनी तरफ़ खींचने के लिए इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं.

इंटरनेट का ज़्यादा से ज़्यादा इस्तेमाल करने वालों में नेताओं की युवा ब्रिगेड ही शामिल नहीं है. बल्कि उम्र दराज और अनुभवी नेता भी इसकी अहमियत समझ रहे है क्योंकि इससे उन युवा वोटरों तक भी पहुंचा जा सकता है जिनके बारे में कहते हैं कि उनकी राजनीति में कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं है. दिल्ली के

Shashi Tharoor ist Kandidat für das Amt des UN-Generalsekretärs

ट्विटर पर ख़ूब सक्रिय हैं थरूर

भारतीय जनसंचार संस्थान के प्रोफ़ेसर आनंद प्रधान कहते हैं, "पढा लिखा मध्यम वर्ग आगे बढ़ रहा है. वह जनमत को भी प्रभावित कर रहा है, ऐसे में उस तक पहुंचने के लिए रैलियां और बैठकें जैसे पारपंरिक तरीक़े अब कारगर नहीं रहे. लेकिन इंटरनेट साइटों पर नेताओं को नौजवान लोगों के सवालों के जवाब देने पड़ते हैं, तो यह असरदार है.

हालांकि कोलकाता के प्रेज़ीडेंसी कॉलेज में एमए कर रहे देबोज्योति बिश्बास इस बात से सहमत नहीं हैं. वह कहते हैं कि इंटरनेट के मुक़ाबले लोगों तक पहुंचने के पारंपरिक तरीक़े कहीं ज़्यादा प्रमाणिक हैं. इंटरनेट पर राजनेता चुन सकते हैं कि उन्हें किस सवाल का जवाब देना है, किसका नहीं. उनके मुताबिक़, "वह अनदेखी कर सकते हैं. लेकिन अगर कोई आमने सामने हो, तो ऐसा कम ही होगा कि सवाल का जवाब न मिले."

मीडिया एक्सपर्ट प्रधान मानते हैं कि पारपंरिक रूप से राजनेताओं तक आम लोगों की पहुंच वैसे भी कम ही रही है. ऐसे में ब्लॉगिंग, ट्विटर, फ़ेसबुक के अलावा खासतौर से बनाई गई वेबसाइटों का चलन अच्छी शुरुआत है. इसके ज़रिए युवा लोग राजनीति का हिस्सा बन रहे हैं और लोकतंत्र को मज़बूती मिल रही है.

रिपोर्टः देबारती मुखर्जी

संपादनः ए कुमार

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