आलोचना के लिए बढ़ रही असहिष्णुता | ब्लॉग | DW | 29.05.2015
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ब्लॉग

आलोचना के लिए बढ़ रही असहिष्णुता

आलोचना के लिए आईआईटी मद्रास में छात्र संगठन की मान्यता रद्द करने का मामला हो या दिल्ली के मुख्यमंत्री का नकारात्मक रिपोर्टों पर मानहानि का मुकदमा करने फरमान, भारत में आलोचना बर्दाश्त करने की ताकत घट रही है.

प्रख्यात अंग्रेजी उपन्यासकार और सामाजिक कार्यकर्ता अरुंधति रॉय ने नरेंद्र मोदी सरकार के बारे में तीखी टिप्पणी करते हुए कहा है कि यह लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गई सर्वसत्तावादी सरकार है. यदि इसे अतिरेकपूर्ण टिप्पणी माना जाए तो भी इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि इसमें सत्यांश अवश्य है क्योंकि सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी, उसकी हिंदुत्ववादी विचारधारा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की किसी भी प्रकार की आलोचना को सहन न करने का माहौल बनाया जा रहा है. पिछले दिनों सोशल मीडिया और मुख्यधारा की मीडिया—दोनों पर यह प्रवृत्ति देखी गई है कि नरेंद्र मोदी की आलोचना को 2014 के लोकसभा चुनाव में मिले जनादेश के अपमान के तौर पर पेश किया जा रहा है. इस बात को पूरी तरह से भुला दिया गया है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का बीजेपी के नेता कितना मखौल उड़ाया करते थे और उन्हें किस-किस तरह के विशेषणों से विभूषित किया करते थे. हिंदुत्ववादी विचारधारा बहुत सहिष्णु नहीं है, यह अब तक स्पष्ट हो चुका है. लेकिन जहां तक सरकार और उसके तहत काम करने वाले विभागों और संस्थाओं का सवाल है, उनसे यह उम्मीद की जाती है कि वे सभी के साथ निष्पक्षता का बर्ताव करेंगी और संविधान में प्रदत्त अभिव्यक्ति की आजादी को सुनिश्चित करेंगी. लेकिन ऐसा होता दीख नहीं रहा.

ताजातरीन उदाहरण आईआईटी-मद्रास का है जिसके निदेशक शिवकुमार एम. श्रीनिवासन ने छात्रों के एक संगठन अंबेडकर पेरियार स्टडी सर्किल की मान्यता रद्द कर दी है. यह कदम उन्होंने छात्रों का पक्ष सुने बिना एकतरफा ढंग से उठाया है क्योंकि उन्हें केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय के एक जूनियर अफसर की ओर से एक पत्र मिला था जिसमें कहा गया था कि मंत्रालय को एक गुमनाम पत्र प्राप्त हुआ है जिसमें आरोप लगाया गया है कि यह स्टडी सर्किल मंत्रालय और केंद्र सरकार की नीतियों के खिलाफ छात्रों को उकसा रहा है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एवं हिंदुओं के खिलाफ नफरत फैला रहा है. मंत्रालय के पत्र में निदेशक से इस बारे में अपनी राय बताने को कहा गया था. श्रीनिवासन ने अपनी राय स्टडी सर्किल की मान्यता रद्द करके बता दी, बिना इस बात की तहकीकात किए कि क्या यह संगठन वाकई प्रधानमंत्री और हिंदुओं के खिलाफ नफरत फैला रहा है. यहां गौरतलब बात यह भी है कि मंत्रालय को इस बात पर भी आपत्ति है कि छात्रों की कोई संस्था या संगठन मंत्रालय या केंद्र सरकार की नीतियों का विरोध करे.

क्या यह लोकतन्त्र है? शायद नहीं. लेकिन इसके साथ ही यह भी सही है कि इस लोकतंत्र विरोधी प्रवृत्ति के लिए अकेले बीजेपी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, भले ही यह भी हकीकत हो कि उसके सत्ता में आने के बाद यह प्रवृत्ति और अधिक मजबूत हुई है. सच्चाई यह है कि कांग्रेस की सरकार हो या फिर अभी नई-नई सत्ता में आई अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी की सरकार, सभी विरोध के प्रति असहिष्णु हैं. कांग्रेस ने तो इस मामले में बेहद ढुलमुल रवैया अपनाया है और अनेक अवसरों पर उसकी कारगुजारियों और हिंदुत्ववादी या कट्टर इस्लामपंथी तत्वों की कारगुजारियों में कोई फर्क नजर नहीं आता. मुंबई में शिवसेना सुप्रीमो बाल ठाकरे के निधन पर जबरन मुंबई बंद कराए जाने पर एक मुस्लिम लड़की ने फेसबुक पर एक आलोचनात्मक पोस्ट लिख दी थी जिसे उसकी एक मित्र ने लाइक कर दिया था. मुंबई पुलिस ने अभूतपूर्व तत्परता दिखाते हुए इन दोनों लड़कियों को गिरफ्तार कर लिया. उस समय महाराष्ट्र में बीजेपी-शिवसेना की नहीं, कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की सरकार थी. इसी तरह जब हिंदुत्ववादियों को तुष्ट करने के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम से रामानुजन का रामायण पर निबंध हटाया गया, तब केंद्र और दिल्ली दोनों में कांग्रेस की सरकार थी.

आम आदमी पार्टी सुप्रीमो और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल खुद तो बिना प्रमाण हर किसी पर आरोप लगाते रहते हैं, लेकिन उन्होंने अपनी सरकार के मंत्रियों और अधिकारियों को एक सर्कुलर जारी करके कहा कि मीडिया में आने वाली नकारात्मक रिपोर्टों पर वे मानहानि के मुकदमें दायर करें. ‘रामचरितमानस' में तुलसीदास ने लिखा है: ‘प्रभुता पाई काहू मद नाहीं'. भारतीय लोकतन्त्र में सत्ता का यही चरित्र है कि यहां हर सत्ताधारी को आलोचना कतई सहन नहीं. लोकतन्त्र के लिए यह अच्छे दिनों की आहट नहीं है.

ब्लॉग: कुलदीप कुमार

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