आरोप साबित होने तक अदालत की निगाह में हर कोई बेकसूर | ब्लॉग | DW | 24.02.2021
  1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages
विज्ञापन

ब्लॉग

आरोप साबित होने तक अदालत की निगाह में हर कोई बेकसूर

अपराध का शक कितना ही मजबूत क्यों न हो, वह सबूत की जगह नहीं ले सकता. ऐसा कहना है सुप्रीम कोर्ट का. उसके मुताबिक, आरोप साबित होने तक कोर्ट की निगाह में हर कोई बेकसूर है, यह कानूनी और अदालती मान्यता अक्षुण्ण  है.

पिछले दिनों ओडीशा हाईकोर्ट ने हत्या के एक कथित मामले में दोषियों को रिहा करने के फैसले को बहाल रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह महत्त्वपूर्ण फैसला दिया है. सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस इंदिरा बैनर्जी और जस्टिस हेमंत गुप्ता की बेंच ने कहा कि अगर तमाम संभावनाएं भी यही कहती हों कि अपराध, आरोपी ने ही किया है तो भी इसके लिए सबूतों की एक ठोस और मुकम्मल कड़ी का होना जरूरी है. ओडीशा हाईकोर्ट ने हत्या के दो अभियुक्तों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया था. कोर्ट के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी. हत्या के अभियुक्तों पर आरोप था कि उन्होंने बिजली के झटके देकर एक होमगार्ड की जान ले ली थी. बेंच ने हाईकोर्ट के फैसले को बहाल रखते हुए कहा कि शक के आधार पर किसी को सजा नहीं दी जा सकती है और अभियुक्त तब तक बेगुनाह है जब तक कि उसका दोष पुख्ता रूप से और हर हाल में बिला शक साबित न हो जाए.

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक अपने फैसले में कोर्ट ने एक महत्त्वपूर्ण बिंदु की ओर भी ध्यान दिलाया कि "किसी अभियुक्त के खिलाफ परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर पूरी तरह से मामला बनता है, यह कहने से पहले उन परिस्थितियों को भी पूरी तरह से स्थापित करना होगा जिनके आधार पर आपराधिक कृत्य होने का नतीजा निकाला गया है. और उन आधारों पर स्थापित तथ्यों का अभियुक्त के आपराधिक कृत्य की हाइपोथेसिस से ही पूरा मेल होना चाहिए." इस तरह कोर्ट ने साक्ष्यों की एक निर्बाध और मजबूत कड़ी की जरूरत भी बताई. कोर्ट ने इस बात की संभावना जताई कि हो सकता है कि मृतक ने गहरी नींद में दुर्घटनावश नंगा तार छू लिया हो.

जेलों में बंद दलितों और मुसलमानों की संख्या सबसे अधिक

कोर्ट की ओर से यह निर्णय ऐसे समय में आया है जब देश की जेलों में बड़े पैमाने पर विचाराधीन कैदी बंद हैं और वे लंबे समय से अदालतों से अपने मामले निपटने की बाट जोह रहे हैं. पिछले दिनों इस बारे में रिपोर्टे भी आई थी कि जेलों में बंद दलितों और मुसलमानों की संख्या सबसे अधिक है और अदालतों में बेशुमार मामले सुनवाई के लिए लंबित है, जिन्हें लेकर सुप्रीम कोर्ट भी चिंता जताता रहा है. मानवाधिकार और  पर्यावरण कार्यकर्ता,  छात्र, किसान, कॉमेडियन, कलाकार, अधिवक्ता, लेखक आदि राजद्रोह से लेकर शांति भंग करने तक के विभिन्न किस्म के आरोपों में विचाराधीन कैदियों की तरह जेल में बंद हैं या रहे हैं. बहुत से मामलों में उन पर आरोप सिद्ध नहीं हो पाए हैं. जानकारों के मुताबिक हो सकता है कि कोर्ट की ताजा रूलिंग अदालती लड़ाई में उनके काम आ पाए.

इंडियन एविडेंस ऐक्ट 1872 के तहत, प्रूफ बियॉन्ड रिजनेबल डाउट यानी पर्याप्त और तार्किक संदेह से आगे के साक्ष्य को विशेषज्ञों ने आपराधिक मामलों की सुनवाई और निर्णयों में एक महत्त्वपूर्ण पहलू की तरह रेखांकित किया है. समय समय पर अदालतों, खासकर सुप्रीम कोर्ट ने अपने विभिन्न फैसलों में इस पर टिप्पणियां भी की हैं और इसकी रोशनी में फैसले भी सुनाए हैं. इसीलिए अक्सर यह भी देखा जाता है कि जब हत्या या किसी संगीन अपराध का दोषी व्यक्ति अदालत से बरी होता है, तो आम लोग फैसले पर हैरान या आक्रोशित हो जाते हैं और जानकारों का मानना है कि यह स्वाभाविक भी है. ठीक उसी तरह जब पुलिस किसी आंदोलनकारी नागरिक, लेखक, कलाकार, पर्यावरण या मानवाधिकार एक्टिविस्ट पर राजद्रोह या वैसा ही कोई संगीन मामला जड़ देती है, जिनकी हम अब बहुतायत देख ही रहे हैं. लेकिन अदालत से बरी हो जाने पर हत्या के अभियुक्तों के मामले में, जैसा कि ओडीशा में हुआ, जनता को कानून की पेचीदगियों और साक्ष्यों के लीगल महत्त्व या सैंक्टिटी की पूरी जानकारी नहीं हो पाती. वैसे, इस बारे में मीडिया भी अपनी भूमिका को और व्यापक बना सकता है.

न्याय के सिद्धांतों का हनन करने वाला कानूनकानून नहीं

सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले में इस तरह के आदेशों के प्रति आम भ्रम या दुराव की स्थिति को भी दूर करने में मदद मिल सकती है. आम नागरिक का भी कानूनों के बारे में सहज उत्सुकता ही नहीं सहज बोध और सामान्य ज्ञान होना भी जरूरी है. जागरूक नागरिक ही देश के विकास में सच्चे भागीदार बनते हैं. समाज के सभी वर्गों को कानूनी अधिकारों और अहम मामलों पर जागरूक रहना जरूरी है. स्त्री, बाल, छात्र, बुजुर्ग, किसान, मजदूर, कर्मचारी, शिक्षक, पत्रकार और समाज के बहुत से वर्गों और समाज के कमोबेश सभी क्षेत्रों में कानूनी अधिकारों के प्रति सजगता हर हाल में जरूरी है. सभी नागरिकों पर यह बात लागू होती है, खासकर समाज के उपेक्षितों, वंचितों और गरीबों को जिनके लिए कानून की लड़ाई अक्सर एक जीवन-संघर्ष सरीखा बन जाता है. न सिर्फ किसी बेगुनाह को सजा मिलनी चाहिए, बल्कि संसाधनविहीन, गरीब व्यक्ति को भी वहां से किसी भी रूप में निराश न लौटना पड़े, यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए.

19वीं सदी की अमेरिकी लेखिका, एक्टिविस्ट और पत्रकार लीडिया मारिया फ्रांसिस चाइल्ड का एक प्रसिद्ध कथन कानून और मानवाधिकार के हल्कों में आज भी अक्सर कोट किया जाता है कि शाश्वत न्याय के सिद्धांतों का हनन करने वाला कानून, कानून नहीं है. संदेह और साक्ष्य के आकार, स्थिति और उपलब्धतता के आधार पर तय की जाने वाली कानूनी और अदालती बारीकियों के बीच यह देखा जाना भी जरूरी है कि सही इंसाफ के हकदार सभी हैं और अदालतों के फैसले में साक्ष्य की विसंगतियों का ही नहीं मामले से जुड़े मानवीय पहलुओं का भी आकलन किया जाना चाहिए.

__________________________

हमसे जुड़ें: Facebook | Twitter | YouTube | GooglePlay | AppStore

DW.COM

संबंधित सामग्री

विज्ञापन