आरटीआई कानून के पीछे क्यों पड़ी है सरकार | ब्लॉग | DW | 19.07.2018
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आरटीआई कानून के पीछे क्यों पड़ी है सरकार

भारत सरकार सूचना का अधिकार कानून में संशोधन कर उसे राज्य सभा से पास कराने की तैयारी में है लेकिन आरटीआई एक्टिविस्ट भी सड़कों पर उतर गए हैं. आखिर सरकारें क्यों इस सबसे पारदर्शी कानून को शिथिल बनाने पर तुली हैं.

केंद्र सरकार के संशोधन से केंद्रीय सूचना आयोग से लेकर सभी राज्य सूचना आयोगों की स्वायत्तता प्रभावित होने का खतरा है. सरकार की कोशिश है कि संसद के मॉनसून सत्र में ही इसे पास करा लिया जाए. इस प्रस्तावित संशोधन के मुताबिक, केंद्र और राज्यों में सभी सूचना आयुक्तों के वेतन, भत्ते और अन्य सेवा शर्ते, केंद्र सरकार ही तय करेगी. जरूरी नहीं कि सेवा अवधि पांच साल ही रहेगी. सर्विस पीरियड भी वही निर्धारित करेगी. इससे आरटीआई एक्टिविस्टों में गहरा आक्रोश है. उनका आरोप है कि इस तरह सूचना आयुक्तों का कद गिराने की कोशिश की जा रही है. संशोधन पास हो जाने के बाद सूचना आयुक्त, चुनाव आयुक्तों के समकक्ष नहीं रह जाएंगे. लेकिन सरकार का तर्क है कि सूचना आयोग और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली में बहुत अंतर है, उनके कार्य भी अलग अलग है. दूसरा चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है जबकि केंद्रीय और राज्य सूचना आयोग कानून से बनी विधायी संस्थाएं हैं.

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आरटीआई कानून में संशोधनों की कोशिशें तबसे होती रही हैं जबसे ये कानून अस्तित्व में आया है. अक्टूबर 2005 में अस्तित्व में आए आरटीआई कानून को डाइल्यूट करने और उसमें संशोधन की कोशिशें 2006 से ही शुरू हो गई थीं. सरकारी फाइल पर अधिकारियों या मंत्रियों की नोटिंग्स को सूचना के दायरे से हटाने का प्रस्ताव था. लेकिन फाइल नोटिंग से ही आखिरकार ये पता चलता है कि अधिकारी ने फाइल पर क्या कार्रवाई या संस्तुति की है. जाहिर है भारी जनविरोध के बाद इसे वापस लेना पड़ा. 2009 में ‘तंग करने वाली' और ‘ओछी' आरटीआई अर्जियों को खारिज करने का प्रस्ताव आया. लेकिन ये चिन्हीकरण अस्पष्ट और भ्रमपूर्ण था और इसके दुरुपयोग के खतरे भी थे. भारी विरोध हुआ तो ये प्रस्ताव भी ठंडे बस्ते में चला गया.

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2012 में महाराष्ट्र सरकार ने आरटीआई अर्जी में शब्द संख्या 150 करने का प्रस्ताव रखा, हालांकि ये राष्ट्रीय आरटीआई कानून की भावना के विपरीत था लेकिन बताया जाता है कि सूचना अधिकारी इसी शब्द संख्या के आधार पर अर्जियां स्वीकार या खारिज करते आ रहे हैं. 2017 में डिपार्टमेंट ऑफ पर्सनल एंड ट्रेनिंग ने प्रस्ताव दिया कि आरटीआई कार्यकर्ता की मौत हो जाने के बाद उसकी दायर सूचना स्वतः ही समाप्त मान ली जाएगी, यानी उस पर कार्रवाई बंद कर दी जाएगी, लेकिन भारी विरोध ने इस प्रस्ताव से भी किनारा करना पड़ा. एक और कोशिश ये हुई कि सरकार के पास ये अधिकार होगा कि दूसरी अपील की अर्जी, उसे पहले से सुनते आ रहे सूचना आयुक्त से हटाकर दूसरे को दे दी जाए. इस पर खुद केंद्रीय सूचना आयोग से ऐतराज उठा था और ये प्रस्ताव अभी लटका हुआ है.

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संशोधनों के जरिए कानून को कमजोर करने की तमाम कोशिशों के बीच इसका महत्त्व निर्विवाद है. एक अनुमान के मुताबिक हर साल चालीस से साठ लाख अर्जियां इस कानून के तहत दायर की जाती हैं. इस तरह ये देश का ही नहीं दुनिया का सबसे व्यापक पैमाने पर इस्तेमाल होने वाला कानून है. आरटीआई के जरिए ऐसी कई अहम सूचनाएं पब्लिक डोमेन में आई हैं जो अन्यथा यूं ही दबी रह जातीं. कई सुधार कार्यक्रम शुरू हुए हैं और वंचितों को उनके अधिकार और सुविधाएं हासिल हुई हैं. आरटीआई ने सरकारी सिस्टम की निष्क्रियता, अकर्मण्यता और यथास्थितिवाद को भी भरसक तोड़ने की कोशिश की है.

ब्लैकमेल करने या परेशान करने के लिए इस कानून का दुरुपयोग भी हुआ है. दूसरा आरटीआई जैसी पारदर्शी व्यवस्था में भी धूल झोंकने की कोशिश सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों के स्तर पर रही है. वक्त के साथ आरटीआई से बचने के रास्ते निकाले गए हैं और सूचना संपन्नता के अधिकार से शुरू हुआ आंदोलन, सत्ता और प्रशासन के पेचीदा और चालाक गलियारों में फंसने भी लगा है. इसके इतर जो सबसे बड़ा खतरा बन कर आया वो है आरटीआई एक्टिविस्टों पर बढ़ते हमले. खबरों के मुताबिक अब तक आरटीआई एक्टिविस्टों की हत्या के कुल 67 मामले सामने आए हैं.

सूचना का अधिकार बना हथियार

जाहिर है ताजा संशोधनों को लेकर सरकार के पास अपनी दलीलें हैं, लेकिन ये कमजोर दलील है. कोई ठोस वजह सरकार के पास बताने को नहीं है कि वेतन, भत्ते, और सेवाकाल आदि व्यवस्थाओं पर विधायी शक्तियों से लैस सूचना आयोगों को अपनी कृपा पर निर्भर बनाने की तैयारी आखिर क्यों की जा रही है. और इसीलिए एक्टिविस्ट इसे छल बता रहे हैं. वैसे इस बात की क्या गारंटी है कि नये संशोधनों के बाद सूचना का अधिकार कानून उतना प्रभावी रह पाएगा जितना कि वो अभी है. अगर सरकार के रहम पर ही सूचना आयुक्तों को काम करना है तो फिर आरटीआई कानून की क्या जरूरत. काम से हटा दिए जाने की तलवार उन पर लटकती रहेगी, वेतन भत्तों में कटौती से शक्तियां और प्रभाव भी सिकुड़ेगा और फिर सूचना आयोगों को गंभीरता से कौन लेगा. अपने अधिकारों को लेकर आम आदमी की उत्सुकता, मांग और लड़ाई तो फिर धरी की धरी रह जाएगी. एक पारदर्शी, विधिसम्मत, जनहित वाली संस्था का संभावित खोखलापन, लोकतंत्र के लिए भी घातक होगा.

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