आप्रवासन कानून की जरूरत | दुनिया | DW | 22.01.2015
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दुनिया

आप्रवासन कानून की जरूरत

जर्मन आप्रवासन रिपोर्ट दिखाती है कि किन देशों के लोग जर्मनी में रहने, काम करने आ रहे हैं और ये भी कि लोग जर्मनी छोड़ कर कहां जा रहे हैं. फेलिक्स श्टाइनर कहते हैं कि रिपोर्ट आप्रवासन कानून की फौरी जरूरत पर रौशनी डालती है.

जर्मनी के आप्रवासन और शरणार्थी दफ्तर की 312 पेजों वाली रिपोर्ट की अच्छी बात यह है कि वह आंकड़े तो देती है, लेकिन उनका आंकलन नहीं करती. इस मामले में यह बहाना नहीं चल सकता कि आंकड़ें झूठ बोलने वाले प्रेस की देन हैं. ये आंकड़े सच्चे हैं.

पूर्वाग्रहों को तोड़ते आंकड़े

कुछ आंकड़े जर्मनी की आम सड़कों और अड्डों में पाले जाने वाले पूर्वाग्रहों के जैसे ही हैं लेकिन दूसरे आंकड़े आश्चर्य में डालने वाले. लोग आम तौर पर यही सोचते हैं कि जर्मनी आने वाले सबसे ज्यादा विदेशी तुर्की, कोसोवो या फिर अफगानिस्तान जैसे देशों के होंगे. लेकिन यह सच नहीं है. डाटा से पता चलता है कि सबसे ज्यादा लोग पोलेंड से आ रहे हैं और वह भी 1996 से. पोलेंड के आप्रवासियों की समाज में घुलने मिलने में समस्या या उनके घेट्टो में रहने की बात अब तक किसी ने नहीं सुनी है. यह कैथोलिक चर्च के लिए खुशी की बात है क्योंकि ज्यादातर पोलेंडवासी कैथोलिक हैं. इसके अलावा, देश के कानून के मुताबिक वह चर्च को धार्मिक कर चुकाने वाले नागरिक भी हैं.

Felix Steiner

डीडब्ल्यू संपादक फेलिक्स श्टाइनर

यूं भी जर्मनी आने वाले तीन चौथाई आप्रवासी यूरोपीय देशों से आ रहे हैं. पोलेंड के बाद रोमानिया, बुल्गारिया, इटली, ग्रीस, रूस और स्पेन का नंबर आता है. ये सब कैथोलिक बहुल देश हैं. ये सही है कि आंकड़े जमा करने वाले तुर्की को भी यूरोप में ही मानते हैं. सही यह भी है तुर्की उन दो देशों में शामिल है जहां बहुत सारे लोग जर्मनी छोड़कर जा रहे हैं. जर्मनी का इस्लामीकरण नहीं हो रहा है लेकिन यह सच है कि जर्मनी में आप्रवासियों की संख्या बढ़ रही है. पिछले साल करीब 430,000 लोग जर्मनी आए. इसकी दो वजहें हैं. एक तो शरणार्थियों की संख्या बढ़ी है दूसरे दक्षिण यूरोप भारी आर्थिक संकट का सामना कर रहा है.

आप्रवासियों की जरूरत

पहले लोग जर्मनी छोड़कर मध्य सागर के गर्म देशों में रहने जाते थे. अब वहां के युवा नौकरी की तलाश में जर्मनी आ रहे हैं. जर्मनी में हर साल होने वाली मौतों के मुकाबले जन्म लेने वाले बच्चों की संख्या में करीब 2 लाख का अंतर है. जर्मनी की आबादी में इस अंतर को देखते हुए कहा जा सकता है कि उसे अपनी समृद्धी और खुशहाली को बचाने के लिए फौरी तौर पर आप्रवासियों की जरूरत है. अगले दस साल में जब इस समय 55 साल की उम्र वाले लोग पेंशन की उम्र में जाएंगे तो जर्मनी में कामगारों की भारी कमी हो जाएगी.

जर्मनी को उस समय के लिए तैयार रहना होगा जब दक्षिण यूरोप का संकट समाप्त हो चुका होगा. शरणार्थियों के मामले में मानवीय कारण और परिवारों का मिलन आप्रवासन की एकमात्र शर्त नहीं हो सकती. भले ही बहुत से जर्मनों को अभी भी अजीब लगे लेकिन आप्रवासन कानून देश के आर्थिक भविष्य को सुरक्षित करने का सबसे अच्छा रास्ता होगा. वह साफ करता है कि जर्मनी को किस तरह के विदेशियों की जरूरत है. अपनी ऐसी अवधारणा का सरकार प्रदर्शनकारियों के सामने भी बचाव कर पाएगी.

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