आपदा प्रबंधन की सुध कब लेंगे | ब्लॉग | DW | 27.04.2015
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ब्लॉग

आपदा प्रबंधन की सुध कब लेंगे

नेपाल में भूकंप ने भारी बर्बादी मचाई है. नेपाल की हालत देखकर लगता है कि वह इस स्थिति से निबटने के लिए कतई तैयार नहीं था. भारत मदद जरूर कर रहा है लेकिन क्या वह आपदा प्रबंधन के लिए पूरी तरह तैयार है?

नेपाल के इतिहास में 80 साल बाद भूकंप से ऐसी व्यापक तबाही हुई है. जानमाल के भारी नुकसान के बीच बुनियादी सवाल फिर से सर उठा रहा है कि क्या इस तबाही से बचा जा सकता है या इसका नुकसान कम किया जा सकता है. जवाब ‘हां' में भी है और ‘ना' में भी. ‘ना' तो इसलिए कि ऐसी कुदरती आफतों का सटीक वैज्ञानिक पूर्वानुमान लगा पाना असंभव ही है लिहाजा तबाही से बचना भी नामुमकिन ही है और ‘हां' इसलिए कि अगर आपदा प्रबंधन तंत्र मुस्तैद हो, गतिशील हो और भवन निर्माण पद्धतियां वैज्ञानिक और विवेकपूर्ण हों तो कम से कम जान माल का नुकसान काफी कम किया जा सकता है.

तो बुनियादी बात यही है कि दुनिया के कुछ देश मजबूत आपदा प्रबंधन की वजह से बेहतर बचाव कर लेते हैं लेकिन कुछ देश ऐसी विपदा के आने पर असहाय और लाचार ही नजर आते हैं. आज नेपाल की स्थिति कमोबेश ऐसी ही है. इतनी व्याकुल कर देने वाली और विडंबना से भरी निरुपायता वहां दिखती है कि हैरानी होती है कि आखिर देशों के एजेंडे में आपदा प्रबंधन और नागरिक की हिफाजत के विभिन्न पहलुओं पर गौर क्यों नहीं किया जाता रहा है.

ठीक है कि भूकंप जैसी घटनाओं की भविष्यवाणी संभव नही है लेकिन नागरिकों की जान की सुरक्षा की गारंटी सरकार को देनी ही चाहिए. ये भी तो मानवाधिकार है. इसलिए हर इलाके में आबादी और जगह के बीच संतुलन रखते हुए निर्माण और रिहायश की योजनाएं विकसित की जानी चाहिए. क्या सरकारें इसकी अनदेखी करती रहेंगी. काठमांडू की तबाही का एक बड़ा कारण वहां बेतहाशा हुआ निर्माण भी है. दूसरे जो पुरानी हैरीटेज इमारतें थीं उनकी वैज्ञानिक देखरेख के ठोस इंतजाम नहीं किए गए थे. आज हम नेपाल को लेकर अफसोस और गम कर रहे हैं लेकिन दक्षिण एशिया भूभाग के सबसे बड़े देश भारत को ही लें.

यहां देश का 57 फीसदी क्षेत्र भूकंप जैसी विपदाओं के लिहाज से संवेदनशील माना जाता है, लेकिन आप एक दौरा या सर्वे करके देख लीजिए क्या इन इलाकों में आपदा प्रबंधन की सक्रियता का कोई नमूना आपको दिखाई देता है. पेड़ों की जगह घेरते हुए कंक्रीट के जंगल छा गए हैं. बड़े पैमाने पर प्रदूषण फैला हुआ है. निर्माण की हवस से तो लगता है पूरा देश घिरा हुआ है. और अब ऊपर से ये विवादास्पद भू अधिग्रहण कानून. हम नहीं जानते कि इसके अमल में आने के बाद जिस बड़े पैमाने पर निर्माण का एक नया चक्र शुरु होगा उसके आने वाले दिनों में कहां कहां और किस किस पर क्या नतीजे गिरेंगे.

जरूरत इस बात है कि भूकंप के दायरे में आने वाले इलाकों में लंबी समयावधि के साथ काम होना चाहिए. वहां आपदा प्रबंधन का ऐसा तंत्र विकसित किया जाना चाहिए जो हर समय मुस्तैद हो. और वो सिर्फ विपदा के आने के समय ही हरकत में न आए, वो ये भी देखे कि इलाके में निर्माण प्रक्रिया कैसी है और जल जंगल जमीन का क्षेत्र सिकुड़ा तो नहीं है. इससे लोगों में भी जागरूकता आएगी. लोग सजग रहना भी सीखेंगे. हर जिले में आपदा प्रबंधन टीम के पास बचाव और राहत का जरूरी साजोसामान रहना चाहिए. एक राष्ट्रीय निर्माण नीति या संहिता होनी चाहिए और उसी के हिसाब से मकान बनाए जाने चाहिए. हर किस्म की आपदा के लिए प्रबंधन की टीमें और तकनीकी कुशलता और उपकरण भी अलग होते हैं. वे हमेशा उपलब्ध रहने चाहिए.

निर्माण का ध्यान रखना या इस लिहाज से नीति बनाना ये तो दूर की बात हैं आपदा प्रबंधन तंत्र का पहला काम है बचाव और राहत का. उसकी स्थिति भी देश में शोचनीय हैं. आज नेपाल के भूकंप में पूरी सक्रियता दिखाने और तत्काल मदद भेजने के बावजूद नेपाल के प्रभावित इलाकों में त्राहित्राहि कायम है और घायल इलाज के लिए भटक रहे हैं. डॉक्टरों की कमी है. भारत ने नैतिक जिम्मेदारी निभाते हुए तत्काल कदम तो उठाया लेकिन क्या इस कदम से कोई बहुत बड़ा लाभ हो पा रहा है या नहीं. क्या सारा काम अपने अदम्य साहस के साथ सेना के जवान ही करेंगे. बाकी मशीनरी टुकुरटुकुर ताकती रहेगी. ऐसा कब तक चलेगा.

बचाव और राहत के लिए भारत में 2005 में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) का गठन किया गया था. इसे राज्यों और जिला स्तरों पर भी बनाया गया. लेकिन कुछ राज्यों में इन प्राधिकरणों की हालत देखिए, वे निष्क्रिय जान पड़ते हैं. दो साल पहले उत्तराखंड के केदारनाथ में आई भीषण प्राकृतिक विपदा को लोग भूले नहीं हैं और लोग उस दौरान आपदा प्रबंधन की दयनीय हालत को भी नहीं भूले हैं. आखिर मंगल तक की ऊंचाइयां छूने का क्या हासिल, जब हम एक विपदा में अपने नागरिकों की जान ही नहीं बचा सकते हैं.

ब्लॉगः शिवप्रसाद जोशी

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