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आनुवांशिकी में काफी प्रगति हुई है लेकिन सुपरमैन बनाना इतना आसान नहीं
आनुवांशिकी में काफी प्रगति हुई है लेकिन सुपरमैन बनाना इतना आसान नहींतस्वीर: Maksym Yemelyanov/Zoonar/picture alliance

आनुवंशिकी के दौर में जीवन और आचार

युलेट पिनेडा
१२ अगस्त २०२२

आनुवांशिकी के दावे बहुत भारी-भरकम हैं. विलुप्त जानवरों को फिर से निर्मित करने से लेकर धरती पर इंसानो का अस्तित्व सुरक्षित रखने तक. लेकिन इस विज्ञान में आचार-नीति की क्या जगह है?

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जब हम आनुवांशिकी की बात करते हैं, तो हम अक्सर सुपरमैन की कल्पना करते हैं- वे लोग जिनमें परिवर्तित डीएनए की वजह से क्षमताएं बेतहाशा बढ़ जाती हैं, वे दूसरों से अधिक शक्तिशाली हो जाते हैं और बहुत सारी बीमारियों से बच जाते हैं, देखने में भी अच्छे होते हैं, जैसे कि मनुष्यता का "सर्वश्रेष्ठ संस्करण" कहलाते हैं.

लेकिन ये नजारे डिस्टोपियन साहित्य में ही देखे जा सकते हैं या साइंस फिक्शन की घिसी पिटी फिल्मों में. वास्तविकता से उनका नाता नहीं होता.      

दुनिया के जानेमाने आनुवांशिकी विज्ञानी जॉर्ज चर्च, कहते हैं कि सुपरमैन को निर्मित करने का विचार, आनुवांशिकी के भविष्य से कोसों दूर है. 

जॉर्ज चर्च ने डीडब्लू को बताया, "ये एक गलतफहमी है कि आप एक संपूर्ण मुकम्मल इंसान या सुपरमैन बन सकते हैं. ये अक्सर समझौता होता है. आप कोई चीज हासिल करते हैं तो आप कुछ गंवा भी देते हैं. साइकिल के जो फीचर आपको अच्छे लगते हैं वो रेस वाली कार या जेट के लिए सच नहीं है."

चर्च ने दशकों से आनुवांशिकी पर काम किया है. वो मानव जीनोम की सीक्वेसिंग करने वाले पहले वैज्ञानिकों में से एक थे. ये वो तरीका है जो किसी जीव में आनुवांशिक पदार्थ का खुलासा करता है. जीनोम-इंजीनियरिंग के विकास के भी वो प्रणेता रहे हैं.

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मानव जीन संपादन से खुला जिंदगियों में बदलाव का रास्ता

जीनोम-इंजीनियरिंग को कुछ और नामों से भी जाना जाता है. कुछ इसे जेनेटिक इंजीनियरिंग कहते हैं, तो दूसरे लोग इसे जीनोम या जीन संपादन कहते हैं.

कुछ इसे प्रौद्योगिकी मानते हैं और दूसरे इसका हवाला ऐसे देते हैं मानो ये आपके हाथों में थामी हुई कोई कैंची हो. एक लिहाज से वो छवि काम कर जाती हैः हम लोग जीन संपादन तकनीकों का इस्तेमाल कर, मिसाल के लिए, उन जीन्स को काट या हटा सकते हैं जो आनुवंशिक बीमारियों की वाहक होती हैं. 

वास्तव में, प्रौद्योगिकी की बदौलत ही, हम किसी जीव के डीएनए में पाए जाने वाले आनुवांशिक पदार्थ को जोड़, निकाल या बदल सकते हैं. डीएनए ही वो पेचीदा अणु है जो समस्त जीवों के निर्माण की अनूठी इकाई है. 

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तस्वीर: SWR

आनुवांशिकी का युग

1865 में पहली बार, संकर पौधों पर प्रयोगों के जरिए ग्रेगर मेंडल ने वंशानुक्रम के मूल सिद्धांतों की खोज की थी. उन्हीं प्रयोगों से जो निष्कर्ष निकले, उन्हें आज हम जेनेटिक्स यानी आनुवांशिकी कहते हैं. और ये क्षेत्र तो गजब की तरक्की पर है.

अपनी हार्वर्ड यूनिवर्सिटी लैब से डीडब्ल्यू से बातचीत में जॉर्ज चर्च ने कहा कि हम लोग  "आनुवांशिकी के युग " में रहते हैं.

मेंडल की शुरुआती खोजों ने वैज्ञानिकों को जीनोम की सीक्वेंस करने यानी उसे तरतीब या सिलसिले में लाने की इजाजत दी है. इससे सार्स-कोवि-2 के वायरसों के जीनोम भी शामिल हैं. मेंडल के काम की बदौलत वैज्ञानिकों को उन जीन्स की शिनाख्त करने का मौका भी मिला है जो 5,000 से ज्यादा दुर्लभ बीमारियों के लिए जिम्मेदार हैं.

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उनसे हमें जीन्स के काम करने के तरीके के बारे में बेहतर समझ हासिल हुई है, और बीमारियों की पहचान और उपचार में सुधार करने के दावों को मजबूत बनाने में मदद मिली है. उम्रदराज होने की प्रक्रिया को उलटने में आनुवंशिकी के इस्तेमाल पर, जॉर्ज चर्च ने अपना ध्यान केंद्रित किया है.

जेनेटिक्स का इस्तेमाल  "डी-इक्स्टिंगक्शन" यानी विलुप्ति से वापस लाने यानी पुनर्जीवन के विज्ञान में भी होता है. इसका एक प्रसिद्ध उदाहरण मैमथ को वापस अस्तित्व में लाने की कोशिश में निहित है.

बेहतर दवा और बेहतर समाज के लिए जेनेटिक्स 

चर्च और दूसरे आनुवांशिकी विज्ञानियों को उम्र से जुड़ी क्रोनिक बीमारियों के प्रभावो को उलटने की उम्मीद है, जैसे कि डायबिटीज, दिल की बीमारियां या कॉग्निटिव डिग्रेडेशन यानी कुछ याद न रहे, ध्यान ना लगे, नई चीजें पल्ले न पड़ें और निर्णय क्षमता शिथिल पड़ जाए. उन्हें उम्मीद है कि वे वैसी बीमारियों को भी रोक पाएंगे जिनके कारण गरीबी आती है.

जीन टैक्सी से इलाज

जॉर्ज चर्च कहते हैं, "बहुत सारे लोग गरीबी में रखे जाते हैं क्योंकि उन्हें अपना अधिकांश समय एक खराब पोषण में और संक्रामक बीमारियों से लड़ने में ही खर्च कर देना होता है. (जेनेटिक रिसर्च की बदौलत) हम लोग एक दुष्चक्र के बजाय एक नेक चक्र हासिल कर सकते हैं. यही बात मुझे बहुत रोमांचित करती हैं."

जॉर्ज चर्च कहते हैं, "मानव से इतर कारणों की तलाश में हमें हो सकता है धरती से बाहर जाना पड़े, जैसे क्षुद्र ग्रह, सौर ज्वालाएं, सुपर ज्वालामुखी, इस किस्म की चीजें. उसके लिए हमें आनुवांशिक दवा सहित किसी शक्तिशाली दवा की जरूरत होगी जो हमें विकिरण और निम्न गुरुत्व से प्रतिरोध के काबिल बना सके."

आनुवांशिकी की आचारनीति

भविष्य की ये कल्पनाएं आचार और दर्शन से जुड़े सवालों की व्यूह-रचना के साथ आती हैं, जानकारों के मुताबिक जिनके जवाब हमें अभी मिलने बाकी हैं. 

मिसाल के लिए, ये सवाल कि क्या चीज है जो हमें मानव बनाती है और कौन ये तय करता है कि हम कौन सी जीन्स बदलते हैं.

अमेरिका के न्यू यार्क में कोल्ड स्प्रिंग हार्बर के ग्रेजुएट स्कूल ऑफ बायोलॉजिकल साइंसेस में प्रोफेसर यान वित्कोवस्की कहते हैं, "(भविष्य की) पीढ़ियां ही हमेशा से जीन संपादन और जीन उपचार का मुद्दा रही हैं. अगर जीन थेरेपी एक अंडे में बदलाव ले आती है, तो वो बदलाव पीढ़ियों के जरिए वंशागत होगा यानी पीढ़ी दर पीढ़ी होगा."

और उन भविष्य की पीढ़ियों को इस बारे में कोई राय जताने का हक ही हासिल नहीं है कि वे उस बदलाव को चाहती भी हैं या नहीं.  

ग्रेगर जॉन मेंडल को आनुवांशिकी का पिता कहा जाता है
ग्रेगर जॉन मेंडल को आनुवांशिकी का पिता कहा जाता हैतस्वीर: akg-images/picture alliance

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आनुवंशिकी को पूर्वाग्रह से निजात

जेनेटिक्स के क्षेत्र ने वैज्ञानिकों को निजी तौर पर दवा को विकसित करने की इजाजत दी है. जहां इलाज व्यक्ति की विशेष स्थिति के लिहाज से ढाले जा सकें. जेनेटिक डाटा का एक विशाल संग्रह या भंडार भी तैयार किया गया है.

लेकिन कुछ वैज्ञानिकों की दलील है कि ये संग्रह वैश्विक आबादी का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं. यूरोपीय वंशावली वाले लोगों से करीब 90 फीसदी जीनोम डाटा इस समय मौजूद है. फिर भी इस डाटा में विविधता का अभाव है.

ये विषमता या अंतर, कम प्रतिनिधित्व वाली आबादियों को आनुवंशिक शोध के लाभों से वंचित कर सकता है.

आनुवंशिकी अभी भी बहुत महंगी है. जॉर्ज चर्च कहते हैं कि टेक्नोलॉजी भले ही सस्ती हो जाए, इंटरनेट की तरह, और कुछ हद तक पानी और शिक्षा की तरह, लेकिन उनमें से कोई भी "सच्चे अर्थो में न्यायोचित" नहीं है.

उनके मुताबिक, "अकेली प्रौद्योगिकी जो मुझे पता चली है, और मेरे हिसाब से सच्चे अर्थों में समान रूप से वितरित है, यानी धरती में किसी को उसे पाने के लिए एक कौड़ी भी खर्च नहीं करनी पड़ती है, वो  है- चेचक." चर्च कहते हैं, "ऐसा इसलिए हैं क्योंकि वो विलुप्त हो चुका है. हमें उसके लिए टीके बनाने या लगाने या दवाएं देने की ज़रूरत नहीं रह गई है. और (आनुवंशिकी के जरिए) ये काम, तमाम किस्म की संक्रामक बीमारियों के लिए किया जा सकता है."

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