आत्महत्या अपराध नहीं | ब्लॉग | DW | 29.08.2013
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ब्लॉग

आत्महत्या अपराध नहीं

गुलामी मिटने के बाद भी भारत में दो चीजें नहीं बदलीं नौकरशाही और न्यायव्यवस्था. अंग्रेजों ने अपनी दमनकारी नीतियों को लागू करने के लिए जो नौकरशाही, न्याय व्यवस्था और कड़े कानून बनाए थे, देश आजाद हो कर भी उन्हें ढो रहा है.

पिछले 66 सालों में कई पुलिस आयोग गठित किए गए और उन्होंने पुलिस सुधारों पर अपनी रिपोर्टें पेश कीं, लेकिन अभी तक इस दिशा में कुछ खास प्रगति नहीं हो पाई है॰ नौकरशाही का चरित्र भी पुलिस की तरह ही दमनकारी और जवाबदेही से मुक्त है॰ पिछले दो-तीन दशकों के दौरान आधुनिक चेतना आने के कारण कुछ कानूनों के विरुद्ध लोगों में जागृति पैदा हुई है और उनमें बदलाव की प्रक्रिया शुरू हुई है॰ यह बात दीगर है कि इस प्रक्रिया की गति बेहद धीमी है॰

अंग्रेजों के बनाए कानूनों में ऐसी कई बातों को अपराध की श्रेणी में रख दिया गया था जिन्हें आज सभ्य दुनिया में सामान्य समझा जाता है, मसलन समलैंगिकता एवं आत्महत्या लेकिन अब स्थिति बदल रही है॰ भारतीय दंड संहिता की धारा 309 के तहत आत्महत्या को अपराध माना गया था, लेकिन इन दिनों संसद में एक विधेयक पर विचार हो रहा है जिसके पारित होने पर उसे अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया जाएगा॰

कोई व्यक्ति आत्महत्या क्यों और कब करता है? अक्सर देखा गया है कि जब लोग जीवन से पूरी तरह निराश हो जाते हैं और उनमें अपनी समस्याओं का सामना करने की हिम्मत नहीं रह जाती, तब वे अपनी जीवनलीला समाप्त करने का असाधारण निर्णय लेते हैं॰ कई बार यह एक सुचिन्तित निर्णय होता है, लेकिन अधिकांश मामलों में पाया गया है कि यह कदम क्षणिक भावावेश में उठाया जाता है॰ प्रेम में असफलता, परीक्षा में आशा के अनुरूप परिणाम न आना, पारिवारिक तनाव और आर्थिक परेशानी–––आत्महत्या के पीछे आम तौर पर इसी तरह के कारण होते हैं॰ यदि व्यक्ति आत्महत्या करने के प्रयास में सफल हो गया, तब तो वह हर चीज़ से मुक्त हो गया लेकिन जो इस प्रयास में असफल हो जाते थे, उन पर दोहरी मार पड़ती थी॰ जाहिर है कि जो व्यक्ति आत्महत्या जैसा कदम उठाने पर मजबूर होगा, वह जिंदगी से कितना परेशान हो चुका होगा॰ यदि वह इस प्रयास में असफल हो गया, तो कानून उसकी मदद करने के बजाय उसे अपराधी मानकर जेल की सींखचों के पीछे पहुंचा देता है॰ अभी तक भारत में लागू कानून के तहत आत्महत्या का प्रयास करने वाले (और उसमें असफल रहने वाले) व्यक्ति के लिए एक वर्ष की सामान्य कैद और साथ में अदालत से निर्धारित जुर्माना भरने की सजा तय की गई है॰ आशा है कि संसद प्रस्तावित विधेयक पारित करके इस अमानवीय स्थिति को बदलेगी॰

आज यह समझना काफी कठिन है कि आत्महत्या को कानूनन अपराध की श्रेणी में क्यों डाला गया? आखिर यह किसके प्रति अपराध है? इससे किसका नुकसान हो रहा है? क्या व्यक्ति का अपने जीवन और मरण पर कोई अधिकार नहीं? यदि कोई व्यक्ति जीना नहीं चाहता, तो समाज या राज्य को उसे जीते रहने पर मजबूर करने का क्या अधिकार है जब वह उसकी समस्याओं का हल नहीं कर सकते? आम तौर पर माना जाता है कि सभी धर्म आत्महत्या के विरुद्ध हैं क्योंकि उनकी मान्यता है कि जीवन ईश्वर द्वारा दिया गया है और मनुष्य को उसे नष्ट करने का कोई अधिकार नहीं है॰ लेकिन यह तर्क इसलिए नहीं टिकता क्योंकि रोज ही किसी न किसी कारण से मनुष्य अन्य प्राणियों की जान लेते हैं? फिर अपनी जान लेने में ऐसा क्या पाप है? इसके अलावा एक सवाल यह भी उठता है कि क्या किसी धर्मनिरपेक्ष कहे जाने वाले देश के कानून धर्म के आधार पर निर्देशित और निर्धारित किए जाएंगे? भारत के संदर्भ में एक सवाल यह भी है कि क्या वास्तव में यह धारणा सही है कि सभी धर्म सभी स्थितियों में आत्महत्या यानि स्वयं अपने प्राण लेने या अपनी इच्छा से मरने के कृत्य के विरुद्ध हैं?

यदि हम रामायण और महाभारत पर नजर डालें, तो उसमें कई ऐसे प्रसंग मिलेंगे जिनमें अनुकरणीय और आदर्श मानी जाने वाली विभूतियों ने अपने मरने का समय और तरीका खुद चुना॰ लेकिन इसे आत्महत्या की श्रेणी में नहीं रखा गया॰ इस आत्महंता वृत्ति की इन महाकाव्यों में या परंपरा के अन्य स्रोतों में किसी भी प्रकार की निंदा या भर्त्सना भी नहीं की गई॰ इच्छामृत्यु को आत्मघात मानकर उसे पाप की श्रेणी में भी नहीं रखा गया॰

अब संसद के सामने जो विधेयक है उसके पारित होने के बाद आत्महत्या को “मानसिक रोग” माना जाएगा और आत्महत्या की कोशिश करने वाले व्यक्ति की देखभाल की व्यवस्था की जाएगी॰ सरकार का दावा है कि यह सब आत्महत्या करने वालों के प्रति मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए उनके अधिकारों के संरक्षण के लिए किया जा रहा है॰ क्या वाकई इस विधेयक से आत्महत्या की कोशिश करने वाले व्यक्ति के साथ अधिक मानवीय बर्ताव होने की संभावना बनेगी? बहुतों को इसमें संदेह है क्योंकि भारत में जिसे मानसिक रोगी मान लिया जाता है, उसके लिए सही जगह पागलखाने को ही समझा जाता है॰ भारत के पागलखानों में मनोरोगियों के साथ कितना मानवीय व्यवहार किया जाता है, यह सभी को मालूम है॰ इसलिए अगर कानून में आत्महत्या के प्रयास के बाद बचे रहने वाले व्यक्ति को ससम्मान समाज में पुनः प्रतिष्ठित करने और एक सार्थक जीवन जीने में सहायक प्रावधान नहीं रखे जाते, तो इसकी उपयोगिता संदिग्ध ही रहेगी॰

ब्लॉग: कुलदीप कुमार, नई दिल्ली

संपादन: निखिल रंजन

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