आखिर अमेरिका-चीन की लड़ाई की जड़ क्या है | दुनिया | DW | 10.05.2019
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दुनिया

आखिर अमेरिका-चीन की लड़ाई की जड़ क्या है

उच्च तकनीक के मामले में दुनिया में प्रभुत्व पाने की चाह को लेकर विश्व की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच एक तरह की व्यापारिक जंग छिड़ी हुई है. अमेरिका ने फिर बढ़ाया चीनी वस्तुओं पर आयात शुल्क.

विश्व की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं ऐसे हाल में हैं कि ना तो एक दूसरे को छोड़ सकती हैं और ना ही साथ चलना आसान है. भविष्य को लेकर महत्वाकांक्षाएं वर्तमान जरूरतों पर भारी पड़ती दिख रही हैं. तकनीक के क्षेत्र में दोनों ही देश अपना वैश्विक प्रभुत्व स्थापित करना चाहते हैं. पिछले कुछ सालों से आयात-निर्यात शुल्क को लेकर बहस, चीन में कार्यरत विदेशी कंपनियों की ओर से आ रही शिकायतें और चीन पर लग रहे तकनीक की चोरी के आरोप, इन सबकी जड़ में असल में यही महत्वाकांक्षा है.

अमेरिका तो बहुत लंबे समय से विश्व का हाई-टेक चैंपियन रहा है. बीते सालों में चीन ने कई तकनीकी क्षेत्रों में बहुत प्रगति की है और कुछ में तो वह अमेरिका से भी आगे निकल चुका है. लेकिन "अमेरिका फर्स्ट" का नारा देने वाले राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप इस प्रगति का कारण चीन के बौद्धिक या व्यापारिक कौशल को नहीं बल्कि अमेरिकी कंपनियों से ज्ञान और तकनीक चुराने को मानते हैं. चीन इससे इनकार करता है. यही कारण है कि दोनों देशों के बीच हो रही बातचीत में यह मुद्दा बातचीत को अटका देता है.

चीन की महत्वाकांक्षी योजना से डर

"मेड इन चाइना 2025" कहलाने वाली चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की एक योजना है. इसका लक्ष्य इस एशियाई महाशक्ति को नई तकनीकों का केंद्र बनाना है. इसमें एयरोस्पेस से लेकर टेलिकम्युनिकेशंस, रोबोटिक्स से लेकर बायोटेक्नोलॉजी और इलेक्ट्रिक गाड़ियों की तकनीक भी शामिल है. साल 2025 तक चीन इन क्षेत्रों में लगने वाले तकनीकी पुर्जों और मैटीरियल के मामले में 70 फीसदी तक आत्मनिर्भर होना चाहता है.

Infografik Auswirkungen Made in China 2025 ENG

कैसा होगा 'मेड इन चाइना 2025' का दूसरे देशों पर असर.

यही योजना अमेरिका को सबसे ज्यादा चिंतित कर रही है. उसे लगता है कि ऐसा हुआ तो अमेरिका चीन के बड़े बाजार को खो देगा. यही कारण है कि जब दोनं देशों को आपसी व्यापारिक समझौतों पर फिर से सहमति बनाने की बात आई तो अमेरिका ने उसे उलझा दिया. हाल ही में जब चीनी प्रधानमंत्री ली केचियांग ने संसद में दिए सालाना भाषण में मेड इन चाइना 2025 का जिक्र नहीं किया, तो विशेषज्ञ चीन के इस योजना को छोड़ने की शंका जताने लगे.

अमेरिका ने चीन को कैसे कैसे रोका

चीनी टेलिकॉम कंपनी हुआवे नेक्स्ट जेनरेशन 5जी वायरलेस तकनीक के मामले में विश्व में अग्रणी बन कर उभरा है. लेकिन अमेरिका उसे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा मानता है और अपने सहयोगी देशों से हुआवे के उपकरणों का इस्तेमाल ना करने की अपील की है. अमेरिका ने आरोप लगाया है कि चीनी उपकरण दुनिया भर में चीनी गुप्तचर सेवा के लिए जासूसी करते हैं.

एक और चीनी कंपनी जेडटीई के इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की बिक्री पर भी अमेरिका ने 2018 में रोक लगा दी थी. अमेरिका ने उस पर ईरान और उत्तर कोरिया पर लगे प्रतिबंधों का उल्लंघन का आरोप लगाया था. करीब 75,000 कर्मचारियों वाली यह कंपनी जब दिवालिया होने की कगार पर पहुंच गई, तब राष्ट्रपति ट्रंप ने अपना फैसला रद्द किया. बदले में कंपनी ने तय किया वह एक अरब डॉलर का जुर्माना भरेगी और अगले 10 सालों तक अमेरिकी एजेंटों को अपने कामकाज पर नजर रखने देगी.

वीडियो देखें 00:42

Trump: 'We're the piggy bank that everybody steals from'

व्यावसायिक और हॉबी ड्रोन बनाने वाली विश्व की नंबर एक कंपनी डीजेआई सन 2006 में चीन के शेंजेन प्रांत में शुरु हुई. इस जगह को चीन में "हार्डवेयर की सिलिकॉन वैली" भी कहा जाता है. दुनिया के 70 फीसदी कमर्शियल ड्रोन यही बनाती है. कैलिफोर्निया स्थित गोप्रो के बाजार से हटने बाद तो इस कंपनी का कोई सीधा प्रतिद्वंद्वी भी नहीं है. इससे चिढ़ कर अमेरिका ने 2017 से पेंटागन में इसके सैन्य इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा दिया. कारण एक बार फिर सुरक्षा चिंताएं बताई गईं.

पेटेंट यानि नई तकनीक पर मिल्कियत

अब भी अमेरिका ही दुनिया में सबसे ज्यादा पेटेंट दर्ज करता है. लेकिन यह स्थिति भी जल्द ही बदल सकती है. वर्ल्ड इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी ऑर्गेनाइजेशन (WIPO) का अनुमान है कि 2020 में ही चीन अमेरिका को इसमें पीछे छोड़ देगा. पेटेंट आवेदनों के आखिरी आंकड़े 2017 में जारी हुए थे, जिसमें दो चीनी कंपनियां, हुआवे और जेडटीई पहले और दूसरे स्थान पर थीं और अमेरिकी कंपनी इंटेल को तीसरा स्थान मिला था.

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में बढ़त हासिल करने के लिए राष्ट्रपति ट्रंप ने बीते साल पेश बजट में पेंटागन के लिए दो अरब डॉलर का प्रावधान करवाया था. वहीं चीन ने घोषणा की है कि 2030 तक वह इस क्षेत्र में 150 अरब डॉलर का निवेश करेगा. यानि अभी तो व्यापारिक और बौद्धिक संपदा की यह जंग काफी लंबी चलने वाली है.

आरपी/एमजे (एएफपी, डीपीए)

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