आउशवित्स का भयानक इतिहास | दुनिया | DW | 27.01.2022

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दुनिया

आउशवित्स का भयानक इतिहास

होलोकॉस्ट रिमेम्बरेंस डे दुनिया भर के लिए नाजी अपराधों की निशानी है. 27 जनवरी को सोवियत आर्मी ने आउशवित्स के कैदियों को आजाद कराया था. उस दौरान जो उन्हें वहां देखने को मिला इंसान कभी उसका अंदाजा नहीं लगा सकता.

दक्षिणी पोलैंड के आउशवित्स में पूर्व यातना शिविर को 1947 में स्मारक बनाए जाने के बाद अब तक ढाई करोड़ से ज्यादा लोग इसे देखने आ चुके हैं. अब इस जगह दुनिया भर से 20 लाख से ज्यादा लोग हर साल आते हैं. क्रकाओ के पश्चिम में करीब 50 किलोमीटर दूर छोटे से नगर आउशविसिम के गेट पर मौजूद नाजी दौर के पूर्व यातना शिविर (कंसंट्रेशन कैंप) का 1945 तक विशाल परिसर मौजूद था. अब यहां एक सरकारी म्यूजियम और स्मारक है.

नाजियों के सेंट्रल एक्सटर्मिनेशन कैंप के अलावा इस परिसर में तीन मुख्य शिविर और अलग अलग आकार के कुछ बाहरी उप शिविर भी थे. यह अकल्पनीय संख्या में लोगों को यातना देने और उन्हें जान से मारने की औद्योगिक व्यवस्था थी. आज यह स्मारक और आउशवित्स बिर्केनाउ म्यूजियम करीब 191 हेक्टेयर में फैला है.

आउशवित्स से जुड़े कुछ ऐतिहासिक तथ्यों पर नजर डालते हैं.

1. आउशवित्स टाउन

जर्मन कंसेंट्रेशन कैंप के रूप में पहचान मिलने से पहले आउशवित्स एक छोटा सा नगर था जिसके इतिहास से जुड़ी कई कहानियां मिलती हैं. इस नगर को यह नाम साल 1200 के आसपास मिला. 1348 में इसे रोमन साम्राज्य के अधीन कर लिया गया और जर्मन यहां की आधिकारिक भाषा बन गई.

कुछ समय तक यह ऑस्ट्रिया के हिस्से में था तो कुछ समय बोहेमिया साम्राज्य या फिर प्रशिया साम्राज्य के अधीन और बाद में यह एक बार फिर पोलैंड के साम्राज्य को वापस मिल गया. पहले विश्वयुद्ध के बाद यह नए पोलिश राज्य का हिस्सा बना. 

19वीं सदी के दूसरे हिस्से में रेलवे क्रॉसिंग बन जाने के बाद आउशवित्स की अर्थव्यवस्था बहुत तेजी से विकसित हुई. आस पास के अपर सिलेसिया और बोहेमिया औद्योगिक क्षेत्रों में काम के लिए आने वाले मौसमी और प्रवासी मजदूरों को रखने के लिए बड़ी संख्या में घरों की जरूरत थी. उन्हें लकड़ी के बने बैरकों और ईंटो के घरों में रखा गया था. यही इमारतें बाद में आउशवित्स नेशनल सोशलिस्ट कंसंट्रेशन कैंप को बनाने का आधार बनीं.

दूसरा विश्वयुद्ध शुरू होने के तुरंत बाद ही सितंबर 1939 में आउशवित्स को जीत कर इसे जर्मन साम्राज्य में मिला लिया गया. 1940 में नाजी सुरक्षा बल एसएस के प्रमुख हाइनरिष हिमलर ज्यादा कुछ किए बगैर ही इस शिविर को कंसेंट्रेशन कैंप में बदलने में कामयाब हो गए जो आउशवित्स वन मेन कैंप कहलाया. आउशवित्स बिर्केनाउ एक्सटर्मिनेशन कैंप यानी आउशवित्स टू जिसे अमेरिका और ब्रिटेन की वायु सेना की ली हुई तस्वीरों में देखा गया, उसे बाद में जोड़ा गया था.

2. यहूदी आबादी

दूसरे विश्वयुद्ध से पहले आउशवित्स के 14,000 निवासियों में से करीब आधे लोग यहूदी थे. यहूदी समुदाय आप्रवासन के कारण काफी तेजी से बढ़ा. इस नगर में जर्मन नस्ल के लोगों की संख्या बहुत कम थी. 1 सितंबर 1939 को हिटलर की सेना वेयरमाख्ट के पोलैंड पर हमले और फिर देश पर सैन्य कब्जे के तुरंत बाद यह स्थिति अचानक से बदल गई.

नाजियों की नस्ली "शुद्धीकरण" की नीति में यहूदियों की आबादी को विस्थापित किया गया ताकि जर्मन लोगों को बसाया जा सके. यहां जो पोलिश यहूदी बचे थे वो शुरुआत में बाकी आबादी से दूर आउशवित्स के पुराने इलाकों में बहुत छोटी छोटी जगहों में सिमट कर रह रहे थे. 1940 के बाद तो उन्हें भी एसएस के लिए सस्ते मजदूरों के रूप में काम करना पड़ा, उन्हीं जगहों पर जो आगे चल कर कंसेंट्रेशन कैंप में बदल गईं.

3. रणनीतिक ठिकाना

आउशवित्स रणनीतिक लिहाज से नाजियों के लिए अहम जगह पर था. यहां का रेलवे स्टेशन प्राग, वियना और बर्लिन, वारसॉ और सिलेसिया के उत्तरी औद्योगिक इलाकों के लिए जंक्शन था. जर्मनी की तथाकथित "आल्टराइष" यानी 1937 की सीमाओं के तहत आने वाले इलाकों से बड़ी संख्या में लोगों को यहां पहुंचाने में आसानी थी. बर्लिन में सुरक्षा बलों के प्रमुख दफ्तर और एसएस के अधिकारियों की यही योजना थी.

एसएस के लेफ्टिनेंट कर्नल अडोल्फ आइखमानवाज को पूर्वी इलाके से लोगों को यहां लाने की जिम्मेदारी दी गई. आइखमानवाज ने ही 20 जनवरी 1942 को हुए वानसी कांफ्रेंस के लिए फाइलें तैयार की. वानसी विला में एसएस और नाजी पार्टी के शीर्ष अधिकारियों की बैठक हुई. ये बैठक राइष मेन सिक्योरिटी ऑफिस के प्रमुख राइनहार्ड हेड्रिष ने बुलाई थी. महज 90 मिनट के बाद इन लोगों ने "यूरोपीय यहूदी सवाल के अंतिम समाधान" के लिए अपनी खूनी योजना बना ली. जिन देशों से यहूदियों को ट्रेन के जरिए यहां लाया जाना था उन सब का नाम मीटिंग के मिनट्स में दर्ज थे.

4. कंसंट्रेशन कैंप सिस्टम

दसाउ, साख्सेनहाउजेन, बुखेनवाल्ड, फ्लोसेनबुर्ग, माउथहाउजेन और रावेन्सब्रुक के वीमेंस कैंप के बाद आउशवित्स सातवां कैंप था जिसे नाजियों ने धीरे धीरे कर स्थापित किया और यह उस वक्त सबसे बड़ा था. आउशवित्स नगर के बाहरी हिस्से में अलग अलग आकार के कई कैंपों की योजना बनी थी. आउशवित्स 1 और आउशवित्स 2 के अलावा यहां छोटे बाहरी कैंप भी थे जैसे कि बुना और मोनोवित्स लेबर कैंप.

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यातना की यादें

वानसी कांफ्रेंस में लिए गए फैसलों के आधार पर ही आउशवित्स को 1942 में बड़ी संख्या में लोगों की हत्या के लिए डेथ फैक्टरी के रूप में तब्दील कर दिया गया. आउशवित्स कंसेंनट्रेशन एंड एक्सटर्मिनेशन कैंप के एसएस कमांडेंट रुडोल्फ होएस वहां के गार्डों और कैंप के पूरे प्रशासन के इंचार्ज थे और सामूहिक हत्याओं के लिए जिम्मेदार भी. नवंबर 1943 में होएस की जगह किसी और ने ली.

5. एसएस का प्रभाव क्षेत्र

1942 के वसंत के आते आते एसएस के 2000 सिक्योरिटी गार्डों की आउशवित्स में तैनाती हो चुकी थी. शुरुआत में केवल जर्मन नागरिकों को ही कंसंट्रेशन कैंप में काम पर लगाया गया लेकिन बाद में दूसरे देशों के लोग भी स्टाफ के रूप में शामिल हुए.

1944 में गर्मियों के खत्म होने तक एसएस के 4000 के सदस्यों ने आउशवित्स को अपनी सेवाएं दे दी थीं. इनमें कैंप के गार्ड, टाइपिस्ट या नर्सें भी शामिल थीं जिन्हें एसएस ने काम पर तो रखा था लेकिन ये लोग अपने रैंक के बैज नहीं पहनते थे.

एसएस ने स्थानीय कंपनियों और कारीगरों को भी नियंत्रित किया जिन्हें कैंप के विस्तार से फायदा हुआ और वे वहीं बस गये. एसएस की तथाकथित बस्तियां जो कैंप की सीमाओं पर विकसित हुईं वो यहां रहने वालों को हर तरह की सुविधा मुहैया कराती थीं.

6. डेथ फैक्ट्री

1943 के वसंत में आउशवित्स बिर्केनाउ के परिसर में अतिरिक्त अवन लगाए गए. एसएस ने उनके कामकाज का परीक्षण यहां लाए गए कैदियों पर किया. जिकलॉन बी से भरे गैस चेंबरों में ठूंस कर मारने के बाद 1,100 आदमी, औरत और बच्चों के शव जला कर उनकी राख आस पास के झीलों में बहा दी गई. यही हाल कंसेंट्रेशन कैंप के बाकी कैदियों और लोगों का भी होना था.

कैंप के कंसट्रक्शन मैनेजर एसएस लेफ्टिनेंट कर्नल कार्ल बिशॉफ ने बर्लिन को रिपोर्ट किया, "अब 24 घंटे के भीतर कुल 4,756 शवों का अंतिम संस्कार किया जा सकता है." बिर्केनाउ में तीन ट्रैक वाला रेलरोड रैंप बनाया गया ताकि यहां आने वाले कैदियों की जल्दी से छांटा जा सके. यह रैंप मेमोरियल में आज भी मौजूद है. यहां आने वाले दो तिहाई से ज्यादा कैदियों को तो बिना नाम दर्ज किये ही सीधे गैस चैंबर में भेज कर मार दिया जाता.

पूरे यूरोप से आखिरी बार यहूदियों को आउशवित्स 1944 में पतझड़ का मौसम खत्म होने के समय लाया गया था. इनमें नाजी कब्जे वाले नीदरलैंड्स की 15 साल की एन फ्रैंक भी थीं. उनकी डायरियां जो संयोग से सुरक्षित बच गई थीं वो नाजियों के हाथ यहूदियों के दमन का अमिट दस्तावेज हैं.

7. पीड़ितों की संख्या

आउशवित्स में होलोकॉस्ट के पीड़ितों की संख्या आज भी आखिरी रुप से तय नहीं है. इतिहास और परिवारों के अभिलेखों से नए नए आंकड़ों के आने का सिलसिला अब भी जारी है.

यह मुमकिन है कि हम कभी भी पीड़ितों की सही संख्या ना जान पाएं लेकिन ऐसा अनुमान है कि करीब 50 लाख लोगों को नाजी कंसंट्रेशन कैंपों में भेजा गया था. इनमें से बहुत थोड़े से लोग ही जिंदा बच पाए.

एक रिसर्च प्रोजेक्ट के जरिए आउशवित्स के नाजी जर्मन डेथ कैंप में दर्ज 4 लाख कैदियों में से करीब 60 फीसदी से ज्यादा के नाम हासिल हो गए. यह रिसर्च प्रोजेक्ट आउशवित्स मेमोरियल ने कमीशन की थी और इसकी रिपोर्ट दिसंबर 2019 में प्रकाशित हुई.

इस डाटाबेस में उन 9 लाख यहूदियों के नाम नहीं हैं जिन्हें नाजी जर्मनी के कब्जे वाले यूरोपीय इलाकों से बड़ी संख्या में भेजा गया. इन लोगों को कैंप में पहुंचने के तुरंत बाद बिना नाम दर्ज किए ही गैस चेंबरों में डाल कर उनकी हत्या कर दी गई. डिपोर्टेशन की सूचियों से भी उनकी पहचान नहीं की जा सकी.

आउशवित्स बिर्केनाउ में आने के बाद सिर्फ उन लोगों के नाम दर्ज किए जाते जो फैक्टरी में काम करने के लिए शारीरिक रूप से स्वस्थ होते. उनके शरीर पर एक टैटू बना कर उस पर कैदी नंबर डाल दिया जाता. ज्यादातर लोग जिनमें बूढ़े, बीमार, महिलाएं और बच्चे या वो लोग शामिल थे जिनका नाम पहले से दर्ज नहीं है उन्हें सीधे गैस चैंबर में डाल कर मार दिया जाता.

आउशवित्स मेमोरियल के मुताबिक आउशवित्स बिर्केनाउ में करीब 11 लाख लोगों की हत्या की गई. इनमें 90 फीसदी लोग यहूदी थे. इन्हें मुख्य रूप से हंगरी, पोलैंड, इटली, बेल्जियम, फ्रांस, नीदरलैंड्स, ग्रीस, क्रोएशिया, ऑस्ट्रिया और जर्मनी से यहां लाया गया था. नाजियों के निशाने पर इनके अलावा सिंती और रोमा, समलैंगिक, कैथोलिक, जेहोवा के गवाह और विकलांग लोग भी थे.

8. कैदियों की आजादी

27 जनवरी 1945 को सोवियत रेड आर्मी के सैनिक कैंप के कांटेदार बाड़ तक पहुंच गए. यहां उन्हें 7,000 कैदी मिले जो बहुत ज्यादा बीमार, कमजोर और बुरी हालत में थे. इनमें 500 बच्चे भी थे. इनमें ज्यादातर खड़े होने की हालत में भी नहीं थे और जमीन पर बिना किसी हरकत के पड़े हुए थे.

ये वो लोग थे जो एसएस के डेथ मार्च के लायक भी नहीं बचे थे. एसएस के गार्ड दसियों हजार लोगों को जबरन अपने साथ कड़ाके की सर्दी में पश्चिम की ओर ले गए थे. इसी को डेथ मार्च कहा जाता है.

एसएस ने अपनी सामूहिक हत्याओं को छिपाने के लिए इन कैंपों को आखिरी समय में खाली कर दिया था. उन्होंने दस्तावेजों, फाइलों और डेथ सर्टिफिकेट जला दिए. केवल कुछ दस्तावेज और तस्वीर ही सुरक्षित बच पाए थे. ज्यादातर बैरकों, गैस चैंम्बरों और शवदाह केंद्रों को भी नष्ट कर दिया गया था.

डेथ मार्च पर गए ज्यादातर कैदियों ने केवल पतले सूती कपड़े पहने हुए थे और शायद ही उनमें से किसी के पैरों में जूते थे. डेथ मार्च पर गए कैदियों में से करीप एक चौथाई तो भूख और ठंड से मर गए या फिर उन्हें गोली मार दी गई.

9. आउशवित्स बिर्केनाउ मेमोरियल

1946 की शुरुआत में सोवियत सेनाओं ने कैंप की जगह को पोलैंड के अधिकार में दे दिया. पूर्व कैदियों और पोलिश सरकार की पहल पर 1947 में आउशवित्स बिर्केनाउ स्टेट म्यूजियम की स्थापना हुई और इसे स्मारक बनाया गया.

मेमोरियल में संरक्षित की गईं मुख्य नाजी कंसंट्रेशन कैंप की इमारतें, बैरक और आउशवित्स बिर्केनाउ एक्सटर्मिनेशन कैंप की खाली जगह के साथ ही मौजूदा म्यूजियम का इलाका शामिल है. यहां पहली प्रदर्शन इस्राएल के वर्ल्ड होलोकॉस्ट रिमेम्बरेंस सेंटर याद वाशेम के सहयोग से लगाई गई थी.

मेमोरियल बनने के बाद पहले साल में करीब 170,000 लोग इसे देखने यहां आए. 2018-19 में 20 लाख से ज्यादा लोग यहां आए इनमें से कई स्कूलों के ग्रुप भी थे. आउशवित्स को यूनेस्को ने वर्ल्ड हेरिटेज साइट 1979 में घोषित किया.

10. आखिरी कैदी

हर साल 27 जनवरी को आउशवित्स कंसेंट्रेशन कैंप की आजादी के दिन के रूप में मनाया जाता है. इस दिन जर्मनी की संसद में भी खास कार्यक्रम होता है.

बीते सालों में जर्मन राष्ट्रपति, यूरोपीय नेताओं के साथ ही होलोकॉस्ट के बाद जिंदा बचे लोगों ने इस मौके पर भावुक भाषण दिए हैं. इनमें रुथ क्लुगर, अनीता लास्कर-वालफिश के साथ ही मशहूर यहूदी लेखर और इतिहासकार जैसे कि मार्सेल राइष रानिकी और जाउल फ्रीडलेंडर शामिल हैं.

2005 से इंटरनेशनल होलोकॉस्ट रिमेम्बरेंस डे पूरी दुनिया में मनाया जाता है.

इस बीच अब आउशवित्स कंसंट्रेशन कैंप के बहुत थोड़े लोग ही जिंदा बचे हैं. सालाना 'मार्च ऑफ द लिविंग' के मौके पर ये लोग दुनिया भर के युवाओं के हाथ में हाथ डाल कर आउशवित्स से बिर्केनाउ तक चलते हैं. बहुत जल्द अब ये ना सिर्फ यहूदी परिवारों बल्कि दूसरे लोगों की नई पीढ़ियों के हाथ में होगा कि वे इस स्मृति को लेकर कहां जाते हैं.

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