आईएस की हार के बाद भी क्या बच सकेंगे यजीदी? | दुनिया | DW | 05.03.2019
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दुनिया

आईएस की हार के बाद भी क्या बच सकेंगे यजीदी?

आईएस की सत्ता इराक और सीरिया से अब खिसकने लगी है. लेकिन इसके बावजूद अल्पसंख्यक यजीदियों का बचना एक पहेली बना हुआ है.

तस्वीर में नजर आ रही इस 38 साल की इस यजीदी महिला का नाम है बसेह हम्मो. बलात्कार और हिंसा पीड़ित हम्मो आतंकवादी संगठन आईएसआईएस की कैद से बची यह एक ऐसी महिला है जिन्हें तकरीबन 17 बार बेचा गया. खरीद-फरोख्त के इस सिलसिले के चलते उन्हें आईएस के कब्जे में उत्तरी इराक और सीरिया के कई शहरों में ले जाया गया. इसी दौरान जब जनवरी 2019 के अंत में सीरियाई गांव बागोज पहुंची तो आईएस के एक सदस्य को उस पर दया आ गई. उस सदस्य ने अपने परिवार के साथ हम्मो को ट्रक पर बिठाकर गांव से रवाना कर दिया. इसके बाद उसे आईएस के खिलाफ अमेरिकी नेतृत्व में लड़ रही सीरियाई कुर्दिश टुकड़ी ने उन्हें पकड़ लिया और कुछ दिन बाद उन्हें इराक पहुंची अपनी दो बहनों से मिला दिया.

 

अल्पसंख्यक यजीदी समुदाय के लाखों लोग अब भी गायब हैं. करीब पांच साल पहले आईएस ने इराक के सिंजार क्षेत्र में बसे यजीदी गांवों और कस्बों में रहने वाली महिलाओं और बच्चों को अपहरण कर लिया था. सिंजार लगभग पूरी तरह तबाह हो गया. आईएस, यजीदी महिलाओं को सेक्स गुलाम बना कर रखता और बच्चों को जिहादी विचारधारा सिखाता था.

जब अमेरिकी नेतृत्व वाली सेनाओं ने बागोज पर हमला किया तो अब तक लापता तीन हजार यजीदियों में से कुछ के मिलने की उम्मीद बढ़ गई थी. लेकिन इस छोटे से गांव में जो हजारों लोग हमले के बाद बचाए जा सके उनमें से कुछ ही यजीदी थे. इराक की स्थानीय कुर्दिश सरकार के भीतर यजीदी बचाव ब्यूरो चलाने वाले हुसैन कारो कहते हैं कि अब तक सिर्फ 47 यजीदी ही बचाए जा सके हैं.

अब जब अमेरिकी नेतृत्व वाली सेनाओं ने बागोज पर अपना निर्णायक हमला बोल दिया है तो हम्मो और फरहा फरमान जैसी बचाई गई यजीदी महिलाओं का दिल भी बैठने लगा है. उन्हें लगता है कि अब कई तो कभी वापस घर नहीं लौट सकते. उन्होंने बताया कि आईएस लड़ाकों के बच्चे पैदा करने वाली मांएं अब बच्चे छोड़ कर आने को तैयार नहीं हैं, वहीं कुछ लोगों ने जिहादी विचारधारा को अपना लिया है. वहीं कुछ ऐसे भी हैं जो अब भी भागने की कोशिश से डरते हैं.

अपनी गुलामी की जिंदगी याद करके हम्मो कहती हैं कि उनके दिन दर्द और अकेलेपन से भरे रहते थे. उसका एक मालिक हम्मो को लड़ाई पर जाते वक्त घर के अंदर कैद कर देता. वहीं जब उसने अपने एक अल्बानी मूल के मालिक को नौ साल की गुलाम लड़की को खरीदने पर डांटा तो उस आदमी ने उसके हाथों को सेना के जूते पहन कर कुचल दिया.

हम्मो बताती है कि उसकी कैद के आखिरी महीनों में जब आईएस की सत्ता खिसक रही थी तो भूख और प्यास ने सबको वहां जकड़ लिया था. ब्रेड मिलना कम हो गया था और उसने जानवरों की घास फूस खाकर ही खुद को जिंदा रखना शुरू कर दिया. वह बताती हैं, "मैंने कुछ भी सोचना छोड़ दिया था, बस हरा देखकर खा लेती थी."

हम्मो की तरह 21 साल की फरमान भी आईएस के चुंगल से बचकर निकली है. फरवरी 2019 में वह अपनी बहन और अपने रिश्तेदारों से मिल सकी. अपनी रिहाई के बावजूद भी दोनों के गम कम होने का नाम नहीं ले रहे हैं. उन्हें लगता है कि आईएस पर हो रहे हमले वहां कैद गुलाम यजीदियों को भी मार डालेंगे.

एए/ओएसजे (एपी)

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