आईएस कट्टरपंथियों में सबसे ज्यादा ब्रिटिश | दुनिया | DW | 22.08.2014
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दुनिया

आईएस कट्टरपंथियों में सबसे ज्यादा ब्रिटिश

पत्रकार जेम्स फोली की हत्या करने वाला लड़ाका शायद ब्रिटिश हो सकता है, इस आशंका ने एक कड़वे सच पर रोशनी डाली है. ब्रिटेन यूरोप से आईएस कट्टरपंथियों का अहम स्रोत कैसे बन गया? डीडबल्यू का विश्लेषण.

इराक और सीरिया में इस्लामिक खिलाफत के नाम पर जो लड़ाई की जा रही है, उसने इलाके को हिला कर रख दिया है और दुनिया को हैरान कर दिया है. इसमें जेम्स फोली की क्रूर तरीके से की गई हत्या भी शामिल है. वैसे तो हत्यारा काले मास्क के पीछे छिपा हुआ था लेकिन उसके बोलने के अंदाज से माना जा रहा है कि वह ब्रिटिश था.

लड़ाई के लिए सीरिया और इराक जाने वाले और इस्लामिक स्टेट के कट्टरपंथियों से जुड़ने वाले लोगों में ब्रिटिश नागरिकों की संख्या 500 के करीब है. यानि विदेशी लड़ाकों में सबसे ज्यादा संख्या ब्रिटेन के ही नागरिकों की हैं. लेकिन ऐसा क्या हो रहा है कि ब्रिटेन के इतने सारे युवा अपना नाम और जीवन आईएस के लिए दे रहे हैं, जबकि इतनी बड़ी संख्या बाकी किसी यूरोपीय देश की नहीं है.

पढ़े लिखे लोग

रैडिकलाइजेशन रिसर्च प्रोजेक्ट के लिए लैंकेस्टर यूनिवर्सिटी में काम करने वाले मैथ्यू फ्रांसिस कहते हैं कि एक आम कारण खोजना मुश्किल है. और भूगोल, शिक्षा या प्रभाव जैसे संकेतों को देखने का कोई मतलब नहीं है. वह कहते हैं, "वो पूरे ब्रिटेन से आते हैं और अधिकतर पढ़े लिखे लोग हैं जो यूनिवर्सिटी भी गए हैं. हम कार्डिफ के एक व्यक्ति को जानते हैं जो भविष्य में ब्रिटेन का प्रधानमंत्री बनना चाहता है."

फ्रांसिस बताते हैं कि विदेशी लड़ाकों को बुलाना सही हालात पैदा करने से जुड़ा हुआ है. यानि लोगों को पहले ऐसा विश्वास दिलाना कि वह एक ऐसे अंतरराष्ट्रीय समुदाय का हिस्सा हैं जो खतरे में है. फ्रांसिस के मुताबिक, "जब पश्चिमी सरकारें फ्री सीरियाई आर्मी को हथियार देने में नाकाम हो जाती हैं तो मामला पश्चिम बनाम मुस्लिम में तब्दील हो जाता है, और यही हमने ताजा वीडियो में सुना."

कमजोरी की तलाश

किलियाम फाउंडेशन की एरिन मारी साल्टमन जिहाद ट्रेंडिंग नाम की रिपोर्ट के लेखकों में एक हैं. वह कहती हैं कि सामान्यीकरण कर देने की एक प्रवृत्ति है. कई तथ्य हैं जो युवाओं को कट्टरपंथी गुटों में ले जा जाते हैं, जबकि महिलाएं कम जाती हैं. साल्टमन कहती हैं, "इनका लक्ष्य युवक हैं और अधिकतर मुस्लिम आप्रवासियों की दूसरी या तीसरी पीढ़ी से जुड़ाव है. लेकिन फिर भी ऐसे भी मामले हैं जिसमें कोई इस्लामी पृष्ठभूमि नहीं है और लोगों ने धर्मांतरण किया है."

साल्टमन कहती हैं कि अधिकतर लोग कुछ खास महसूस करना चाहते हैं. और कट्टरपंथी इस्लामी गुट उनकी इस इच्छा और निराशा का फायदा उठाते हैं, "वह इस पर खेलते हैं. और अपने मजबूत ग्रुप में लोगों को शामिल होने के लिए बुलाते हैं. रोमांच का वादा करते हैं और दुनिया बदल डालने का मौका देते हैं." इन लोगों को यूनिवर्सिटी या फिर जेल से लिया जाता है. इसमें निश्चित ही सोशल मीडिया का बड़ा हाथ है क्योंकि इसके जरिए युवा कट्टरपंथियों से सीधे संपर्क साध सकते हैं.

एक ऐसी मजबूत बहस की भी कमी है जो कहे कि इस्लामिक स्टेट क्यों अच्छा गुट नहीं है. कि वो जो सीखा रहे हैं, वह इस्लाम का संदेश नहीं है और क्यों यह सामाजिक तौर पर गलत है. जब तक धार्मिक नेता और एक्टिविस्ट इस संदेश के साथ आगे नहीं आते, इसे रोकना मुश्किल होगा.

रिपोर्टः तमसिन वॉकर/एएम

संपादनः महेश झा

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