आईएएस भी निकले हैं यूपी के मदरसों से | दुनिया | DW | 03.07.2015
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दुनिया

आईएएस भी निकले हैं यूपी के मदरसों से

यूपी के सरकारी मदरसों में भ्रष्टाचार की खबरें आम हैं और इस समय करीब सौ मदरसों की मान्यता समाप्त करने की कार्रवाई चल रही है. यूपी मदरसा शिक्षा बोर्ड की परीक्षाओं में खुले आम नकल पर भी सरकार कार्रवाई कर चुकी है.

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अफगानिस्तान का एक मदरसा

यूपी से सटे करीब 550 किलोमीटर लम्बे नेपाल बार्डर वाले यूपी के इलाकों में पनप गए हजारों मदरसों को लेकर बवाल फिलहाल शांत है लेकिन यूपी की राजनीति का यह स्थायी भाव रहा है. नब्बे के दशक के मध्य में लखनऊ में दारुल उलूम 'नदवा' में आतंकियों की तलाश में एटीएस के छापे से माहौल बहुत गरमाया था. बीजेपी सरकार में नेपाल से सटे इलाकों के मदरसों की जांच के आदेश से भी बहुत बवाल मचा था. आजमगढ़ के मदरसों से आतंकी गतिविधयों के आरोप में सैकड़ों युवकों की गिरफ्तारियों के बाद चले आंदोलन से तो एक सियासी पार्टी ने ही जन्म ले लिया.

लेकिन यूपी के एक मदरसे से निकले वसीमुर्रहमान आईएएस बन गए तो उबैद कुरैशी एमबीबीएस डॉक्टर. करीब आधा दर्जन मदरसा छात्र भारतीय प्रशासनिक सेवाओं में हैं तो कई न्यायिक सेवा में. हकीमी तो पूरे प्रदेश में इन्होंने ही संभाल रखी है. सरकार इनके लिए बीयूएमएस का कोर्स भी चलाती है. सरकार से मान्यता प्राप्त मदरसों की संख्या यूपी में 5000 पार कर चुकी है इनमें से 466 मदरसे सरकारी अनुदान की सूची में शामिल हैं. यानी इन मदरसों के टीचरों की तन्ख्वाह सरकार देती है. कक्षा पांच तक के मदरसों को तहतानिया, आठ तक फुरकानिया, हाई स्कूल स्तर तक आलिया और इसके ऊपर उच्च आलिया के मदरसों को यूपी सरकार पहले मान्यता देती है फिर ग्रांट.

अनवर जलालपुरी जब यूपी मदरसा बोर्ड के अध्यक्ष थे तो मदरसों के सिलेबस को आधुनिक बनाने की बहुत कोशिश हुई, पर हालत सुधरी नहीं. कहीं किताबें नहीं पहुंच पाती हैं तो कहीं ग्रांट. ऑल इंडिया टीचर्स एसोसिएशन ऑफ मदारिसे अरबिया के प्रदेश प्रवक्ता अब्दुल्ला बुखारी का मानना है कि महाराष्ट्र सरकार के फैसले का प्रतिकूल असर यूपी के मदरसों पर भी पड़ेगा. यूपी के मदरसों के बारे में अब्दुल्लाह का कहना है कि सरकार मदरसों पर कम तवज्जो देती है उनका कहना है कि लखनऊ की ख्वाजा मोइनुददीन चिश्ती उर्दू अरबी, फारसी यूनिवर्सिटी में भी मदरसों की डिग्रियां मान्य नहीं हैं जबकि यूपी मदरसा बोर्ड हाई स्कूल स्तर पर फारसी में मुंशी और अरबी में मौलवी की डिग्री प्रदान करता है. बीए स्तर की कामिल और एमए स्तर की डिग्री फाजिल निर्गत करता है. हर साल करीब 20 हजार छात्र इन परीक्षाओं में बैठते हैं.

आधुनिक भारत का पहला मदरसा यूपी के देवबंद में 1866 में कायम हुआ. लेकिन उससे पहले ही लखनऊ में फिरंगी महल की स्थापना औरंगजेब के जमाने में ही हो चुकी थी. इसी के पाठ्यक्रम दर्से निजामिया को दारुल उलूम ने भी स्वीकारा जो आज भी वहां लागू है. देवबंद के बाद 1894 में लखनऊ में नदवा कायम किया गया. देवबंद मदरसा तो बाद में एक विचारधारा में बदल गया और फिलहाल कई अरब देशों में देवबंदी विचारधारा काफी लोकप्रिय है. यह वो प्रतिष्ठित मदरसे हैं जो सरकार से एक पैसे की भी आर्थिक मदद नहीं लेते. इनमें से देवबंद का बजट 40-45 करोड़ और नदवा का करीब 20 करोड़ सालाना है. इन दोनों मदरसों में इस्लामी शिक्षा के साथ आधुनिक शिक्षा का बेहतरीन इंतजाम है. यूपी ही नहीं दिल्ली के भी माहद, शाह वलीउल्लाह, रियाजुल उलूम जैसे मदरसे सरकारी इमदाद नहीं लेते हैं और सफलता पूर्वक चल रहे हैं. धनवान मुसलमानों के चंदे और हर साल निकलने वाली जकात से इन मदरसों का संचालन होता है.

लेकिन मदरसों का काम इस्लाम धर्म के प्रचार प्रसार का ही है. इनमें मौलवी तैयार किए जाते हैं जो मस्जिदों में नमाज पढ़ाते हैं और मुसलमानों की आसमानी किताब कुरान में लिखी आयतों का मतलब बयान करना होता है. लेकिन लखनऊ का ही एक मदरसा है सुलतानुल मदारिस, कैफी आजमी इसी मदरसे से निकले और इप्टा तथा प्रगतिशील लेखक संघ के सक्रिय स्तंभ रहे. मजरूह सुलतानपुरी भी मदरसे के पढ़े थे.

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