अहम है सुषमा स्वराज की पाक यात्रा | ब्लॉग | DW | 09.12.2015
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ब्लॉग

अहम है सुषमा स्वराज की पाक यात्रा

यूं तो विदेश मंत्री सुषमा स्वराज अफगानिस्तान पर होने जा रहे एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में भाग लेने इस्लामाबाद गई हैं, लेकिन भारत और पाकिस्तान के तनावपूर्ण और जटिल संबंधों के मद्देनजर उनकी इस यात्रा का महत्व स्पष्ट है.

दरअसल भारत और पाकिस्तान के बीच संबंध सामान्य बनाने के नाम पर अधिकतर कदमताल ही होती रहती है और अक्सर थोड़े-थोड़े दिनों के बाद वह भी रुक जाती है. इसलिए जब भी फिर से सार्थक संवाद की संभावना बनती है, तब दोनों देशों में अतिशय उत्साह और उम्मीदें जाग उठती हैं. और, जब इन उम्मीदों पर पानी फिर जाता है, तब एक बार फिर परस्पर शत्रुता और विद्वेष का दौर शुरू हो जाता है. फिर भी, दोनों देशों के सभी शांतिकामी लोग यही आशा करते हैं कि एक बार संवाद शुरू होने के बाद बंद न हो और उसके ठोस और स्थायी परिणाम निकलें.

यह एक हकीकत है कि युद्ध की परिणति भी अंततः वार्ता की मेज पर ही होती है. जिन दिनों अमेरिका और सोवियत संघ के बीच शीत युद्ध अपने चरम पर था, और जब अफगानिस्तान में अमेरिका मुजाहिदीन के जरिए सोवियत संघ के खिलाफ बाकायदा युद्ध लड़ रहा था, तब भी दोनों देशों के बीच संवाद के दरवाजे खुले थे. आज भी रूस और तुर्की एक दूसरे के साथ सतत संवाद चलाये हुए हैं. इसलिए तनाव और शत्रुता के बावजूद संवाद का दरवाजा बंद कर देना अंतरराष्ट्रीय राजनय में अच्छी निगाह से नहीं देखा जाता. इसीलिए जब भी भारत और पाकिस्तान के बीच संवादहीनता की स्थिति पैदा होती है, तब दोनों देशों पर उसे समाप्त करने के लिए अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाया जाता है.

दरअसल इस समस्या का एक बहुत बड़ा कारण पाकिस्तान के सत्ता प्रतिष्ठान की संरचना में निहित है. पाकिस्तान की विदेश और रक्षा नीति पर वहां की सेना का लगभग एकाधिकार है और उसे तय करने में नागरिक सरकार की कोई खास भूमिका नहीं रहती. अमेरिका जैसे देश के वरिष्ठ मंत्री भी जब इस्लामाबाद जाते हैं, तो वे इस हकीकत के मद्देनजर वहां के सेनाध्यक्ष और अन्य वरिष्ठ जनरलों से जरूर मिलते हैं. लेकिन भारत ने अभी तक यही नीति अपनाई हुई है कि वह सरकार से ही बात करता है, सेना से नहीं. इसीलिए जब भी वहां निर्वाचित सरकार होती है, तब आशा के विपरीत दोनों देशों के संबंधों में गतिरोध ही बना रहता है.

यह गतिरोध टूटने की दिशा में 2003 और 2008 के बीच महत्वपूर्ण प्रगति हुई थी क्योंकि तब पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ थे. 2007 के बाद से अपने देश में उनकी राजनीतिक साख गिरने लगी थी और जब 26 नवंबर, 2008 को मुंबई पर आतंकवादी हमले हुए, उसके बाद यह प्रक्रिया रुक गई. इसके पहले भी 1999 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की ऐतिहासिक बस यात्रा के बाद कारगिल का युद्ध हुआ था क्योंकि सेना प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और वाजपेयी के बीच बनी समझदारी के खिलाफ थी.

नवाज शरीफ के वर्तमान कार्यकाल के दौरान भी कमोबेश गतिरोध बना रहा लेकिन अब उसके टूटने की स्थिति इसलिए पैदा हो गई क्योंकि सेना से अवकाशप्राप्त करने के कुछ ही दिनों के भीतर लेफ्टिनेंट जनरल नसीर अहमद जंजुआ सरताज अजीज की जगह राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बन गए हैं. इसके बाद ही उनके और भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल के बीच पर्दे के पीछे संपर्क कायम हुआ जिसकी परिणति पिछले दिनों बैंकाक में दोनों देशों के बीच वार्ता में हुई जिसमें डोभाल और जंजुआ के अलावा दोनों देशों के विदेश सचिव और भारतीय खुफिया ब्यूरो के पूर्व निदेशक और आतंकवादनिरोध के मसले पर प्रधानमंत्री के विशेष दूत आसिफ इब्राहीम भी शामिल थे.

क्योंकि पाकिस्तान की जिद थी कि कश्मीर पर भी बात हो, और उस पर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के स्तर पर संवाद बेमानी होता, इसलिए विदेश सचिवों को बातचीत में शामिल किया गया. हालांकि पिछले अगस्त में ही सुषमा स्वराज ने एक प्रश्न के जवाब में दो-टूक ढंग से कहा था कि भारत और पाकिस्तान के बीच किसी तीसरे देश में वार्ता नहीं होगी, लेकिन इसके बावजूद बैंकाक में वार्ता हुई और उसके सकारात्मक परिणाम निकले. यानी अब मनमोहन सिंह सरकार की तरह ही नरेंद्र मोदी सरकार को भी यह एहसास हो गया है कि इस जिद पर अड़े रहने का कोई फायदा नहीं है कि जब तक पाकिस्तान आतंकवाद को समर्थन देना बंद नहीं करता, तब तक उसके साथ कोई बातचीत नहीं हो सकती या कि यदि वह हुर्रियत नेताओं से सलाह-मशविरा करता है तो उसके साथ बातचीत तोड़ दी जाएगी.

अगले साल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सार्क शिखर सम्मेलन में भाग लेने इस्लामाबाद जाना है. यदि अगले छह महीनों के दौरान संवाद की प्रक्रिया आगे बढ़ी और मजबूत बनी, तो उनकी यात्रा सही अर्थों में ऐतिहासिक सिद्ध हो सकती है और उसके दूरगामी परिणाम निकल सकते हैं.

ब्लॉग: कुलदीप कुमार

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