असम में बीजेपी की वापसी, लेकिन बंगाल में ममता की हैट्रिक, अपनी सीट ′हारीं′ | भारत | DW | 02.05.2021

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भारत

असम में बीजेपी की वापसी, लेकिन बंगाल में ममता की हैट्रिक, अपनी सीट 'हारीं'

विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने असम में अपनी सरकार बचा ली, लेकिन पश्चिम बंगाल में उसे करारा झटका लगा है. यहां ममता बनर्जी के नेतृत्व में टीएमसी ने विशाल बहुमत हासिल कर सत्ता की हैट्रिक लगाई है. प्रधानमंत्री मोदी ने दी बधाई.

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पूर्व मेदिनीपुर जिले की नंदीग्राम सीट पर कभी अपने करीबी रहे बीजेपी उम्मीदवार शुभेंदु अधिकारी से करीब 16 सौ वोटों के अंतर से हार गई हैं. लेकिन परिणामों की घोषणा पर रोक लगा दी गई. मुख्य चुनाव अधिकारी आरिज आफताब ने कहा है कि वोटों की गिनती दोबारा हो सकती है. इसका फैसला रिटर्निंग अफसर लेंगे. ममता बनर्जी की जीत हार पर भले ही संशय बना हो, स्वयं मुख्यमंत्री ने हार मान ली है लेकिन धार्मिक आधार पर हुए जबरदस्त ध्रुवीकरण का खामियाजा बीजेपी को भुगतना पड़ा और वह तीन अंकों तक भी नहीं पहुंच सकी. इस चुनाव में लेफ्ट-कांग्रेस और आईएसएफ गठबंधन का लगभग सफाया हो गया है.

पश्चिम बंगाल

पश्चिम बंगाल की सत्ता हासिल करने के लिए बीजेपी अबकी पूरी ताकत के साथ विधानसभा चुनाव में उतरी थी. उसने नारा दिया था - अबकी बार दो सौ पार. लेकिन वह सौ तक भी नहीं पहुंच सकी. चुनाव नतीजों को पार्टी के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है. टीएमसी की जीत में ममता के प्रति महिला वोटरों में भारी समर्थन और लेफ्ट और कांग्रेस को वोटरों का उसके खेमे में आना प्रमुख वजहें हैं. इसके अलावा नंदीग्राम में चोट के बाद ममता ने जिस तरह व्हीलचेयर के सहारे ही चुनावी रैलियां और रोड शो किए, बीजेपी की हिंदुत्व और जात-पांत की राजनीति के खिलाफ जिस तरह लगातार अभियान चलाया और तेल व गैस की बढ़ती कीमतों के साथ राज्य में कोरोना संक्रमण के लिए जिस तरह बीजेपी नेताओं को जिम्मेदार ठहराया, उसने टीएमसी की जीत में अहम भूमिका निभाई है.

लेकिन टीएमसी की भारी जीत के बावजूद खुद ममता बनर्जी नंदीग्राम सीट पर चुनाव हार गई हैं. उन्होंने पत्रकारों से कहा, "नंदीग्राम का फैसला मुझे मंजूर है. लेकिन गिनती में घपला होने का संदेह है. मैं अदालत में जाऊंगी." लेकिन सबसे पहले वोटों की गिनती फिर से कराए जाने का फैसला रिटर्निंग अफसर करेंगे.

Indien, Kalkutta | Parlamentswahlen Mamata Banerjee

चुनाव प्रचार करतीं ममता बनर्जी

ध्रुवीकरण से तृणमूल को फायदा

बीजेपी ने ममता पर अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण का आरोप लगाते हुए धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण का प्रयास किया. लेकिन उसका नतीजा यह रहा कि ज्यादातर सीटों पर मुकाबला सीधा हो गया और हाशिए पर रहने वाले या लेफ्ट और कांग्रेस के वोटरों ने टीएमसी का समर्थन करना पसंद किया. इसके साथ ही जातिगत पहचान की राजनीति के तहत बीजेपी ने मतुआ, अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति को लोगों को लुभाने के लिए अपने घोषणापत्र में जो वादे किए उनका इस तबके पर कोई असर नहीं नजर आया. ममता ने चुनाव आयोग पर भी बीजेपी के इशारों पर काम करने का आरोप लगाया और बार-बार आखिरी कुछ चरणों के चुनाव एक साथ कराने की अपील करती रहीं. इससे विपत्ति के समय आम लोगों के साथ खड़ी रहने वाली नेता के तौर पर उनकी छवि और मजबूत हुई.

चुनाव अभियान के दौरान बीजेपी के नेता खासकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिस तरह दीदी-दीदी कह कर ममता बनर्जी की खिल्ली उड़ाते रहे उसका राज्य के वोटरों पर प्रतिकूल असर पड़ा. बीजेपी की ऐसी रणनीति की वजह से खासकर हाशिए पर रहने वाले वोटरों ने उसके खिलाफ टीएमसी का समर्थन किया. मालदा और मुर्शिदाबाद जिलों को कांग्रेस का गढ़ माना जाता था. लेकिन वहां टीएमसी को जैसी कामयाबी मिली है उससे साफ है कि कांग्रेस के अलावा लेफ्ट के वोटरों ने भी अबकी बीजेपी से मुकाबले के लिए ममता का साथ दिया है.

Indien Wahlen in Westbengalen

भाजपा को नेताओं की कमी

बीजेपी की मुश्किलें

वर्ष 2019 के लोकसभा चुनावों में 121 विधानसभा क्षेत्रों में मिली बढ़त के आधार पर भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने अबकी बार दो सौ पार के नारे के साथ बंगाल जीतने की रणनीति तो बना ली थी. लेकिन इस रणनीति को लागू करने के लिए उसके पास न जमीनी नेता थे और न ही इसके लिए जरूरी मजबूत संगठन. यही वजह है कि उसे करीब आधी सीटों पर दूसरे दलों से आने वाले नेताओं को मैदान में उतारना पड़ा. नतीजों से साफ है कि वोटरों ने ऐसे ज्यादातर दलबदलुओं को नकार दिया है. इसका दूसरा नुकसान यह हुआ कि दलबदलुओं की वजह से टिकटों की आस लगाए बैठे स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं का मनोबल गिर गया. उन्होंने चुनाव अभियान में बेमन से काम किया. अब नतीजा सामने है.

ममता ने जिस तरह शुरुआत से ही चुनाव आयोग पर भाजपा के इशारों पर काम करने, महीने भर से ज्यादा चलने वाली चुनावी प्रक्रिया और बाहर से आने वाले लोगों की वजह से कोरोना संक्रमण तेजी से बढ़ने और गैस की कीमतों में वृद्धि जैसे मुद्दे उठाए उसने प्रतिष्ठान-विरोधी लहर के बावजूद लोगों को उनका समर्थन करने पर मजबूर कर दिया. इसके साथ ही केंद्र की ओर से चुनाव के मौके पर सीबीआई, ईडी और आयकर जैसी केंद्रीय एजंसियों के कथित राजनीतिक इस्तेमाल को भी उन्होंने असरदार मुद्दा बनाया.

असम के चुनाव

असम में विपक्षी गठबंधन की ओर से सत्तारूढ़ भाजपा गठबंधन को कड़ी चुनौती मिल रही थी. कयास लगाए जा रहे थे कि कांग्रेस के साथ बदरुद्दीन अजमल की आल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट और भाजपा सरकार में रही बोड़ो पीपुल्स पार्टी समेत आधा दर्जन दलों के हाथ मिलाने से भाजपा की सत्ता में वापसी की राह पथरीली हो जाएगी. लेकिन वहां खासकर पूर्वोत्तर के चाणक्य कहे जाने वाले भाजपा नेता और असम सरकार के वित्त मंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की वजह से पार्टी की राह आसान हो गई. यह उनकी रणनीति का ही नतीजा था कि जिस नेशनल रजिस्टर फॉर सिटीजंस (एनआरसी) और नागरिकता कानून (सीए) का असम में सबसे ज्यादा विरोध हुआ था वहीं यह दोनों मुद्दे हाशिए पर चले गए. पार्टी ने यहां अपनी सरकार बचाते हुए लगातार दूसरी बार सत्ता में आने वाली पहली गैर-कांग्रेसी सरकार होने का रिकॉर्ड भी अपने नाम कर लिया है.

Indien Dibrugarh | Wahlkampagne

असम में वित्तमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने की अपनी स्थिति मजबूत

राज्य की करीब 45 सीटों पर चाय बागान मजदूरों के वोट निर्णायक हैं. यही वजह है कि दोनों गठबंधन उनको लुभाने में जुटे थे. लेकिन नतीजों से पता चलता है कि चाय मजदूरों का समर्थन बीजेपी खेमे को ही मिला है. सरकार ने इस तबके के लिए जो योजनाएं शुरू की थीं उसका फायदा भाजपा को मिला है. इसके अलावा कांग्रेस के बदरुद्दीन अजमल की पार्टी के साथ हाथ मिलाने की वजह से राज्य में वोटरों का जबरदस्त ध्रुवीकरण देखने को मिला. भाजपा और उसकी सहयोगियों ने चुनाव अभियान के दौरान विपक्षी गठबंधन की जीत को राज्य के भविष्य के लिए खतरा बताया था. पार्टी ने इसे मुगलों का गठजोड़ और सभ्यताओं का टकराव करार दिया था. हिमंत विस्वा सरमा समेत तमाम नेता अजमल की पार्टी को सांप्रदायिक बताते रहे.

भाजपा ने जिस तरह पड़ोसी देश से होने वाली घुसपैठ को अपना सबसे प्रमुख मुद्दा बनाया था और सत्ता में आने पर लव जिहाद के खिलाफ कानून बनाने की बात कही थी उससे हिंदी वोटरों को एकजुट करने में सहायता मिली. कांग्रेस को इस बार चाय बागान मजदूरों का समर्थन मिलने की उम्मीद थी. इसी वजह से राहुल गांधी और प्रियंका गांधी जैसे नेता अक्सर चाय बागानों का दौरा करते देखे गए. लेकिन बावजूद इसके वे मजदूरों का समर्थन हासिल करने में नाकाम रहे. पार्टी को अबकी तरुण गोगोई जैसे कद्दावर नेता की कमी भी काफी खली.

राजनीतिक पर्यवेक्षक विश्वनाथ चक्रवर्ती कहते हैं, “बीजेपी का पूरा जोर बंगाल पर था. उसने असम में तो अपनी सरकार बचा ली है. लेकिन बंगाल में लगे झटकों से उबरने में उसे समय लगेगा. अब पार्टी आत्ममंथन के दौर से गुजरेगी.”

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